विस्तृत तारीखवार घटनाक्रम
ऑपरेशन ब्लू स्टार (1984): पृष्ठभूमि, सैन्य कार्रवाई और दीर्घकालीन प्रभाव
1947–1977 : ऐतिहासिक आधार
अगस्त 1947: भारत-विभाजन में पंजाब दो देशों में बंटा। अभूतपूर्व विस्थापन और साम्प्रदायिक हत्याओं ने सिख, हिंदू और मुसलमान समाज पर स्थायी घाव छोड़ा।
1950–60 का दशक: अकाली दल ने पंजाबी-भाषी राज्य की मांग तेज की। केंद्र ने मांग को कभी भाषाई, कभी साम्प्रदायिक दृष्टि से देखा।
1 नवंबर 1966: पंजाब पुनर्गठन लागू। हरियाणा अलग राज्य बना, पर्वतीय क्षेत्र हिमाचल से जुड़े और चंडीगढ़ केंद्रशासित संयुक्त राजधानी बना। जल तथा क्षेत्रीय विवाद शेष रहे।
16–17 अक्टूबर 1973: अकाली कार्यसमिति ने आनंदपुर साहिब प्रस्ताव स्वीकार किया। बाद में पार्टी मंचों ने इसे अनुमोदित किया।
1975–77: आपातकाल के दौरान अकाली दल ने विरोध किया। इससे वह नागरिक स्वतंत्रता और संघीय अधिकार के पक्षधर दल के रूप में उभरा; केंद्र–अकाली अविश्वास बढ़ा।
1977: जर्नैल सिंह भिंडरांवाले दमदमी टकसाल के प्रमुख बने। पंजाब में अकाली सरकार सत्ता में आई।
1978–1981 : धार्मिक संघर्ष से राजनीतिक उभार
13 अप्रैल 1978: अमृतसर में निरंकारी सम्मेलन का विरोध करने गए सिखों और निरंकारियों में संघर्ष; 13 सिख और तीन निरंकारी मारे गए। घटना ने कट्टर धार्मिक लामबंदी को बल दिया।
1978–79: भिंडरांवाले ने पंजाबभर में प्रचार यात्राएं कीं। धार्मिक अनुशासन, अमृतपान और निरंकारी-विरोध उनके संदेश के केंद्र बने।
24 अप्रैल 1980: निरंकारी प्रमुख गुरबचन सिंह की दिल्ली में हत्या। जांच में भिंडरांवाले से जुड़े लोगों पर संदेह, पर अलग-अलग आरोपों की कानूनी स्थिति जटिल रही।
9 सितंबर 1981: लाला जगत नारायण की हत्या। वे भिंडरांवाले और अलगाववादी धार्मिक राजनीति के आलोचक थे।
20 सितंबर 1981 के आसपास: भिंडरांवाले ने मेहता चौक में गिरफ्तारी दी। समर्थकों और पुलिस में हिंसक घटनाएं हुईं।
अक्टूबर 1981: पर्याप्त साक्ष्य न होने की सरकारी घोषणा के बाद भिंडरांवाले रिहा। गिरफ्तारी ने उनका कद घटाने के बजाय बढ़ाया।
1982 : धर्म युद्ध मोर्चा और ध्रुवीकरण
अप्रैल 1982: सतलुज–यमुना लिंक नहर के निर्माण और जल-वितरण के विरुद्ध अकाली आंदोलन ने जोर पकड़ा।
जुलाई 1982: भिंडरांवाले गुरु नानक निवास में आए। परिसर से जुड़े आवास ने गिरफ्तारी को अत्यंत संवेदनशील बनाया।
4 अगस्त 1982: अकाली दल ने धर्म युद्ध मोर्चा शुरू किया। हजारों स्वयंसेवकों ने शांतिपूर्वक गिरफ्तारी दी; भिंडरांवाले ने समर्थन किया।
नवंबर–दिसंबर 1982: दिल्ली एशियाई खेलों के दौरान हरियाणा सीमा पर सिख यात्रियों की कठोर तलाशी। प्रतिष्ठित सिख नागरिकों के अपमान की खबरों से सामुदायिक आक्रोश बढ़ा।
