धर्म युद्ध मोर्चा—लोकतांत्रिक आंदोलन और हिंसा की छाया
ऑपरेशन ब्लू स्टार (1984): पृष्ठभूमि, सैन्य कार्रवाई और दीर्घकालीन प्रभाव
अकाली दल ने 4 अगस्त 1982 को धर्म युद्ध मोर्चा शुरू किया। मुख्य मांगों में आनंदपुर साहिब प्रस्ताव, चंडीगढ़, नदी जल, सिख धार्मिक मांगें और पंजाब के अधिकार शामिल थे। संत हरचंद सिंह लोंगोवाल इसके राजनीतिक नेता थे; भिंडरांवाले ने आंदोलन का समर्थन किया। बड़ी संख्या में अकाली स्वयंसेवकों ने शांतिपूर्वक गिरफ्तारी दी। किसानों, धार्मिक जत्थों, महिलाओं और बुजुर्गों की भागीदारी वाला यह हिस्सा संवैधानिक जनांदोलन था। इसे बाद में हुई प्रत्येक हिंसा के साथ मिलाना अनुचित है।
लेकिन उसी समय सशस्त्र हिंसा भी बढ़ रही थी। अकाली नेतृत्व भिंडरांवाले की लोकप्रियता से प्रतिस्पर्धा करता और उनके बल का राजनीतिक उपयोग भी चाहता था। खुली आलोचना करने पर पंथ-विरोधी कहे जाने या हिंसा का लक्ष्य बनने का भय था। इस प्रकार मोर्चे में दो समानांतर धाराएं दिखीं—गिरफ्तारी देकर दबाव बनाने वाली अकाली राजनीति और हथियार के माध्यम से भय स्थापित करने वाला नेटवर्क। केंद्र ने अक्सर दोनों को एक ही सुरक्षा समस्या की तरह लिया; अकाली नेतृत्व दोनों के बीच निर्णायक रेखा खींचने में विफल रहा।
1982 के एशियाई खेलों से पहले हरियाणा सीमा पर पंजाब से दिल्ली जाने वाले सिख यात्रियों की कठोर तलाशी ने गहरा अपमान पैदा किया। पूर्व सैन्य अधिकारियों, न्यायाधीशों और प्रतिष्ठित नागरिकों तक को रोका गया। सुरक्षा की आवश्यकता से परे सामुदायिक प्रोफाइलिंग की अनुभूति ने भिंडरांवाले के इस प्रचार को बल दिया कि सिखों को सामूहिक रूप से संदिग्ध माना जा रहा है।
केंद्र और अकाली दल के बीच कई दौर की वार्ता हुई। कुछ अवसरों पर धार्मिक मांगों पर सहमति संभव दिखी, पर चंडीगढ़, जल और केंद्र–राज्य शक्तियों पर गतिरोध बना रहा। समझौते के प्रारूप बदले, सार्वजनिक बयान निजी सहमतियों से अलग हुए और दोनों पक्ष अपने कठोर समर्थकों के दबाव में पीछे हटे। वार्ता लंबी चली, पर उसके साथ कानून लागू करने की सुविचारित रणनीति या हिंसक तत्वों को अलग करने की विश्वसनीय राजनीतिक पहल नहीं बनी।
दिसंबर 1983 में भिंडरांवाले गुरु नानक निवास से अकाल तख्त में चले गए। इस कदम का धार्मिक और सामरिक दोनों अर्थ था। अकाल तख्त की पवित्रता ने पुलिस कार्रवाई की लागत कई गुना बढ़ाई; परिसर की ऊंची इमारतें और संकरे प्रवेश रक्षा के लिए उपयोगी थे। अकाली तथा एसजीपीसी नेतृत्व उन्हें हटाने की स्थिति या इच्छा में नहीं दिखा। यहीं से संकट ने ऐसी दिशा पकड़ी जिसमें हर अगला विकल्प पिछले विकल्प से अधिक हिंसक होता गया।