7 से 10 जून—नियंत्रण, तलाशी और गिरफ्तारियां
ऑपरेशन ब्लू स्टार (1984): पृष्ठभूमि, सैन्य कार्रवाई और दीर्घकालीन प्रभाव
7 जून को सेना ने अकाल तख्त पर प्रभावी नियंत्रण स्थापित कर लिया। शवों की पहचान हुई, हथियार एकत्र किए गए और बचे प्रतिरोध को खत्म करने के लिए तलाशी चली। कई सौ लोगों को हिरासत में लिया गया। आधिकारिक श्वेतपत्र लगभग 1,592 लोगों के पकड़े जाने का उल्लेख करता है, पर उनमें से कितने हथियारबंद, वांछित, अकाली स्वयंसेवक, कर्मचारी या तीर्थयात्री थे—इसका सार्वजनिक, पूर्ण वर्गीकरण उपलब्ध नहीं है।
तेजा सिंह समुंदरी हॉल और सराय क्षेत्र में अकाली नेता भी फंसे थे। आत्मसमर्पण और निकासी के दौरान गोलीबारी तथा मौतों के विवरण पर सरकारी और प्रत्यक्षदर्शी कथन अलग हैं। कुछ प्रत्यक्षदर्शियों ने बंदियों के साथ दुर्व्यवहार और हाथ बांधकर गोली मारने के आरोप लगाए। सरकार ने सामूहिक निष्पादन के आरोपों का खंडन किया और विदेशी संवाददाता ब्रह्मा चेलानी की रिपोर्ट पर कानूनी कार्रवाई की। स्वतंत्र न्यायिक जांच न होने से ये आरोप पूरी तरह सुलझे नहीं।
शवों को गर्मी और सार्वजनिक स्वास्थ्य के कारण शीघ्र हटाया तथा अंतिम संस्कार किया गया। प्रशासनिक आवश्यकता वास्तविक थी, लेकिन पहचान, पोस्टमॉर्टम और परिवारों को सूचना की कमजोर प्रक्रिया ने अविश्वास बढ़ाया। बहुत से परिवार वर्षों तक निश्चित उत्तर नहीं पा सके। किसी संघर्ष में पारदर्शी शव-प्रबंधन केवल मानवीय कर्तव्य नहीं, ऐतिहासिक सत्य की सुरक्षा भी है।
10 जून तक प्रमुख प्रतिरोध समाप्त माना गया, हालांकि सेना का परिसर और पंजाब में व्यापक नियंत्रण जारी रहा। हरमंदिर साहिब में धार्मिक गतिविधि धीरे-धीरे बहाल हुई, पर अकाल तख्त खंडहर जैसा था। दृश्य स्वयं राजनीतिक संदेश बन गया—सरकार के लिए हथियारबंद चुनौती के अंत का, और बहुत से सिखों के लिए राज्य द्वारा पंथ के सर्वोच्च आसन के अपमान का।
मुख्य प्रतिरोध समाप्त होने के बाद का चरण केवल सफाई अभियान नहीं था। सेना को इमारत-दर-इमारत तलाशी, जीवित बचे लोगों की पहचान, घायलों की निकासी, हथियार और दस्तावेज़ सुरक्षित करने तथा परिसर में विस्फोटक अथवा छिपे प्रतिरोध की आशंका से निपटना था। इसी अवधि में बंदी बनाए गए लोगों के वर्गीकरण—श्रद्धालु, कर्मचारी, राजनीतिक कार्यकर्ता या लड़ाका—पर गंभीर विवाद पैदा हुआ। युद्ध-जैसे वातावरण में तत्काल पहचान की कठिनाई वास्तविक थी, पर बाद की न्यायिक और प्रशासनिक समीक्षा का अभाव उस कठिनाई को स्थायी संदेह में बदल गया।
मानवीय सहायता की गति पर भी प्रश्न उठे। कर्फ्यू, संचारबंदी और परिसर तक सीमित पहुंच के कारण परिवार अपने लापता सदस्यों के बारे में जानकारी नहीं पा सके। शवों की पहचान और निस्तारण की प्रक्रिया पर अलग-अलग विवरण मिले। एक पेशेवर ऑपरेशन के बाद पारदर्शी नामवार सूची, चिकित्सकीय रिकॉर्ड, गिरफ्तारी रजिस्टर और परिवार सूचना केंद्र उतने ही आवश्यक होते हैं जितना सैन्य नियंत्रण; 1984 में यह नागरिक संचार कमजोर रहा।