1983 : राज्य-अधिकार का क्षय
25 अप्रैल 1983: डीआईजी ए.एस. अटवाल की हरमंदिर साहिब से बाहर निकलते समय हत्या। पुलिस तत्काल परिसर में प्रवेश नहीं करती; यह राज्य की कमजोरी का निर्णायक प्रतीक बना।
मध्य 1983: पत्रकारों, पुलिस, निरंकारियों, राजनीतिक प्रतिद्वंद्वियों और नागरिकों पर हमले बढ़ते गए। परिसर में हथियारबंद समर्थकों की संख्या और मोर्चे बढ़े।
5 अक्टूबर 1983: ढिलवां के पास बस से यात्रियों को उतारकर छह हिंदुओं की हत्या। साम्प्रदायिक भय तेजी से बढ़ा।
6 अक्टूबर 1983: दरबारा सिंह सरकार बर्खास्त; पंजाब में राष्ट्रपति शासन।
15 दिसंबर 1983 के आसपास: भिंडरांवाले अकाल तख्त में चले गए। पूर्व मेजर जनरल शाबेग सिंह से जुड़ी सैन्य तैयारी अधिक स्पष्ट हुई।
जनवरी–मई 1984 : निर्णायक संकट
जनवरी–फरवरी 1984: केंद्र–अकाली वार्ता जारी, पर चंडीगढ़, जल और संघवाद पर ठोस समझौता नहीं। पंजाब तथा हरियाणा में साम्प्रदायिक हिंसा और पुलिस टकराव।
फरवरी 1984: ब्रिटिश अभिलेखों के अनुसार एक एसएएस अधिकारी ने भारत आकर संभावित सीमित कार्रवाई पर सलाह दी। यह जून अभियान में प्रत्यक्ष भागीदारी का प्रमाण नहीं।
3 अप्रैल 1984: भाजपा नेता हरबंस लाल खन्ना की अमृतसर में हत्या; बाद में हिंसा और तनाव।
12 मई 1984: हिंद समाचार समूह के संपादक रमेश चंदर की हत्या। प्रेस पर लक्षित हिंसा का गंभीर उदाहरण।
23 मई 1984: अकाली दल ने 3 जून से अनाज रोको अभियान की घोषणा की। केंद्र ने राष्ट्रीय आपूर्ति और कानून-व्यवस्था पर खतरा माना।
अंतिम सप्ताह, मई 1984: सेना को पंजाब में तैनाती और धार्मिक परिसरों को खाली कराने की तैयारी का आदेश। संचालन योजना बहुत कम समय में अंतिम रूप लेती है।
1–10 जून 1984 : ऑपरेशन
1 जून: सुरक्षा बलों और परिसर के भीतर से गोलीबारी; हताहत और इमारतों को क्षति। आरंभ किसने किया, विवरण विवादित।
2 जून: सेना ने अमृतसर के आसपास नियंत्रण बढ़ाया। इंदिरा गांधी ने राष्ट्र को संबोधित कर अकाली आंदोलन वापस लेने की अपील की।
3 जून: पंजाब में व्यापक कर्फ्यू, रेल/बस/फोन संपर्क बंद। गुरु अर्जन देव शहीदी गुरुपर्व के कारण परिसर में बड़ी संख्या में श्रद्धालु। अनाज रोको आंदोलन इसी दिन शुरू होना था।
4 जून: गोलीबारी तीव्र। ऊंचे मोर्चों पर फायर; पानी, बिजली और चिकित्सा संकट। बाहर आने की घोषणाओं पर सीमित निकासी।
5 जून, दिन: परिसर के बाहरी भवन और आसपास की स्थिति पर सेना का दबाव। अंतिम आत्मसमर्पण अपीलों का दावा।
5 जून, शाम से 6 जून सुबह: मुख्य सैन्य हमला। कई प्रवेश मार्गों से पैदल सेना और कमांडो आगे बढ़े; तीव्र मशीनगन तथा अन्य फायर से भारी सैन्य हानि।
6 जून, तड़के: अकाल तख्त के मजबूत मोर्चों पर टैंक और भारी सीधा फायर। भवन को व्यापक क्षति।
