ऑपरेशन ब्लू स्टार क्या था?
ऑपरेशन ब्लू स्टार (1984): पृष्ठभूमि, सैन्य कार्रवाई और दीर्घकालीन प्रभाव
ऑपरेशन ब्लू स्टार भारत सरकार के आदेश पर भारतीय सेना द्वारा जून 1984 में पंजाब में की गई सैन्य कार्रवाई का प्रचलित नाम है। इसका घोषित उद्देश्य अमृतसर के श्री हरमंदिर साहिब परिसर—जिसे सामान्यतः स्वर्ण मंदिर कहा जाता है—और पंजाब के कुछ अन्य धार्मिक परिसरों में मौजूद जर्नैल सिंह भिंडरांवाले, उनके सशस्त्र समर्थकों तथा अन्य वांछित व्यक्तियों को बाहर निकालना और हथियारों के भंडार को कब्जे में लेना था। मुख्य लड़ाई 5 और 6 जून की रात हुई; 7 जून को अकाल तख्त क्षेत्र पर सेना का नियंत्रण स्थापित हुआ, हालांकि छिटपुट प्रतिरोध और तलाशी कई दिन जारी रही। सरकारी विवरण व्यापक अभियान को 1 से 10 जून के बीच रखता है।
सेना की शब्दावली में अमृतसर परिसर की कार्रवाई को प्रायः “ऑपरेशन मेटल” और पंजाब के अन्य स्थानों की कार्रवाइयों को “ऑपरेशन शॉप” से जोड़ा जाता है। इसके बाद ग्रामीण पंजाब में तलाशी, गिरफ्तारी और हथियार बरामदगी का व्यापक अभियान “ऑपरेशन वुडरोज” चला। जनस्मृति में इन सभी का सबसे प्रभावशाली नाम ब्लू स्टार ही है।
कार्रवाई का सैन्य लक्ष्य प्राप्त हुआ: भिंडरांवाले, पूर्व मेजर जनरल शाबेग सिंह और ऑल इंडिया सिख स्टूडेंट्स फेडरेशन के अध्यक्ष अमरीक सिंह मारे गए; परिसर पर राज्य का नियंत्रण स्थापित हुआ और हथियार बरामद हुए। किंतु राजनीतिक और सामाजिक अर्थों में परिणाम अत्यंत गंभीर निकले। अकाल तख्त को भारी क्षति हुई, नागरिक और सैनिक मारे गए, सिख रेफरेंस लाइब्रेरी का बड़ा संग्रह नष्ट या गायब हुआ और विश्वभर में बहुत से सिखों ने कार्रवाई को अपनी आस्था पर प्रहार के रूप में अनुभव किया। पांच महीने बाद प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की उनके दो सिख अंगरक्षकों ने हत्या कर दी। उसके बाद दिल्ली और अन्य शहरों में सिख-विरोधी सामूहिक हत्याएं हुईं। पंजाब में उग्रवाद तथा कठोर प्रतिउग्रवाद का चक्र अगले कई वर्षों तक गहराता गया।
इसी द्वंद्व के कारण ब्लू स्टार को केवल “सफल सैन्य अभियान” या केवल “धार्मिक स्थल पर हमला” कह देने से उसका पूरा अर्थ नहीं खुलता। यह एक साथ सुरक्षा संकट, राजनीतिक विफलता, सैन्य चुनौती, मानवीय त्रासदी और राष्ट्रीय एकता की परीक्षा था।
अध्ययन के केंद्रीय प्रश्न
- पंजाब की संवैधानिक और आर्थिक शिकायतें हिंसक अलगाववाद से कैसे जुड़ीं—और दोनों में अंतर क्या था?
- भिंडरांवाले का उदय किन सामाजिक, धार्मिक और राजनीतिक परिस्थितियों में हुआ?
- केंद्र और अकाली नेतृत्व के बीच वार्ता क्यों विफल हुई?
- धार्मिक परिसर में हथियारबंद जमाव और किलेबंदी को पहले क्यों नहीं रोका गया?
- सेना को कब और किन विकल्पों के बाद बुलाया गया?
- खुफिया अनुमान, तैयारी, समय और नागरिक निकासी में क्या कमियां थीं?
- वास्तविक हताहत कितने थे और आंकड़े विवादित क्यों हैं?
- क्या उपलब्ध कम विनाशकारी विकल्पों का पर्याप्त परीक्षण हुआ?
- कार्रवाई ने आतंकवाद कम किया या नई भर्ती और अलगाव को बल दिया?
- आज के भारत के लिए इससे क्या संस्थागत सबक निकलते हैं?