राजीव–लोंगोवाल समझौता और खोया अवसर
ऑपरेशन ब्लू स्टार (1984): पृष्ठभूमि, सैन्य कार्रवाई और दीर्घकालीन प्रभाव
राजीव गांधी के प्रधानमंत्री बनने के बाद राजनीतिक समाधान की नई कोशिश हुई। 24 जुलाई 1985 को प्रधानमंत्री राजीव गांधी और अकाली नेता संत हरचंद सिंह लोंगोवाल ने पंजाब समझौते पर हस्ताक्षर किए, जिसे राजीव–लोंगोवाल अकॉर्ड कहा जाता है। इसमें चंडीगढ़ पंजाब को देने, बदले में कुछ हिंदी-भाषी क्षेत्र हरियाणा को देने, नदी जल विवाद के लिए न्यायाधिकरण, निर्दोष बंदियों की रिहाई, सेना से निकाले गए व्यक्तियों के पुनर्वास और हिंसा-पीड़ितों के मुआवजे जैसे बिंदु थे।
समझौता इस स्वीकारोक्ति जैसा था कि पंजाब संकट का अंत सैन्य कार्रवाई से नहीं, राजनीतिक संघीय समाधान से होगा। मध्यमार्गी अकाली नेतृत्व को पुनः स्थान मिला और चुनाव का रास्ता खुला। लेकिन क्रियान्वयन समय पर नहीं हुआ। चंडीगढ़ हस्तांतरण टलता गया, क्षेत्रीय आयोग विवादित हुआ और जल प्रश्न न्यायिक-राजनीतिक चक्र में फंसा रहा।
20 अगस्त 1985 को उग्रवादियों ने लोंगोवाल की हत्या कर दी। उनके लिए समझौता “समर्पण” था। इससे दोहरा नुकसान हुआ: हिंसक समूहों ने मध्यमार्गी वार्ताकार को खत्म किया और केंद्र पर भरोसा करने वाले सिखों को संदेश मिला कि न तो सुरक्षा सुनिश्चित है, न वादों का समयबद्ध पालन।
सितंबर 1985 के चुनाव में सुरजीत सिंह बरनाला के नेतृत्व में अकाली दल सरकार बनी। यह लोकतांत्रिक सामान्यीकरण का अवसर था, पर उग्रवादी हिंसा, आंतरिक अकाली विभाजन और केंद्र के साथ तनाव ने सरकार कमजोर की। 1987 में पुनः राष्ट्रपति शासन लगा। समझौते की अधूरी क्रियान्विति आज भी संघीय वादे की विश्वसनीयता पर प्रश्न है।
समझौते ने दिखाया कि जिन प्रश्नों को लंबे समय तक सुरक्षा समस्या मानकर टाला गया था, वे अंततः राजनीतिक वार्ता की मेज पर ही लौटे। चंडीगढ़ का हस्तांतरण, नदी जल विवाद, सीमा आयोग, सेना से निकले लोगों और पीड़ितों से जुड़े उपाय तथा सामान्यीकरण का खाका इसमें शामिल था। यह पूर्ण समाधान नहीं था, पर केंद्र और निर्वाचित अकाली नेतृत्व के बीच वैध संवाद की पुनर्स्थापना थी।
लोंगोवाल की हत्या ने समझौते को राजनीतिक संरक्षण देने वाले प्रमुख सिख नेता को हटा दिया। बाद में लागू करने की समय-सीमाएं टूटीं और चंडीगढ़ सहित महत्वपूर्ण प्रश्न अधूरे रहे। इससे उग्रवादियों को यह कहने का अवसर मिला कि संवैधानिक समझौते से परिणाम नहीं मिलता। शांति समझौते की विश्वसनीयता हस्ताक्षर से नहीं, समयबद्ध क्रियान्वयन, सार्वजनिक प्रगति और विवाद समाधान की स्वतंत्र व्यवस्था से बनती है।