ऑपरेशन सनडाउन और वैकल्पिक योजनाएं
ऑपरेशन ब्लू स्टार (1984): पृष्ठभूमि, सैन्य कार्रवाई और दीर्घकालीन प्रभाव
बाद के वर्षों में पूर्व रॉ अधिकारी बी. रामन और अन्य स्रोतों ने “ऑपरेशन सनडाउन” नामक एक गुप्त योजना का उल्लेख किया। कथित योजना में विशेष बलों द्वारा भिंडरांवाले को गुरु नानक निवास या परिसर से बाहर निकलते समय पकड़ना था। एक मॉडल पर अभ्यास और हेलिबोर्न कमांडो विकल्प की चर्चा बताई गई। कहा गया कि नागरिक तथा कमांडो हताहतों का अनुमान सामने आने पर प्रधानमंत्री ने योजना स्वीकार नहीं की।
इस योजना के सभी दस्तावेज़ सार्वजनिक नहीं हैं, इसलिए इसके विवरण को पुष्ट आधिकारिक इतिहास नहीं माना जा सकता। फिर भी यह दो महत्वपूर्ण बातें बताता है। पहली, सरकार सैन्य कार्रवाई से महीनों पहले बलपूर्वक गिरफ्तारी के विकल्प सोच रही थी। दूसरी, सीमित कार्रवाई में भी नागरिक हानि का जोखिम पहचाना गया था। यदि उस समय जोखिम अत्यधिक माना गया, तो जून में कहीं बड़े हमले के समय नागरिकों की उपस्थिति और निकासी पर और कठोर योजना अपेक्षित थी।
2014 में ब्रिटेन द्वारा जारी दस्तावेज़ों से पता चला कि भारत ने फरवरी 1984 में ब्रिटिश सलाह मांगी थी और एक एसएएस अधिकारी ने भारत आकर संभावित कार्रवाई पर सलाह दी। ब्रिटिश कैबिनेट सचिव की समीक्षा ने इसे सीमित, सलाहकारी और मुख्य जून अभियान से कई महीने पहले का संपर्क बताया। ब्रिटिश सरकार ने कहा कि सलाह का प्रभाव वास्तविक ब्लू स्टार योजना पर सीमित था। ऑपरेशन कमांडर लेफ्टिनेंट जनरल कुलदीप सिंह बराड़ ने किसी ब्रिटिश भागीदारी से इनकार करते हुए कहा कि उन्हें जून में अलग परिस्थितियों में योजना बनाने का आदेश मिला।
संतुलित निष्कर्ष यह है कि ब्रिटिश परामर्श हुआ था; यह दावा कि ब्रिटिश सैनिकों ने जून की लड़ाई में हिस्सा लिया या पूरा अभियान लंदन ने बनाया, उपलब्ध प्रमाण से सिद्ध नहीं है। परामर्श का तथ्य भारत सरकार की पूर्व तैयारी और संसद तथा जनता से उस तैयारी की गोपनीयता पर वैध प्रश्न अवश्य उठाता है।
संभावित गैर-सैन्य या सीमित विकल्प
- प्रारंभिक पुलिस गिरफ्तारी: 1982–83 में, किलेबंदी से पहले, विशिष्ट मामलों के आरोपियों को गिरफ्तार करना।
- परिसर की नियंत्रित घेराबंदी: हथियार, गोला-बारूद और नए सशस्त्र व्यक्तियों का प्रवेश रोकना; भोजन-पानी को सामूहिक दंड की तरह रोकना नहीं।
- तीर्थयात्रियों की निकासी: खुली चेतावनी, धार्मिक मध्यस्थ और पर्याप्त समय देकर नागरिकों को बाहर निकालना।
- एसजीपीसी और तख्त नेतृत्व की पहल: पंथ के मान्य प्रतिनिधियों द्वारा हथियार हटाने का हुक्म; हालांकि उनकी क्षमता और सुरक्षा संदिग्ध थी।
- लक्षित कमांडो गिरफ्तारी: नेतृत्व को परिसर से बाहर या कम भीड़ वाले समय पकड़ना। जोखिम था कि गोलीबारी हरमंदिर तक फैल सकती थी।
- लंबी वार्ता और अलगाव: अकाली मांगों पर ठोस पैकेज घोषित करके संवैधानिक नेतृत्व को हथियारबंद समूह से अलग करना।
इनमें कोई विकल्प जोखिम-मुक्त नहीं था। घेराबंदी से लंबा टकराव, बंधक-जैसी स्थिति या देशभर से समर्थकों का मार्च हो सकता था। पुलिस की विश्वसनीयता कमजोर थी और परिसर से भारी गोलीबारी संभव थी। प्रश्न यह नहीं कि कोई जादुई विकल्प था; प्रश्न यह है कि क्या कम क्षति वाले विकल्पों को पर्याप्त समय, नेतृत्व और तैयारी मिली।