जनरल वैद्य की हत्या और प्रतिशोध की लंबी छाया
ऑपरेशन ब्लू स्टार (1984): पृष्ठभूमि, सैन्य कार्रवाई और दीर्घकालीन प्रभाव
ऑपरेशन के समय थलसेनाध्यक्ष रहे जनरल अरुण श्रीधर वैद्य सेवा-निवृत्ति के बाद पुणे में रहते थे। 10 अगस्त 1986 को खालिस्तान कमांडो फोर्स से जुड़े हमलावरों ने उनकी गोली मारकर हत्या कर दी। हत्यारों ने इसे ब्लू स्टार का बदला बताया। ऑपरेशन के कमांडर कुलदीप सिंह बराड़ पर 2012 में लंदन में हमला हुआ, जिसमें वे घायल हुए।
ये हमले दिखाते हैं कि राजनीतिक निर्णय को व्यक्तिगत प्रतिशोध की सूची में बदल दिया गया था। लोकतांत्रिक व्यवस्था में सैन्य कमांडरों के निर्णय की संसदीय, न्यायिक और ऐतिहासिक समीक्षा हो सकती है; हत्या न्याय नहीं है। दूसरी ओर, राज्य यदि स्वतंत्र जांच और जवाबदेही का रास्ता बंद रखे तो हिंसक समूह “न्याय” की भाषा हथिया लेते हैं। इसलिए पारदर्शी जवाबदेही सुरक्षा अधिकारियों की रक्षा का भी साधन है।
सेना प्रमुख के रूप में जनरल अरुण श्रीधर वैद्य ने ऑपरेशन की सर्वोच्च सैन्य जिम्मेदारी संभाली थी। सेवानिवृत्ति के बाद वे पुणे में अपेक्षाकृत साधारण जीवन बिता रहे थे। 10 अगस्त 1986 को मोटरसाइकिल सवार हमलावरों ने उनकी कार पर गोली चलाई और उनकी मृत्यु हो गई; उनकी पत्नी घायल हुईं। खालिस्तान कमांडो फोर्स से जुड़े हमलावरों ने इसे ब्लू स्टार का प्रतिशोध बताया।
जिंदा और सुखदेव सिंह सुक्खा की गिरफ्तारी, मुकदमा और दंड ने इस हत्या को लंबी कानूनी तथा स्मृति-राजनीतिक कथा बना दिया। उग्रवादी विमर्श में हत्यारों को शहीद बनाया गया, जबकि राज्य के लिए हमला सेवानिवृत्त सैन्य नेतृत्व पर आतंकवादी प्रतिशोध था। यह प्रकरण बताता है कि सैन्य कार्रवाई की व्यक्तिगत जिम्मेदारी तय करने वाला प्रचार वर्षों बाद भी अधिकारियों और उनके परिवारों के लिए वास्तविक सुरक्षा खतरा बन सकता है।
रणनीतिक रूप से हत्या ने कोई राजनीतिक समाधान नहीं दिया; उसने प्रतिशोध की श्रृंखला को आगे बढ़ाया और संवाद की जगह प्रतीकात्मक हत्या को प्रतिष्ठा दी। लोकतंत्र में सैन्य निर्णय की आलोचना, स्वतंत्र जांच और कानूनी जवाबदेही संभव है, पर व्यक्तिगत हत्या ऐतिहासिक न्याय नहीं बन सकती।