परिसर की किलेबंदी और शाबेग सिंह की भूमिका
ऑपरेशन ब्लू स्टार (1984): पृष्ठभूमि, सैन्य कार्रवाई और दीर्घकालीन प्रभाव
पूर्व मेजर जनरल शाबेग सिंह बांग्लादेश मुक्ति युद्ध में विशेष अभियान और मुक्ति वाहिनी प्रशिक्षण से जुड़े अनुभवी अधिकारी थे। सेवा से बर्खास्तगी और कानूनी विवाद के बाद वे अकाली आंदोलन तथा भिंडरांवाले के करीब आए। सेना और सरकारी विवरणों के अनुसार उन्होंने परिसर की रक्षा-व्यवस्था को सैन्य रूप दिया—फायरिंग पोजीशन, रेत की बोरियां, परस्पर सहायक मोर्चे, संचार, गोला-बारूद और ऊंची इमारतों का उपयोग।
किलेबंदी की सीमा पर विवरण अलग हैं, लेकिन जून 1984 की लड़ाई में स्वचालित हथियार, हल्की मशीनगन, ग्रेनेड, बारूदी सामग्री और मजबूत रक्षात्मक स्थानों का होना निर्विवाद है। अकाल तख्त, रामगढ़िया बुंगों, पानी की टंकी, लंगर भवन और आसपास की इमारतों से आने वाली गोलीबारी ने प्रवेश कर रही सेना को भारी नुकसान पहुंचाया। सेना का अनुमान था कि कमांडो कार्रवाई और पैदल सेना अपेक्षाकृत जल्दी लक्ष्य प्राप्त कर लेंगे; वास्तविक प्रतिरोध अधिक संगठित निकला।
यह भी ध्यान रखना चाहिए कि सरकारी प्रचार में बरामद प्रत्येक हथियार को “विदेशी युद्ध” का प्रमाण बताने की प्रवृत्ति रही, जबकि पंजाब में लाइसेंसी, तस्करी के और पुलिस/सुरक्षा बलों से लूटे गए हथियारों का मिश्रण था। पाकिस्तान से प्रशिक्षण, शरण और हथियारों के संबंध बाद के उग्रवाद में अधिक स्पष्ट हुए; जून 1984 से पहले की प्रत्येक बंदूक को सीमा-पार आपूर्ति से जोड़ना बिना विशिष्ट प्रमाण के उचित नहीं।
सबसे गंभीर प्रशासनिक प्रश्न है: यदि किलेबंदी महीनों से दिख रही थी, तो राज्य ने प्रारंभिक चरण में गैर-सैन्य रोकथाम क्यों नहीं की? परिसर में निर्माण सामग्री और हथियार प्रवेश रोकना, बाहरी इमारतों पर नियंत्रण, वांछित लोगों की आवाजाही पर कार्रवाई, धार्मिक मध्यस्थता और नियंत्रित घेराबंदी जैसे उपाय समय रहते अधिक प्रभावी हो सकते थे। देरी ने अंततः सेना को ऐसी रक्षात्मक संरचना से लड़ने पर मजबूर किया जिसकी राजनीतिक लागत असाधारण थी।
किलेबंदी केवल हथियार जमा करने का प्रश्न नहीं थी; वह स्थल की वास्तुकला को सैन्य लाभ में बदलने की प्रक्रिया थी। ऊंची इमारतों से परिक्रमा और प्रवेश मार्गों पर निगरानी, रेत की बोरियों के मोर्चे, संकरे रास्तों में फायर की दिशा तथा संपर्क मार्गों की जानकारी ने रक्षकों को लाभ दिया। धार्मिक परिसर के सामान्य आवागमन के बीच यह तैयारी लंबे समय तक पूर्ण रूप से अलग दिखाई नहीं दी और प्रशासन ने भी समय रहते व्यवस्थित नक्शा तथा स्वतंत्र खुफिया चित्र तैयार नहीं किया।
शाबेग सिंह का महत्व उनके सैन्य अनुभव के कारण था, लेकिन प्रत्येक रक्षा-व्यवस्था को केवल उन्हीं की योजना मानना सावधानी मांगता है। परिसर में अनेक समूह, स्थानीय समर्थक और अलग-अलग स्तर के हथियारबंद व्यक्ति थे। फिर भी प्रशिक्षण, फायर अनुशासन और रणनीतिक स्थानों के चयन ने सेना को अपेक्षा से कठिन प्रतिरोध दिया। इससे एक व्यापक सबक निकलता है: पवित्र स्थल की मर्यादा के कारण आरंभिक कानून-प्रवर्तन टलता रहे तो बाद में वही स्थल अधिक विनाशकारी सैन्य परिस्थिति में बदल सकता है।