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दस्तावेज़ · तथ्य · विश्लेषण
OCN Research Dossier–015 · अध्याय 28

उग्रवाद का विस्तार और प्रतिहिंसा का चक्र

ऑपरेशन ब्लू स्टार (1984): पृष्ठभूमि, सैन्य कार्रवाई और दीर्घकालीन प्रभाव

Omkar Chaudhary / OCN Research Deskविस्तृत शोध संस्करण · 3 अगस्त 2026

1985 के बाद पंजाब में अनेक सशस्त्र संगठन सक्रिय हुए। खालिस्तान कमांडो फोर्स, बब्बर खालसा, खालिस्तान लिबरेशन फोर्स और अन्य गुटों में नेतृत्व, विचार और क्षेत्रीय प्रतिस्पर्धा थी। कुछ पाकिस्तान में शरण या समर्थन खोजते थे; प्रवासी नेटवर्क से धन और प्रचार मिलता था। संगठनों ने पुलिस, सरकारी अधिकारी, पत्रकार, राजनीतिक नेता, कथित मुखबिर, निरंकारी और हिंदू नागरिकों को निशाना बनाया। बस और ट्रेन यात्रियों की पहचान-आधारित हत्या ने साम्प्रदायिक युद्ध भड़काने की कोशिश जारी रखी।

सिख पीड़ितों को भूलना भी इतिहास का विकृतिकरण होगा। उग्रवादियों ने उन ग्रंथियों, किसानों, पत्रकारों, अधिकारियों और नेताओं को मारा जिन्होंने आदेश न माना, फिरौती न दी या अलगाववाद का विरोध किया। पंजाब में आतंक का सबसे लंबा बोझ स्वयं पंजाबी—सिख और हिंदू दोनों—नागरिकों ने उठाया।

राज्य की प्रतिक्रिया अधिक कठोर हुई। विशेष कानून, लंबी हिरासत, पुलिस को व्यापक अधिकार और मुखबिर नेटवर्क बढ़ा। पंजाब पुलिस ने स्थानीय भाषा, सामाजिक संबंध और खुफिया क्षमता के आधार पर उग्रवादी नेटवर्क तोड़ा। लेकिन मानवाधिकार संगठनों ने फर्जी मुठभेड़, गुमशुदगी, यातना और अज्ञात शव-दाह के गंभीर आरोप तथा प्रमाण दर्ज किए। सुरक्षा सफलता नागरिक अधिकार उल्लंघन को वैध नहीं करती; न्याय-विहीन प्रतिउग्रवाद भविष्य के विवाद छोड़ता है।

1990 के दशक के आरंभ तक पुलिस रणनीति, उग्रवादी गुटों का विभाजन, जनसमर्थन का ह्रास और लोकतांत्रिक प्रक्रिया की वापसी से हिंसा कम हुई। सामान्य पंजाबी नागरिक की थकान निर्णायक थी। ग्रामीण समाज ने देखा कि उग्रवादी “समानांतर शासन” भी हत्या, वसूली और नियंत्रण ला रहा था। आतंक का नैतिक दावा धीरे-धीरे खत्म हुआ।

1980 के दशक के उत्तरार्ध में हिंसा का दायरा लक्षित हत्या से आगे बढ़कर पुलिस, राजनीतिक कार्यकर्ता, पत्रकार, धार्मिक विरोधी और सामान्य नागरिकों तक गया। उग्रवादी समूहों में भी प्रतिस्पर्धा थी; वैचारिक उद्देश्य, आपराधिक वसूली और स्थानीय प्रतिशोध कई बार एक-दूसरे में घुल गए। इससे किसी घटना की जिम्मेदारी निर्धारित करना कठिन हुआ और भय ने ग्रामीण समाज की सामान्य संस्थाओं को कमजोर किया।

राज्य की प्रतिउग्रवाद नीति ने अंततः संगठनों की क्षमता तोड़ी, लेकिन कथित गैर-न्यायिक हत्या, गुप्त दाह-संस्कार और गायब लोगों के आरोप दीर्घकालीन न्याय प्रश्न बने। आतंकवाद की वास्तविक क्रूरता राज्य को कानून से बाहर जाने का स्थायी अधिकार नहीं देती। टिकाऊ सामान्यीकरण के लिए सुरक्षा सफलता के साथ न्यायिक रिकॉर्ड, परिवारों को सूचना, दोषी अधिकारियों पर कार्रवाई और पीड़ित नागरिकों की समान मान्यता आवश्यक होती है।