सिख रेफरेंस लाइब्रेरी—आग, जब्ती और गायब विरासत
ऑपरेशन ब्लू स्टार (1984): पृष्ठभूमि, सैन्य कार्रवाई और दीर्घकालीन प्रभाव
परिसर में स्थित सिख रेफरेंस लाइब्रेरी में हस्तलिखित बीड़ें, हुकमनामे, ऐतिहासिक पत्र, दुर्लभ पुस्तकें, समाचारपत्र और अन्य अभिलेख थे। कार्रवाई के दौरान या उसके तुरंत बाद आग से इसका बड़ा भाग नष्ट हुआ। आग कब और कैसे लगी, यह आज भी विवादित है। आधिकारिक पक्ष इसे लड़ाई के दौरान लगी आग बताता है; एसजीपीसी तथा कई गवाह आरोप लगाते हैं कि सेना के नियंत्रण के बाद सामग्री निकाली गई और फिर इमारत जली।
गृह मंत्रालय संबंधी अभिलेखों में कहा गया है कि परिसर से लगभग 4,000 दस्तावेज़, पुस्तकें और फाइलें तथा सोना, चांदी, मुद्रा और अन्य मूल्यवान वस्तुएं बरामद कर बाद में एसजीपीसी या पंजाब सरकार को सौंपी गईं। एसजीपीसी का कहना है कि लौटाई गई सामग्री अधूरी थी और अनेक दुर्लभ पांडुलिपियां तथा हुकमनामे अब भी लापता हैं। “सब कुछ जल गया” और “सब कुछ सेना ले गई”—दोनों पूर्ण दावे उपलब्ध रिकॉर्ड से सरल सिद्ध नहीं होते। संभव है कि कुछ सामग्री आग में नष्ट हुई, कुछ जब्त हुई, कुछ लौटाई गई और कुछ का हिसाब अस्पष्ट रहा।
इस विवाद को बंद करने का सर्वोत्तम तरीका राजनीतिक बयान नहीं बल्कि संयुक्त डिजिटल सूची है: 1984 से पहले की कैटलॉग, सेना की जब्ती सूची, सीबीआई/सरकारी हस्तांतरण रिकॉर्ड और एसजीपीसी की प्राप्ति सूची का सार्वजनिक मिलान। प्रत्येक पांडुलिपि की उच्च गुणवत्ता डिजिटल प्रति और वर्तमान स्थान दर्ज किया जाना चाहिए। धार्मिक विरासत समुदाय की स्मृति है; उसकी अस्पष्ट अभिरक्षा स्वयं दीर्घकालीन अन्याय बन जाती है।
इतिहासलेखन पर प्रभाव
पुस्तकालय की क्षति ने केवल सिख समुदाय को नहीं, पूरे दक्षिण एशियाई इतिहास को नुकसान पहुंचाया। मूल दस्तावेज़ नष्ट या अनुपलब्ध हों तो भविष्य का शोध संस्मरण और राजनीतिक कथन पर निर्भर होता है। ब्लू स्टार पर सत्य-विवाद का एक कारण यह भी है कि घटना में प्रमाण-संरक्षण की संस्थागत संस्कृति कमजोर रही।
पुस्तकालय विवाद में तीन अलग प्रश्न हैं—गोलीबारी या आग से तत्काल क्षति, सेना अथवा प्रशासन द्वारा सामग्री को सुरक्षित बताकर हटाया जाना और बाद में उसका अपूर्ण लौटना। इन तीनों को केवल “सब जल गया” या “कुछ भी नष्ट नहीं हुआ” में समेटना तथ्य को कमजोर करता है। पांडुलिपियों, हुकमनामों, पत्रों और अभिलेखीय सूचियों का वस्तु-वार मिलान ही तय कर सकता है कि कौन-सी सामग्री पहले से सूचीबद्ध थी, कौन-सी कार्रवाई में नष्ट हुई और कौन-सी सरकारी कब्जे में गई।
विरासत की हानि का प्रभाव केवल धार्मिक भावना नहीं, इतिहासलेखन पर भी पड़ा। मूल दस्तावेज़ अनुपलब्ध हों तो बाद के शोधकर्ता प्रतिलिपि, संस्मरण या पक्ष-विशिष्ट विवरण पर निर्भर होते हैं। सरकार और एसजीपीसी को साझा डिजिटल सूची, उपलब्ध सामग्री की उच्च-गुणवत्ता प्रतियां और गायब वस्तुओं की सार्वजनिक स्थिति बनानी चाहिए थी। पारदर्शी अभिलेख-वापसी आज भी ऐतिहासिक मेल-मिलाप का व्यावहारिक कदम हो सकती है।