1984 की शुरुआत—हिंसा, वार्ता और बंद होते विकल्प
ऑपरेशन ब्लू स्टार (1984): पृष्ठभूमि, सैन्य कार्रवाई और दीर्घकालीन प्रभाव
जनवरी से मई 1984 के बीच पंजाब में हत्याओं और बम विस्फोटों की आवृत्ति बढ़ी। सरकारी श्वेतपत्र ने इसे संगठित आतंक और राज्य-विरोधी विद्रोह की ओर बढ़ता संकट बताया। अकाली नेतृत्व का कहना था कि केंद्र वास्तविक राजनीतिक मांगों को सुरक्षा समस्या बनाकर प्रस्तुत कर रहा है। इन परस्पर विरोधी कथनों के बीच सामान्य नागरिक की स्थिति सबसे असुरक्षित थी।
फरवरी 1984 में अकाली आंदोलन और पुलिस के बीच टकराव हुए। हरियाणा में सिख-विरोधी हिंसा और पंजाब में हिंदुओं की हत्याओं ने अंतर-सामुदायिक संबंधों को और बिगाड़ा। अप्रैल में भाजपा नेता हरबंस लाल खन्ना की हत्या और उसके बाद हिंसा हुई। 12 मई को हिंद समाचार समूह के संपादक रमेश चंदर की हत्या ने प्रेस को लक्ष्य बनाए जाने का संदेश दिया। 23 मई को अकाली नेतृत्व ने 3 जून से “अनाज रोको” आंदोलन घोषित किया—पंजाब से खाद्यान्न बाहर जाने और राजस्व भुगतान को रोकने की योजना। केंद्र ने इसे राष्ट्रीय खाद्य आपूर्ति और संवैधानिक व्यवस्था के लिए सीधी चुनौती माना।
प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने 2 जून को राष्ट्र के नाम प्रसारण में अकाली नेतृत्व से आंदोलन छोड़ने और समाधान का अवसर देने की अपील की। उसी समय सेना पंजाब में तैनात हो चुकी थी। आलोचकों के लिए यह प्रसारण वास्तविक वार्ता के बजाय पहले से तय कार्रवाई की पूर्वपीठिका था; सरकारी पक्ष के अनुसार अंतिम क्षण तक शांतिपूर्ण रास्ता खुला था। अभिलेख बताते हैं कि निर्णय-प्रक्रिया पूरी तरह पारदर्शी नहीं थी और राजनीतिक, खुफिया तथा सैन्य चैनलों में सूचना सीमित रखी गई।
वार्ता विफल होने के कारण
- मांगों का पैकेज: धार्मिक मांगें अपेक्षाकृत सुलझने योग्य थीं, पर चंडीगढ़, नदी जल और संघीय शक्तियां दूसरे राज्यों तथा संविधान से जुड़ी थीं।
- विश्वास का अभाव: अकाली नेताओं को आशंका थी कि केंद्र समझौता घोषित कर बाद में बदल देगा; केंद्र को आशंका थी कि रियायत के बाद नई मांग उठेगी।
- बहु-केंद्रीय नेतृत्व: लोंगोवाल, गुरचरण सिंह टोहरा, प्रकाश सिंह बादल और भिंडरांवाले की प्राथमिकताएं एक नहीं थीं। दिल्ली भी प्रधानमंत्री कार्यालय, गृह मंत्रालय, कांग्रेस संगठन और पंजाब प्रशासन में एकसमान नहीं थी।
- हिंसा का वीटो: हर नई हत्या समझौते को “आतंक के सामने झुकना” बनाती; हर पुलिस अत्याचार उग्रवादी प्रचार को शक्ति देता।
- समय का राजनीतिक उपयोग: दोनों पक्ष वार्ता को कभी समाधान के बजाय दबाव, चुनावी स्थिति या प्रतिद्वंद्वी को कमजोर करने के साधन की तरह इस्तेमाल करते रहे।
- गोपनीयता और अफवाह: लिखित सहमति सार्वजनिक होने से पहले बदलती रही। विश्वसनीय साझा तथ्य-आधार नहीं बना।
वार्ता की असफलता का अर्थ सैन्य कार्रवाई की अनिवार्यता नहीं था। वह केवल यह दिखाती है कि उपलब्ध राजनीतिक प्रक्रिया कमजोर पड़ गई थी। अनिवार्यता का दावा तभी मजबूत होता जब अन्य विकल्प समय रहते गंभीरता और पेशेवर तैयारी से आजमाए गए होते।