43वां और 44वां संविधान संशोधन: भविष्य के लिए सुरक्षा दीवार
लोकतंत्र का काला अध्याय: आपातकाल (1975–1977)
जनता सरकार ने आपातकालीन संशोधनों को पलटने और संवैधानिक संतुलन बहाल करने के लिए 43वां तथा 44वां संशोधन पारित किया। 43वें संशोधन ने 42वें संशोधन द्वारा न्यायपालिका पर लगाए गए कई प्रतिबंध हटाए और सर्वोच्च तथा उच्च न्यायालयों की समीक्षा-शक्ति पुनर्स्थापित की।
44वां संशोधन 1975 की पुनरावृत्ति रोकने का मुख्य संवैधानिक उत्तर था। इसके उद्देश्य-वक्तव्य ने स्वीकार किया कि अनुच्छेद 352 की उद्घोषणा संविधान को अस्थायी रूप से लगभग एकात्मक बना देती है और नागरिक के न्यायालय जाने के अधिकार तक को प्रभावित कर सकती है; इसलिए दुरुपयोग रोकने के लिए पर्याप्त सुरक्षा जरूरी है।
प्रमुख सुरक्षा उपाय
- “आंतरिक अशांति” के स्थान पर “सशस्त्र विद्रोह”: केवल सामान्य आंदोलन या राजनीतिक अस्थिरता के आधार पर राष्ट्रीय आपातकाल घोषित करना कठिन किया गया।
- मंत्रिमंडल की लिखित सलाह: राष्ट्रपति आपातकाल तभी घोषित कर सकते हैं जब प्रधानमंत्री के नेतृत्व वाला केंद्रीय मंत्रिमंडल लिखित निर्णय भेजे। अकेले प्रधानमंत्री की मौखिक अथवा व्यक्तिगत सलाह पर्याप्त नहीं।
- विशेष बहुमत से संसदीय स्वीकृति: उद्घोषणा को एक महीने के भीतर संसद के दोनों सदनों से स्वीकृति चाहिए और अनुमोदन के लिए सदन की कुल सदस्यता का बहुमत तथा उपस्थित एवं मतदान करने वालों का दो-तिहाई बहुमत आवश्यक है।
- छह महीने में नवीकरण: आपातकाल अनिश्चित रूप से जारी नहीं रह सकता; हर छह महीने में विशेष बहुमत से नई स्वीकृति आवश्यक है।
- लोकसभा की अस्वीकृति का मार्ग: लोकसभा आपातकाल समाप्त करने का प्रस्ताव पारित कर सकती है। कम से कम एक-दसवां सदस्य विशेष बैठक मांग सकता है।
- अनुच्छेद 19 पर सीमित प्रभाव: अनुच्छेद 358 का स्वतः निलंबन केवल युद्ध या बाहरी आक्रमण वाले आपातकाल में होगा, सशस्त्र विद्रोह वाले में नहीं।
- अनुच्छेद 20 और 21 की सुरक्षा: अपराध के लिए दोषसिद्धि संबंधी संरक्षण और जीवन एवं व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अधिकार किसी भी आपातकाल में न्यायिक प्रवर्तन से वंचित नहीं किया जा सकता। यह एडीएम जबलपुर की पुनरावृत्ति के विरुद्ध सबसे महत्वपूर्ण दीवार है।
- लोकसभा/विधानसभा का पांच वर्षीय कार्यकाल: 42वें संशोधन द्वारा बढ़ाया गया छह वर्ष का सामान्य कार्यकाल फिर पांच वर्ष किया गया।
- संपत्ति अधिकार का परिवर्तन: संपत्ति को मौलिक अधिकार से हटाकर संवैधानिक कानूनी अधिकार बनाया गया। यह परिवर्तन आपातकाल सुरक्षा से अलग, 44वें संशोधन का बड़ा सामाजिक-आर्थिक पक्ष था।
क्या अब आपातकाल का दुरुपयोग असंभव है?
नहीं। संवैधानिक सुरक्षा दुरुपयोग को कठिन बनाती है, असंभव नहीं। यदि विशाल बहुमत, कमजोर विपक्ष, भयभीत मीडिया, निष्क्रिय न्यायपालिका और आज्ञाकारी प्रशासन एक साथ हों तो औपचारिक नियमों की आत्मा फिर कमजोर हो सकती है। इसके अतिरिक्त आधुनिक राज्य राष्ट्रीय आपातकाल घोषित किए बिना भी निगरानी, जांच एजेंसी, इंटरनेट नियंत्रण, वित्तीय दबाव और सामान्य कानूनों से असहमति सीमित कर सकता है।
लेकिन 44वां संशोधन निर्णायक उपलब्धि है। आज केवल “आंतरिक अशांति” कहकर, अकेले प्रधानमंत्री की प्रक्रिया से और जीवन-स्वतंत्रता का न्यायिक उपचार रोककर 1975 जैसा आपातकाल लागू नहीं किया जा सकता। लोकतंत्र ने अपनी चोट से कानूनी प्रतिरक्षा विकसित की।