1978 का निरंकारी–सिख संघर्ष और भिंडरांवाले का उदय
ऑपरेशन ब्लू स्टार (1984): पृष्ठभूमि, सैन्य कार्रवाई और दीर्घकालीन प्रभाव
13 अप्रैल 1978 को अमृतसर में बैसाखी के दिन संत निरंकारी मिशन के एक सम्मेलन और उसका विरोध करने गए रूढ़िवादी सिख समूहों के बीच हिंसक टकराव हुआ। प्रचलित विवरणों के अनुसार 13 सिख प्रदर्शनकारी और तीन निरंकारी मारे गए। घटना की शुरुआत और प्रथम आक्रमण को लेकर पक्षों के विवरण अलग हैं, लेकिन इसका राजनीतिक परिणाम निर्विवाद है: इसने धार्मिक असंतोष को तीखा किया और जर्नैल सिंह भिंडरांवाले को पंजाब-स्तरीय पहचान दी।
भिंडरांवाले 1977 में दमदमी टकसाल के प्रमुख बने थे। टकसाल परंपरागत रूप से गुरबाणी, सिख मर्यादा और धार्मिक शिक्षा से जुड़ी संस्था थी। भिंडरांवाले ने शराब, नशा, बाल काटने और धार्मिक अनुशासन छोड़ने के विरुद्ध प्रचार किया। उनका सरल ग्रामीण भाषण, धार्मिक प्रतीक और निर्भीकता अनेक युवाओं को आकर्षित करते थे। 1978 के बाद उन्होंने निरंकारियों के विरुद्ध कठोर रुख अपनाया। मुकदमे में निरंकारी आरोपियों का पंजाब से बाहर सुनवाई के बाद बरी होना बहुत से सिखों में न्याय से वंचित होने की भावना का कारण बना।
24 अप्रैल 1980 को निरंकारी प्रमुख गुरबचन सिंह की दिल्ली में हत्या कर दी गई। जांच और सार्वजनिक आरोपों में भिंडरांवाले समर्थकों का नाम आया, लेकिन कानूनी उत्तरदायित्व और व्यापक षड्यंत्र पर अनेक दावे विवादित रहे। 9 सितंबर 1981 को हिंद समाचार समूह के संस्थापक और पंजाब केसरी के संपादक लाला जगत नारायण की हत्या हुई। वे भिंडरांवाले के आलोचक थे। भिंडरांवाले ने गिरफ्तारी दी, पर पर्याप्त साक्ष्य न होने के आधार पर कुछ सप्ताह बाद रिहा कर दिए गए। गिरफ्तारी के समय हिंसक घटनाएं हुईं और उनकी राजनीतिक प्रतिष्ठा और बढ़ी।
क्या कांग्रेस ने भिंडरांवाले को “बनाया”?
यह आरोप व्यापक है कि कांग्रेस के कुछ नेताओं ने अकाली दल का धार्मिक आधार काटने के लिए भिंडरांवाले या उनसे जुड़े उम्मीदवारों को प्रोत्साहन दिया। पूर्व अधिकारियों, पत्रकारों और राजनीतिक संस्मरणों में ज्ञानी जैल सिंह तथा संजय गांधी तक के नाम आते हैं। कुछ चुनावों में भिंडरांवाले ने कांग्रेस प्रत्याशियों का समर्थन किया और आरंभिक दौर में कांग्रेस के हिस्सों से संपर्क स्पष्ट था।
फिर भी “कांग्रेस ने उन्हें बनाया और हर कार्रवाई नियंत्रित की” एक अत्यधिक सरल निष्कर्ष होगा। उपलब्ध प्रमाण राजनीतिक संरक्षण, अवसरवादी संपर्क और प्रतिद्वंद्वी को कमजोर करने की जोखिमपूर्ण रणनीति की ओर संकेत करते हैं; वे यह सिद्ध नहीं करते कि बाद की प्रत्येक हत्या या अलगाववादी दिशा केंद्र द्वारा लिखी पटकथा थी। भिंडरांवाले का अपना धार्मिक आधार, संगठन, विचार और एजेंसी थी। जिम्मेदार निष्कर्ष यह है कि अल्पकालिक दलगत लाभ के लिए कट्टर धार्मिक नेतृत्व से खेलना गंभीर राजनीतिक भूल थी, जो शीघ्र ही प्रायोजकों की पकड़ से बाहर चली गई।