संसद, कांग्रेस और संघीय ढांचे का क्षरण
लोकतंत्र का काला अध्याय: आपातकाल (1975–1977)
संसद औपचारिक रूप से चलती रही, पर उसकी प्रतिनिधिकता कमजोर हो चुकी थी। विपक्ष के कई सांसद जेल में थे। प्रश्नकाल, स्थगन प्रस्ताव और सार्वजनिक आलोचना का प्रभाव कम हुआ। कांग्रेस के भीतर भी स्वतंत्र असहमति के लिए जगह सीमित थी। पार्टी अध्यक्ष देवकांत बरुआ का इंदिरा गांधी के प्रति अत्यधिक व्यक्तिपूजक रुख उस समय की राजनीतिक संस्कृति का प्रतीक बना।
लोकसभा का कार्यकाल सामान्यतः 1976 में समाप्त होना था। आपातकालीन प्रावधान का उपयोग करके उसे एक-एक वर्ष बढ़ाया गया। संविधान इसकी अनुमति देता था, लेकिन इससे जनता को निर्धारित समय पर सरकार का मूल्यांकन करने का अवसर नहीं मिला। इसी विस्तारित सदन ने 42वां संशोधन पारित किया।
अध्यादेश और तीव्र कानून-निर्माण
जब प्रेस और विपक्ष नियंत्रित हों, तब कानून पारित करने की गति बढ़ सकती है; पर गति गुणवत्ता का प्रमाण नहीं होती। आपातकाल में संविधान संशोधनों, सुरक्षा कानूनों और मीडिया-नियंत्रण संबंधी उपायों पर स्वतंत्र सार्वजनिक विमर्श सीमित था। संसदीय बहुमत सरकार की विधायी शक्ति बना, निगरानी संस्था नहीं।
कांग्रेस का आंतरिक लोकतंत्र
कांग्रेस एक विशाल ऐतिहासिक संगठन थी, लेकिन 1970 के दशक तक निर्णय प्रधानमंत्री-केंद्रित होते गए। मुख्यमंत्री, केंद्रीय मंत्री और पार्टी पदाधिकारी राजनीतिक अस्तित्व के लिए शीर्ष नेतृत्व पर निर्भर थे। आपातकाल के निर्णय पर कैबिनेट में गंभीर पूर्व-विचार न होना केवल प्रक्रिया की कमी नहीं, बल्कि वर्षों से विकसित केंद्रीकरण का परिणाम था।
कुछ कांग्रेसी नेताओं ने भीतर ही भीतर आपत्ति की, कुछ ने बाद में पार्टी छोड़ी; पर आरंभिक समय में संगठित आंतरिक विरोध दिखाई नहीं दिया। फरवरी 1977 में जगजीवन राम, हेमवती नंदन बहुगुणा और नंदिनी सत्पथी ने कांग्रेस छोड़कर कांग्रेस फॉर डेमोक्रेसी बनाई। उनका देर से हुआ विद्रोह चुनावी समीकरण में निर्णायक साबित हुआ, लेकिन यह भी प्रश्न छोड़ गया कि सत्ता के सबसे कठोर चरण में संस्थागत प्रतिरोध इतना कमजोर क्यों था।
राज्यों की स्थिति
कांग्रेस-शासित राज्यों में केंद्र के निर्देशों का पालन राजनीतिक निष्ठा की कसौटी बन गया। परिवार नियोजन, झुग्गी हटाने, गिरफ्तारी और 20 सूत्री कार्यक्रम में राज्यों तथा जिलों के प्रदर्शन की तुलना की गई। लक्ष्य पूरा करने की प्रतिस्पर्धा ने स्थानीय प्रशासन को अतिरेक की ओर धकेला। हरियाणा में मुख्यमंत्री बंसीलाल का प्रशासन और दिल्ली में संजय गांधी से जुड़े अधिकारी विशेष रूप से प्रभावशाली माने गए।
विपक्ष-शासित तमिलनाडु की डीएमके सरकार को जनवरी 1976 में बर्खास्त कर राष्ट्रपति शासन लगाया गया। सरकार ने भ्रष्टाचार और अलगाववाद सहित कारण बताए; डीएमके तथा आलोचकों ने इसे आपातकाल-विरोधी रुख का राजनीतिक दंड माना। गुजरात में भी राजनीतिक अस्थिरता और बदलाव हुए। संघीय व्यवस्था औपचारिक रूप से बनी रही, पर केंद्र का राजनीतिक दबाव बहुत बढ़ गया।