इंदिरा गांधी ने चुनाव क्यों कराया?
लोकतंत्र का काला अध्याय: आपातकाल (1975–1977)
18 जनवरी 1977 को इंदिरा गांधी ने लोकसभा चुनाव कराने की घोषणा की। यह निर्णय आज भी इतिहासकारों के लिए प्रश्न है। यदि सत्ता इतनी केंद्रीकृत थी और विपक्ष नियंत्रित था, तो उन्होंने ऐसा चुनाव क्यों कराया जिसमें पराजय संभव थी?
संभावित कारण
एक कारण यह विश्वास हो सकता है कि जनता अनुशासन, आर्थिक स्थिरता और 20 सूत्री कार्यक्रम से संतुष्ट है। सेंसरशिप के कारण शासक वर्ग तक वास्तविक असंतोष की जानकारी सीमित पहुंच रही थी। अधिकारी लक्ष्य-पूर्ति और जनसमर्थन की सकारात्मक रिपोर्ट देते थे। भीड़भरी सरकारी रैलियों को लोकप्रियता का प्रमाण समझा गया होगा।
दूसरा कारण अंतरराष्ट्रीय और घरेलू वैधता था। लंबे आपातकाल ने भारत की लोकतांत्रिक प्रतिष्ठा को नुकसान पहुंचाया। चुनाव जीतकर इंदिरा गांधी अपने आलोचकों को उत्तर दे सकती थीं कि जनता ने उनके निर्णय की पुष्टि कर दी है। तीसरा, कांग्रेस संगठन और खुफिया आकलन ने संभवतः स्पष्ट पराजय का अनुमान नहीं लगाया। दक्षिण भारत तथा कुछ राज्यों में सरकार के प्रति समर्थन बना हुआ था।
कुछ विश्लेषक मानते हैं कि इंदिरा गांधी लोकतांत्रिक संस्कार से पूरी तरह अलग नहीं हुई थीं और अंततः जनादेश चाहती थीं। यह व्याख्या उनके निर्णय का महत्वपूर्ण पक्ष है: उन्होंने चुनाव कराया, परिणाम स्वीकार किया और सत्ता हस्तांतरित की। पर इससे पहले के 21 महीनों की जवाबदेही समाप्त नहीं होती। लोकतांत्रिक वापसी प्रशंसनीय थी, लेकिन उसने लोकतंत्र के निलंबन को पूर्वव्यापी वैधता नहीं दी।
बंदियों की रिहाई और सेंसरशिप में ढील
चुनाव की घोषणा के बाद विपक्षी नेता रिहा होने लगे, प्रेस नियंत्रण में ढील दी गई और राजनीतिक सभाओं की अनुमति मिली। आपातकाल औपचारिक रूप से अभी लागू था, इसलिए चुनाव पूरी तरह सामान्य संवैधानिक वातावरण में शुरू नहीं हुआ। फिर भी कुछ ही सप्ताह में विपक्ष ने राष्ट्रीय संगठन बनाया और मतदाताओं तक आपातकाल के अनुभव पहुंचाए।