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दस्तावेज़ · तथ्य · विश्लेषण
OCN Research Dossier–015 · अध्याय 14

5–6 जून की रात—मुख्य हमला

ऑपरेशन ब्लू स्टार (1984): पृष्ठभूमि, सैन्य कार्रवाई और दीर्घकालीन प्रभाव

Omkar Chaudhary / OCN Research Deskविस्तृत शोध संस्करण · 3 अगस्त 2026

5 जून की शाम और रात सेना ने कई दिशाओं से परिसर में प्रवेश आरंभ किया। लक्ष्य था बाहरी इमारतों पर नियंत्रण, अकाल तख्त में मौजूद नेतृत्व को पकड़ना या निष्क्रिय करना और हरमंदिर साहिब को क्षति से बचाना। पैरा-कमांडो, विशेष सीमा बल और पैदल सेना की टुकड़ियां अलग लक्ष्यों पर आगे बढ़ीं।

प्रारंभिक हमले को तीव्र, समन्वित गोलीबारी मिली। खुले परिक्रमा क्षेत्र में आने वाले जवान ऊंची खिड़कियों, बुंगों और अकाल तख्त की दिशा से निशाना बने। रात, धुआं, सीमित दृश्यता और श्रद्धास्थल को बचाने के आदेश ने जवाबी कार्रवाई कठिन की। कुछ इकाइयों को भारी क्षति हुई और प्रगति रुक गई। बख्तरबंद वाहन का उपयोग सैनिकों को सुरक्षित आगे लाने और मोर्चों को दबाने के लिए किया गया; एक वाहन रॉकेट-प्रोपेल्ड ग्रेनेड या एंटी-आर्मर फायर से निष्क्रिय हुआ—इससे रक्षकों के हथियार और तैयारी का अनुमान बदला।

हरमंदिर साहिब की ओर गोली न चलाने के आदेश के कारण उस दिशा से आने वाली संभावित फायरिंग का जवाब जटिल था। दूसरी ओर, अकाल तख्त की मजबूत स्थिति से लगातार प्रतिरोध के कारण कमांडरों ने भारी सीधे फायर की अनुमति मांगी। विजयंत टैंकों की मुख्य तोप और अन्य भारी हथियारों से अकाल तख्त के मोर्चों पर फायर किया गया। सैन्य पक्ष का कहना है कि यह अपने जवानों की जान बचाने और मशीनगन ठिकाने शांत करने के लिए अंतिम उपाय था; आलोचक इसे अनुपातहीन बल और विरासत-विनाश मानते हैं।

रात भर लड़ाई चली। कई प्रयासों के बाद सैनिक अकाल तख्त के निकट पहुंचे। 6 जून की सुबह तक इमारत बुरी तरह क्षतिग्रस्त थी। भिंडरांवाले, शाबेग सिंह और अमरीक सिंह के शव बाद में मिले। परिसर के अन्य हिस्सों में आत्मसमर्पण, गिरफ्तारी और छिटपुट गोलीबारी जारी रही। राष्ट्रपति ज्ञानी जैल सिंह की बाद की यात्रा के समय भी एक छिपे शूटर ने फायर किया, जिससे साफ था कि तत्काल पूर्ण सफाई नहीं हुई थी।

क्या टैंक अपरिहार्य थे?

सैन्य स्तर पर प्रश्न का उत्तर उस रात के परिप्रेक्ष्य में दिया जाता है: पैदल सैनिक फंसे थे, मशीनगन मोर्चे मजबूत थे और अधिक जवानों की मृत्यु रोकनी थी। राजनीतिक-रणनीतिक स्तर पर प्रश्न बड़ा है: राज्य स्वयं उस परिस्थिति तक कैसे पहुंचा जिसमें अपने ही धार्मिक स्मारक पर टैंक फायर “अंतिम उपाय” बन गया? तत्काल कमांडर का निर्णय और वर्षों की नीति-विफलता अलग स्तर की जिम्मेदारियां हैं।