6 जून, दिन: भिंडरांवाले, शाबेग सिंह और अमरीक सिंह मारे गए पाए गए। विभिन्न इमारतों में आत्मसमर्पण तथा तलाशी।
7 जून: सेना का अकाल तख्त और मुख्य परिसर पर प्रभावी नियंत्रण। शव हटाने, बंदियों की छंटाई और हथियार संग्रह की प्रक्रिया।
8–10 जून: छिटपुट प्रतिरोध, स्नाइपर और तलाशी जारी। पंजाब के अन्य धार्मिक स्थलों पर भी कार्रवाई। वुडरोज का ग्रामीण चरण आरंभ।
जून–दिसंबर 1984 : तात्कालिक परिणाम
जून 1984: सेना द्वारा अकाल तख्त पुनर्निर्माण की सरकारी पहल; समुदाय में अस्वीकृति। देश की कुछ छावनियों में सिख सैनिकों का विद्रोह।
10 जुलाई 1984: भारत सरकार ने पंजाब आंदोलन और ब्लू स्टार पर श्वेतपत्र संसद के समक्ष रखा। इसमें आधिकारिक घटनाक्रम तथा हताहत प्रकाशित हुए।
सितंबर 1984: सेना ने धीरे-धीरे धार्मिक परिसर एसजीपीसी को लौटाने की प्रक्रिया आगे बढ़ाई; पुनर्निर्माण और नियंत्रण पर विवाद जारी।
31 अक्टूबर 1984: इंदिरा गांधी की अंगरक्षकों बेअंत सिंह और सतवंत सिंह द्वारा हत्या।
31 अक्टूबर–3 नवंबर 1984: दिल्ली और अन्य शहरों में सिख-विरोधी सामूहिक हत्याएं; पुलिस और राजनीतिक जवाबदेही पर दीर्घ विवाद।
दिसंबर 1984: लोकसभा चुनाव में कांग्रेस को भारी बहुमत; पंजाब में सुरक्षा संकट जारी।
1985–1995 : समझौता, उग्रवाद और सामान्यीकरण
23 जून 1985: एयर इंडिया फ्लाइट 182 बम से नष्ट; 329 मौतें। खालिस्तानी उग्रवाद का सबसे घातक अंतरराष्ट्रीय हमला।
24 जुलाई 1985: राजीव–लोंगोवाल समझौता। पंजाब के राजनीतिक प्रश्नों के समाधान का नया प्रयास।
20 अगस्त 1985: संत हरचंद सिंह लोंगोवाल की हत्या।
सितंबर 1985: पंजाब विधानसभा चुनाव; सुरजीत सिंह बरनाला के नेतृत्व में अकाली सरकार।
29–30 अप्रैल 1986: पहला ऑपरेशन ब्लैक थंडर। स्वर्ण मंदिर से हथियारबंद व्यक्तियों को निकालने की सीमित कार्रवाई।
10 अगस्त 1986: पूर्व थलसेनाध्यक्ष जनरल ए.एस. वैद्य की पुणे में हत्या।
मई 1987: बरनाला सरकार बर्खास्त; पंजाब में राष्ट्रपति शासन।
मई 1988: ऑपरेशन ब्लैक थंडर II; घेराबंदी और आत्मसमर्पण-केंद्रित रणनीति, सीमित संरचनात्मक क्षति।
1988–91: उग्रवादी हिंसा और कठोर पुलिस प्रतिउग्रवाद दोनों का विस्तार। नागरिक, पुलिस, पत्रकार और राजनीतिक कार्यकर्ता बड़ी संख्या में प्रभावित।
फरवरी 1992: बहिष्कार और कम मतदान के बीच विधानसभा चुनाव; बेअंत सिंह के नेतृत्व में कांग्रेस सरकार।
1992–95: पुलिस अभियान, उग्रवादी गुटों के क्षय और सामाजिक समर्थन घटने से हिंसा में तेज कमी; मानवाधिकार उल्लंघन के आरोप साथ-साथ।
31 अगस्त 1995: पंजाब के मुख्यमंत्री बेअंत सिंह की चंडीगढ़ में आत्मघाती बम से हत्या। उग्रवाद कमजोर हो चुका था, पर हिंसक नेटवर्क पूरी तरह समाप्त नहीं थे।