एयर इंडिया फ्लाइट 182 और हिंसा का वैश्वीकरण
ऑपरेशन ब्लू स्टार (1984): पृष्ठभूमि, सैन्य कार्रवाई और दीर्घकालीन प्रभाव

23 जून 1985 को एयर इंडिया फ्लाइट 182 अटलांटिक महासागर के ऊपर बम विस्फोट से नष्ट हुई और विमान में सवार सभी 329 लोग मारे गए, जिनमें बड़ी संख्या कनाडाई नागरिक और 82 बच्चे थे। उसी दिन जापान के नारिता हवाई अड्डे पर दूसरे सामान-बम के विस्फोट में दो बैगेज कर्मचारी मारे गए। कनाडाई जांच ने बब्बर खालसा से जुड़े खालिस्तानी उग्रवाद को केंद्र में रखा और खुफिया तथा पुलिस समन्वय की गंभीर विफलताएं पाईं।
यह हमला ब्लू स्टार और नवंबर 1984 के प्रतिशोधी चरमपंथ के अंतरराष्ट्रीय विस्तार का सबसे घातक उदाहरण था। पीड़ितों में अधिकांश भारतीय मूल के, अनेक सिख भी थे। किसी समुदाय के नाम पर की गई हिंसा अंततः उसी समुदाय के लोगों को भी मारती है।
कनाडा की सार्वजनिक जांच ने केवल अपराधियों पर नहीं, राज्य संस्थाओं पर भी प्रश्न उठाए—पूर्व चेतावनियों का मूल्यांकन, निगरानी रिकॉर्ड का नष्ट होना, एजेंसियों के बीच सूचना न साझा करना और पीड़ित परिवारों के प्रति उदासीनता। भारत के लिए भी सबक था कि प्रवासी उग्रवाद को केवल विदेश नीति की शिकायत न मानकर आपराधिक वित्त, प्रचार और विमान सुरक्षा के समन्वित ढांचे से देखना होगा। साथ ही शांतिपूर्ण खालिस्तान समर्थक अभिव्यक्ति और हिंसक षड्यंत्र में कानूनी अंतर बनाए रखना जरूरी है।
23 जून 1985 को एयर इंडिया की उड़ान 182 अटलांटिक महासागर के ऊपर बम विस्फोट से नष्ट हुई और 329 लोग मारे गए। उसी दिन जापान के नारिता हवाईअड्डे पर दूसरे एयर इंडिया विमान के लिए भेजे गए सामान में विस्फोट से दो कर्मचारियों की मृत्यु हुई। जांचों ने इन घटनाओं को कनाडा-आधारित खालिस्तानी चरमपंथी नेटवर्क से जोड़ा। यह ब्लू स्टार के बाद प्रतिशोध की भाषा के अंतरराष्ट्रीय आतंकवाद में बदलने का सबसे घातक उदाहरण बना।
कनाडाई जांच और बाद की सार्वजनिक समीक्षा ने खुफिया एजेंसियों के बीच समन्वय, निगरानी रिकॉर्ड के संरक्षण और समुदाय से मिली चेतावनियों पर कार्रवाई की विफलताएं रेखांकित कीं। पीड़ितों में अधिकांश कनाडाई नागरिक और भारतीय मूल के परिवार थे। इस घटना को किसी पूरे प्रवासी समुदाय पर आरोप की तरह नहीं, हिंसक नेटवर्क की समय रहते पहचान और विमानन सुरक्षा की संस्थागत असफलता के रूप में पढ़ना चाहिए।