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दस्तावेज़ · तथ्य · विश्लेषण
OCN Research Dossier–015 · अध्याय 03

विभाजन, पंजाबी सूबा और 1966 के बाद के प्रश्न

ऑपरेशन ब्लू स्टार (1984): पृष्ठभूमि, सैन्य कार्रवाई और दीर्घकालीन प्रभाव

Omkar Chaudhary / OCN Research Deskविस्तृत शोध संस्करण · 3 अगस्त 2026

ब्लू स्टार की जड़ 1984 से बहुत पहले जाती है। 1947 के विभाजन ने ऐतिहासिक पंजाब को दो देशों में बांट दिया। लाखों हिंदू, मुसलमान और सिख विस्थापित हुए तथा बड़े पैमाने पर साम्प्रदायिक हिंसा हुई। सिखों के कई प्रमुख धार्मिक और सांस्कृतिक स्थल पाकिस्तान में रह गए। भारतीय पंजाब ने शरणार्थियों को बसाया, कृषि पुनर्निर्माण किया और बाद में हरित क्रांति का केंद्र बना, पर विभाजन की असुरक्षा और पहचान की चिंता राजनीतिक जीवन में बनी रही।

स्वतंत्रता के बाद भाषा-आधारित राज्यों की मांग उठी। शिरोमणि अकाली दल ने पंजाबी भाषा पर आधारित “पंजाबी सूबा” आंदोलन चलाया। केंद्र में आशंका थी कि धार्मिक बहुसंख्यक वाला राज्य अलगाववाद को बढ़ा सकता है; अकाली नेतृत्व ने इसे भाषा और संघवाद का प्रश्न बताया। लंबी खींचतान के बाद 1966 में पुराने पंजाब का पुनर्गठन हुआ: पंजाबी-भाषी पंजाब, हिंदी-भाषी हरियाणा और पर्वतीय क्षेत्रों से हिमाचल प्रदेश का विस्तार हुआ।

पुनर्गठन ने समस्या समाप्त नहीं की। चंडीगढ़ को केंद्रशासित प्रदेश और पंजाब तथा हरियाणा की संयुक्त राजधानी बनाया गया। पंजाबी-भाषी क्षेत्रों के हस्तांतरण, साझा संस्थाओं, सरकारी कर्मचारियों और नदी जल के बंटवारे पर विवाद जारी रहे। सतलुज–यमुना लिंक नहर बाद में पंजाब की राजनीति का विस्फोटक प्रतीक बनी। पंजाब का तर्क था कि नदी जल पर तटीय राज्य का प्राथमिक अधिकार होना चाहिए; हरियाणा और केंद्र आवंटन तथा राष्ट्रीय योजनाओं का हवाला देते थे। न्यायिक, संवैधानिक और राजनीतिक आयाम आपस में उलझे रहे।

हरित क्रांति ने पंजाब को भारत का अन्न भंडार बनाया। ऊंची पैदावार, सिंचाई, उन्नत बीज और सरकारी खरीद से समृद्धि आई, लेकिन लाभ समान नहीं बंटा। छोटे किसान कर्ज, बढ़ती लागत और भूमि के विखंडन से दबे। शिक्षित ग्रामीण युवाओं की अपेक्षाएं बढ़ीं, जबकि रोजगार उसी अनुपात में नहीं बढ़े। खेती पर निर्भर अर्थव्यवस्था, औद्योगिक निवेश की कमी और सामाजिक गतिशीलता ने असंतोष की नई जमीन बनाई। आर्थिक असंतोष अपने आप उग्रवाद नहीं बनाता, पर पहचान-आधारित राजनीतिक संदेश के लिए ग्रहणशील वातावरण बना सकता है।

संघीय असहमति और अलगाववाद में अंतर

यहां सबसे महत्वपूर्ण विश्लेषणात्मक सावधानी यह है कि केंद्र से अधिक अधिकार मांगना अपने आप देश से अलग होने की मांग नहीं है। राज्यों की स्वायत्तता, कराधान, प्रसारण, कृषि, जल या राजधानी पर असहमति भारतीय संघवाद के भीतर उठने वाले प्रश्न हैं। 1980 के दशक की राजनीतिक भाषा में इन मांगों को कभी-कभी “राष्ट्र-विरोधी” कहकर समेट दिया गया; दूसरी ओर अलगाववादी तत्वों ने वास्तविक संघीय शिकायतों को स्वतंत्र खालिस्तान की दलील से जोड़ने का प्रयास किया। दोनों प्रक्रियाओं ने मध्य मार्ग संकरा किया।