सेना बुलाने का निर्णय और कमान
ऑपरेशन ब्लू स्टार (1984): पृष्ठभूमि, सैन्य कार्रवाई और दीर्घकालीन प्रभाव
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मई के अंतिम दिनों में सेना को पंजाब में नागरिक प्रशासन की सहायता के लिए बुलाने का निर्णय हुआ। थलसेनाध्यक्ष जनरल ए.एस. वैद्य थे। पश्चिमी कमान के प्रमुख लेफ्टिनेंट जनरल के. सुंदरजी ने समग्र सैन्य योजना की निगरानी की। लेफ्टिनेंट जनरल रणजीत सिंह दयाल और मेजर जनरल कुलदीप सिंह बराड़ प्रमुख संचालन भूमिकाओं में थे। बराड़ स्वयं सिख पृष्ठभूमि के अधिकारी थे; सेना की टुकड़ियों में अनेक सिख अधिकारी और जवान भी थे। इससे यह तथ्य रेखांकित होता है कि इसे “हिंदू सेना बनाम सिख” युद्ध कहना गलत है, भले ही बड़ी संख्या में सिखों ने इसे सामुदायिक आघात माना।
सेना को एक असामान्य काम मिला। प्रशिक्षण का मूल लक्ष्य बाहरी दुश्मन से युद्ध था, न कि अपने देश के सबसे पवित्र धार्मिक परिसरों में नागरिकों के बीच सटीक पुलिस कार्रवाई। कमांडरों को हथियारबंद प्रतिरोध समाप्त करना था, हरमंदिर साहिब को नुकसान से बचाना था, तीर्थयात्रियों और धार्मिक कर्मचारियों की जान बचानी थी और समय भी बहुत कम था। इन उद्देश्यों में अंतर्निहित टकराव था।
सरकारी विवरण कहता है कि सेना ने पहले आत्मसमर्पण की अपीलें कीं और न्यूनतम बल का प्रयास किया। सैन्य संस्मरण बताते हैं कि हरमंदिर की दिशा में गोली न चलाने के निर्देश थे और जूते उतारकर या सिर ढककर प्रवेश जैसी धार्मिक सावधानियां अपनाई गईं। आलोचक कहते हैं कि टैंक, तोप-जैसी सीधी फायरिंग, सीमित निकासी और संचारबंदी “न्यूनतम बल” के दावे को कमजोर करते हैं। दोनों बातें एक साथ संभव हैं: मैदानी सैनिकों ने पवित्रता बचाने का प्रयास किया, लेकिन समग्र योजना अंततः भारी हथियार के प्रयोग तक पहुंची।
तैयारी की समय-सीमा
बराड़ के अनुसार उन्हें बहुत कम सूचना पर बुलाया गया और ऑपरेशन की विस्तृत योजना कुछ दिनों में बनाई गई। परिसर की प्रतिकृति या नक्शों पर अभ्यास की खबरें हैं, लेकिन खुफिया सूचना अपूर्ण थी। रक्षात्मक मोर्चों की वास्तविक शक्ति, भूमिगत रास्तों, हथियारों और लड़ाकों की संख्या का कम अनुमान लगाया गया। गुरुपर्व के कारण उपस्थित नागरिकों की विश्वसनीय गणना नहीं थी।
इतनी संवेदनशील कार्रवाई के लिए कुछ दिनों की सामरिक तैयारी और वर्षों के राजनीतिक संकट के बीच विसंगति स्पष्ट है। राज्य के पास समस्या देखने के लिए लंबा समय था, पर अंतिम उपकरण सेना को बहुत देर से और अधूरी जानकारी के साथ मिला। यह राजनीतिक विलंब का सैन्यीकरण था।