राष्ट्रीय और वैश्विक सिख प्रतिक्रिया
ऑपरेशन ब्लू स्टार (1984): पृष्ठभूमि, सैन्य कार्रवाई और दीर्घकालीन प्रभाव
कार्रवाई के तुरंत बाद पंजाब में शोक, भय और क्रोध था। संचारबंदी के कारण तथ्य देर से आए, जबकि अफवाहें तेजी से फैलीं। अकाल तख्त के ध्वंस की तस्वीरों ने घटना को स्थानीय कानून-व्यवस्था से उठाकर वैश्विक सिख पहचान का प्रश्न बना दिया। ब्रिटेन, कनाडा, अमेरिका और अन्य देशों के गुरुद्वारों में विरोध सभाएं हुईं। भारतीय दूतावासों के सामने प्रदर्शन हुए और प्रवासी राजनीति में खालिस्तान समर्थक संगठनों को नई ऊर्जा मिली।
प्रवासी समुदाय का अनुभव पंजाब से अलग था। दूर रहते हुए उनके पास दृश्य प्रतीक और पारिवारिक विवरण थे, प्रत्यक्ष स्थानीय जटिलता कम। कई प्रवासियों ने मानवीय राहत, अधिकार और न्याय की मांग की; कुछ संगठनों ने हिंसक अलगाववाद के लिए धन, प्रचार या नेटवर्क तैयार किए। पूरे प्रवासी सिख समाज को उग्रवादी वित्तपोषण से जोड़ना गलत है, लेकिन ब्लू स्टार ने चरमपंथी संगठनों को भर्ती का शक्तिशाली आख्यान दिया।
सिख धार्मिक शब्दावली में जून 1984 को कई लोग “तीसरा घल्लूघारा” कहते हैं—अठारहवीं शताब्दी के बड़े नरसंहारों की स्मृति से जोड़ते हुए। राज्य इस तुलना को अस्वीकार करता है क्योंकि लक्ष्य सिख समुदाय का संहार नहीं, हथियारबंद समूह था और सेना में सिख भी थे। इतिहासकार के लिए यहां उद्देश्य और सामुदायिक स्मृति का अंतर महत्वपूर्ण है। सरकारी उद्देश्य नरसंहार नहीं था; फिर भी समुदाय का बड़ा भाग घटना को ऐतिहासिक उत्पीड़न के प्रतिरूप में अनुभव कर सकता है।
मुख्यधारा सिख नेतृत्व के सामने कठिन कार्य था: अकाल तख्त की मर्यादा बहाल करना, मृतकों का शोक, बंदियों की रिहाई, राजनीतिक मांगों का पुनर्गठन और हिंसक प्रतिशोध से दूरी। लेकिन सरकारी नियंत्रण में पुनर्निर्माण, अकाली नेताओं की हिरासत और अविश्वास ने मध्यमार्गी नेतृत्व को कमजोर किया। खाली जगह अधिक उग्र समूहों ने भरी।
भारत के भीतर प्रतिक्रिया एकरूप नहीं थी। अनेक नागरिकों ने बढ़ती हत्याओं और राज्य-अधिकार के क्षय के कारण कार्रवाई को आवश्यक माना, जबकि बड़ी संख्या में सिखों ने स्थल, तिथि, प्रयुक्त बल और नागरिक मौतों को अस्वीकार्य समझा। कुछ मध्यमार्गी लोगों ने हथियारबंद कब्जे तथा सैन्य हमले दोनों की आलोचना की। यही तीसरा दृष्टिकोण सार्वजनिक बहस में अक्सर दब गया, क्योंकि संकट के बाद भाषा तेजी से राष्ट्र-समर्थन बनाम पंथ-समर्थन के द्वंद्व में बदल गई।
ब्रिटेन, कनाडा और अन्य देशों की सिख आबादी में विरोध-सभा, राहत-संग्रह, स्मृति आयोजन और राजनीतिक लामबंदी बढ़ी। इसी प्रवासी क्षेत्र में शांतिपूर्ण अधिकार अभियान के साथ बाद में हिंसक अलगाववादी नेटवर्क भी सक्रिय हुए। दोनों को एक मानना गलत है। लोकतांत्रिक देशों के लिए चुनौती थी कि वैध धार्मिक–राजनीतिक अभिव्यक्ति की रक्षा करते हुए धमकी, हिंसक वित्त और आतंकवादी योजना पर लक्षित कानून लागू किया जाए।