जिम्मेदारी का बहुस्तरीय मानचित्र
ऑपरेशन ब्लू स्टार (1984): पृष्ठभूमि, सैन्य कार्रवाई और दीर्घकालीन प्रभाव
इतिहास की सबसे सुविधाजनक कहानी एक खलनायक चुनती है; गंभीर इतिहास अलग-अलग स्तर की जिम्मेदारी पहचानता है। ब्लू स्टार किसी एक दिन की एक व्यक्ति की भूल नहीं था। फिर भी जिम्मेदारी को इतना फैला देना कि कोई उत्तरदायी ही न बचे, समान रूप से गलत है।
इंदिरा गांधी और केंद्र सरकार
प्रधानमंत्री के पास अंतिम निर्णय की शक्ति थी। उनकी सरकार ने पंजाब की संवैधानिक शिकायतों के समाधान को बार-बार चुनावी गणना से जोड़ा, अकाली प्रतिद्वंद्विता में धार्मिक कट्टर तत्वों के उपयोग के आरोपों को जन्म दिया और कानून-व्यवस्था की गिरावट पर समय रहते संगत नीति नहीं बनाई। 1984 तक हिंसा सचमुच गंभीर थी और सरकार निष्क्रिय नहीं रह सकती थी; पर वर्षों की देरी के बाद अचानक सेना और सीमित नागरिक निकासी चुनना नीति-विफलता थी।
यह भी सत्य है कि प्रधानमंत्री को केवल एक शांतिपूर्ण धार्मिक प्रचारक का सामना नहीं था। हत्याएं हो रही थीं, पुलिस अधिकारी मंदिर की सीढ़ियों पर मारा गया, बस यात्रियों को पहचान से चुना गया और परिसर में सशस्त्र मोर्चे बने। केंद्र की आलोचना करते समय उस सुरक्षा संकट को काल्पनिक कहना तथ्य से खिलवाड़ होगा। आलोचना का मजबूत आधार यह है कि वास्तविक संकट को संभालने की विधि अनुपातहीन और देर से थी।
कांग्रेस की पंजाब राजनीति
अकाली दल को विभाजित करने या कमजोर करने के लिए धार्मिक प्रतिस्पर्धियों से संपर्क अल्पकालिक राजनीति का खतरनाक उदाहरण था। भिंडरांवाले की स्वतंत्र शक्ति बढ़ने के बाद भी कुछ कांग्रेस गुटों ने संकट का चुनावी ध्रुवीकरण किया। हर आरोप का दस्तावेजी स्तर समान नहीं, इसलिए व्यक्ति-विशेष की गुप्त भूमिका को सिद्ध तथ्य की तरह नहीं लिखना चाहिए। पर व्यापक पैटर्न—प्रतिद्वंद्वी को हराने के लिए कट्टरता को कम आंकना—स्पष्ट नीति सबक है।
अकाली दल और एसजीपीसी नेतृत्व
अकाली नेतृत्व ने वास्तविक संघीय तथा धार्मिक मांगों को लोकतांत्रिक मंच दिया। हजारों कार्यकर्ताओं ने अहिंसक गिरफ्तारी दी। लेकिन नेतृत्व भिंडरांवाले के सशस्त्र प्रभाव का मुकाबला करने में कमजोर, विभाजित और अवसरवादी रहा। परिसर में हथियारबंद जमाव पर आरंभिक सार्वजनिक प्रतिरोध नहीं किया गया। कुछ नेता मानते रहे कि भिंडरांवाले केंद्र पर दबाव बढ़ाएंगे; बाद में वे स्वयं उनके प्रभाव में सीमित हो गए।
यह कहना आसान है कि एसजीपीसी को उन्हें बाहर निकाल देना चाहिए था, पर व्यावहारिक क्षमता संदिग्ध थी। धार्मिक कर्मचारी हथियारबंद लोगों से भयभीत थे और कार्रवाई से हत्या हो सकती थी। फिर भी नैतिक नेतृत्व का अर्थ जोखिम के समय स्पष्ट मर्यादा बताना है। धार्मिक स्थल को हथियार और हत्या की शरण बनने से रोकने में संस्थागत विफलता हुई।
भिंडरांवाले और सशस्त्र संगठन
भिंडरांवाले ने सिख धार्मिक पुनरुत्थान, ग्रामीण असंतोष और राज्य के अत्याचार की शिकायतों को प्रभावशाली भाषा दी। उनके विरुद्ध हर आपराधिक आरोप अदालत में सिद्ध नहीं हुआ। लेकिन वे ऐसे वातावरण के केंद्रीय नेता थे जिसमें हत्या करने वालों को गौरव, आरोपियों को संरक्षण और हथियारबंद अनुशासन को धार्मिक वैधता मिली। उन्होंने नागरिक हत्याओं की निरंतर, निर्विवाद निंदा और अपराधियों को कानून के हवाले करने का रास्ता नहीं चुना।
परिसर की किलेबंदी का अर्थ था कि संभावित संघर्ष में तीर्थयात्री और धार्मिक विरासत जोखिम में डाले गए। यदि उद्देश्य गिरफ्तारी से बचना और राज्य को पवित्र स्थल पर हमला करने के लिए उकसाना था, तो यह सामरिक रूप से प्रभावशाली पर मानवीय रूप से विनाशकारी गणना थी। शाबेग सिंह का सैन्य कौशल इस नैतिक जिम्मेदारी को कम नहीं करता।
पुलिस और नागरिक प्रशासन
पंजाब पुलिस राजनीतिक हस्तक्षेप, भय और आंतरिक विभाजन से कमजोर हुई। कुछ अधिकारी साहस से काम करते हुए मारे गए; कुछ ने कार्रवाई से परहेज किया; कुछ पर यातना और गैरकानूनी हिरासत के आरोप लगे। 1982–83 में विशिष्ट अपराधियों के विरुद्ध पेशेवर जांच तथा सुरक्षा का अभाव संकट को बढ़ाता गया। ए.एस. अटवाल की हत्या के बाद निर्णायक, वैध प्रतिक्रिया न होना राज्य क्षय का प्रतीक था।
सेना
सेना ने राजनीतिक आदेश लागू किया और तत्काल लक्ष्य पूरा किया। मैदानी बहादुरी निर्विवाद है। संस्थागत स्तर पर खुफिया अनुमान, नागरिक योजना और भारी हथियार के उपयोग की समीक्षा जरूरी है। “आदेश था” पेशेवर सैन्य समीक्षा को समाप्त नहीं करता; उसी प्रकार राजनीतिक भूल का पूरा भार जवानों पर डालना अन्याय है। जिम्मेदारी कमान के स्तर और उपलब्ध विकल्प के अनुसार अलग होती है।
पाकिस्तान और बाहरी नेटवर्क
पाकिस्तान ने भारत की आंतरिक दरारों को रणनीतिक अवसर के रूप में देखा। 1980 के दशक के मध्य और बाद में प्रशिक्षण, हथियार, शरण और घुसपैठ में उसकी भूमिका अनेक सुरक्षा तथा विद्वत स्रोतों में दर्ज है। लेकिन पंजाब की मूल शिकायतें पाकिस्तान ने पैदा नहीं की थीं। बाहरी शक्ति तभी प्रभावी हुई जब घरेलू राजनीतिक संघर्ष, हिंसा और अन्याय ने जमीन तैयार की। “सब कुछ सीमा पार की साजिश” कहना घरेलू उत्तरदायित्व से बचना है; बाहरी सहायता नकारना भी अधूरा इतिहास है।