हिंसा का विस्तार, 1981–83
ऑपरेशन ब्लू स्टार (1984): पृष्ठभूमि, सैन्य कार्रवाई और दीर्घकालीन प्रभाव
1981 से पंजाब में लक्षित हत्याएं, बम, हथियार लूट, साम्प्रदायिक हमले और पुलिस पर आक्रमण बढ़ने लगे। पीड़ितों में निरंकारी, पत्रकार, पुलिसकर्मी, हिंदू नागरिक, मध्यमार्गी सिख, सरकारी अधिकारी और राजनीतिक विरोधी शामिल थे। प्रत्येक घटना सीधे भिंडरांवाले के आदेश से हुई, यह कानूनी रूप से सिद्ध नहीं; लेकिन उनके भाषण, आरोपियों को आश्रय, समर्थक नेटवर्क और हिंसा की सार्वजनिक प्रशंसा ने भय का वातावरण बनाया। हत्यारों को समुदाय का रक्षक बताने वाली भाषा ने कानून और धार्मिक वैधता की सीमा धुंधली की।
जुलाई 1982 में भिंडरांवाले अमृतसर के गुरु नानक निवास में आ गए, जो हरमंदिर साहिब परिसर से जुड़ी सराय व्यवस्था का हिस्सा था। उनके समर्थक और हथियारबंद पहरेदार बढ़ते गए। धार्मिक परिसर ने पुलिस के लिए प्रवेश को राजनीतिक रूप से कठिन बनाया। राज्य की हिचकिचाहट ने यह संदेश दिया कि पवित्रता गिरफ्तारी से प्रतिरक्षा बन सकती है। वहीं समर्थकों का तर्क था कि पुलिस झूठे मुकदमे और उत्पीड़न कर रही थी, इसलिए आश्रय आवश्यक था।
25 अप्रैल 1983 को पंजाब पुलिस के उपमहानिरीक्षक ए.एस. अटवाल की हरमंदिर साहिब में मत्था टेककर निकलते समय सीढ़ियों पर गोली मारकर हत्या कर दी गई। उनका शव कुछ समय तक पड़ा रहा और पुलिस तत्काल भीतर नहीं गई। यह घटना राज्य के अधिकार के प्रतीकात्मक पतन जैसी थी। यदि एक वरिष्ठ सिख पुलिस अधिकारी की पवित्र स्थल के द्वार पर हत्या हो और अपराधी परिसर में लौट जाएं, तो कानून-व्यवस्था की साधारण प्रक्रिया लगभग निष्प्रभावी दिखती है।
5 अक्टूबर 1983 को कपूरथला जिले के ढिलवां के निकट बस रोककर यात्रियों को पहचान के आधार पर अलग किया गया और छह हिंदू यात्रियों की हत्या कर दी गई। इसके अगले दिन केंद्र ने दरबारा सिंह की कांग्रेस सरकार बर्खास्त कर पंजाब में राष्ट्रपति शासन लगा दिया। बस हत्याओं और अन्य साम्प्रदायिक वारदातों ने हिंदू आबादी में भय, पलायन की आशंका और प्रतिशोध की भावना पैदा की। साथ ही पुलिस की व्यापक गिरफ्तारियों और कथित यातना ने अनेक सिख परिवारों को भी राज्य से दूर किया। हिंसा और दमन एक-दूसरे की भर्ती का साधन बनने लगे।
सांप्रदायिक रणनीति
लक्षित हत्या का लक्ष्य केवल व्यक्ति को मारना नहीं होता। बस से नाम या पहचान देखकर लोगों को उतारना, संपादक की हत्या करना या मध्यमार्गी धार्मिक नेता को चुप कराना पूरे समूह को संदेश देता है। उग्रवादी रणनीति पंजाब के हिंदुओं में असुरक्षा पैदा कर पलायन और प्रतिघात चाहती थी; इससे सिखों को भी सामूहिक खतरे का बोध हो सकता था और ध्रुवीकरण गहरा सकता था। दूसरी ओर, हर सिख युवक को संदिग्ध मानने वाली सुरक्षा नीति उसी ध्रुवीकरण को राज्य की ओर से पुष्ट करती थी।