प्रेस सेंसरशिप: जब खबर छपने से पहले सरकार की अनुमति जरूरी हुई
लोकतंत्र का काला अध्याय: आपातकाल (1975–1977)
26 जून 1975 से अखबारों पर पूर्व-सेंसरशिप लागू की गई। संपादकों को अनेक समाचार, टिप्पणियां, कार्टून और तस्वीरें प्रकाशित करने से पहले सरकारी सेंसर के पास भेजनी पड़ती थीं। हड़ताल, गिरफ्तारी, जेल की स्थिति, आंदोलन, परिवार-नियोजन की शिकायत, झुग्गी हटाने की कार्रवाई, संसद में असहमति और सरकार की आलोचना से जुड़ी सामग्री विशेष निगरानी में थी।
सेंसरशिप केवल लाल पेंसिल से पंक्तियां काटने तक सीमित नहीं थी। समाचार-पत्र उद्योग सरकार पर न्यूजप्रिंट, आयात, लाइसेंस, विज्ञापन और मान्यता के लिए निर्भर था। सरकारी विज्ञापन रोकना, संवाददाता की मान्यता वापस लेना, टेलीप्रिंटर और समाचार एजेंसी पर नियंत्रण, छापाखाने पर दबाव तथा मालिकों को कर या कानूनी कार्रवाई का भय दिखाना प्रभावी अप्रत्यक्ष साधन थे।
“झुकने को कहा, रेंगने लगे”
आपातकाल के बाद लालकृष्ण आडवाणी से जोड़ा गया एक प्रसिद्ध कथन है कि प्रेस से झुकने को कहा गया और वह रेंगने लगा। यह वाक्य मीडिया की व्यापक आत्म-समर्पण प्रवृत्ति की आलोचना करता है, पर पूरे प्रेस के साथ न्याय नहीं करता। कुछ संपादकों और पत्रकारों ने प्रतिरोध किया, कुछ ने प्रतीकात्मक संकेत दिए, कई गिरफ्तार हुए और कुछ संस्थानों ने आर्थिक जोखिम उठाया। दूसरी ओर अनेक बड़े प्रकाशनों ने सरकारी भाषा अपना ली, आलोचना कम कर दी और अनुशासन तथा विकास के आधिकारिक आख्यान को प्रमुखता दी।
इंडियन एक्सप्रेस ने एक अवसर पर संपादकीय स्थान खाली छोड़ा। फाइनेंशियल एक्सप्रेस ने रवीन्द्रनाथ टैगोर की स्वतंत्र चेतना वाली कविता प्रकाशित की। टाइम्स ऑफ इंडिया के बॉम्बे संस्करण से जुड़ा लोकतंत्र का शोक-संदेश भी प्रसिद्ध हुआ। ये प्रतीक जनता को संकेत देते थे कि सामान्य समाचार प्रवाह बाधित है।
पत्रकारों पर कार्रवाई
कुलदीप नैयर, के. आर. मलकानी और अनेक पत्रकार गिरफ्तार किए गए। शोध स्रोतों में गिरफ्तार पत्रकारों की संख्या लगभग 250 से 258 के बीच बताई जाती है। कई संवाददाताओं की मान्यता रद्द की गई, विदेशी पत्रकारों को निष्कासित किया गया या भारत आने से रोका गया। सटीक संख्या स्रोत और “पत्रकार” की प्रशासनिक परिभाषा पर निर्भर करती है, लेकिन यह निर्विवाद है कि गिरफ्तारी, मान्यता और आर्थिक दबाव का संगठित उपयोग हुआ।
समाचार एजेंसियों का विलय: समाचार
देश की प्रमुख समाचार एजेंसियों—प्रेस ट्रस्ट ऑफ इंडिया, यूनाइटेड न्यूज ऑफ इंडिया, हिंदुस्तान समाचार और समाचार भारती—को मिलाकर “समाचार” नामक एकीकृत एजेंसी बनाई गई। सरकार ने इसे संसाधनों के बेहतर उपयोग और राष्ट्रीय समाचार सेवा के रूप में प्रस्तुत किया; आलोचकों ने इसे समाचार के स्रोतों को केंद्रीकृत करने की कोशिश माना। जनता सरकार आने के बाद पुरानी स्वतंत्र एजेंसियां पुनः अलग हुईं।
प्रेस परिषद और विधायी नियंत्रण
प्रेस परिषद को समाप्त कर दिया गया। आपत्तिजनक सामग्री के प्रकाशन और संसदीय कार्यवाही की रिपोर्टिंग से जुड़े कानूनों में बदलाव हुए। संसद की वास्तविक बहस जनता तक पहुंचाने वाला सुरक्षा कवच कमजोर हुआ। जब सरकार, संसद में बहुमत और सूचना माध्यम एक ही दिशा में काम करें तो सार्वजनिक जवाबदेही लगभग समाप्त हो सकती है।
आकाशवाणी और दूरदर्शन
रेडियो तथा दूरदर्शन सरकारी नियंत्रण में थे। समाचारों में प्रधानमंत्री, 20 सूत्री कार्यक्रम, अनुशासन, उत्पादन और सरकारी उपलब्धियों को प्रमुख स्थान मिला। विपक्ष जेल में था और उसे प्रसारण मंच उपलब्ध नहीं था। उस दौर में टेलीविजन की पहुंच सीमित थी, पर रेडियो विशाल जनसंख्या का मुख्य त्वरित समाचार स्रोत था। इसलिए प्रसारण नियंत्रण का प्रभाव अखबारों से भी व्यापक हो सकता था।
प्रसिद्ध फिल्म और सांस्कृतिक सेंसरशिप
अमृत नाहटा की फिल्म किस्सा कुर्सी का संजय गांधी की कार परियोजना और सत्ता-व्यवस्था पर व्यंग्य थी। फिल्म की प्रतियां जब्त की गईं और बाद में उन्हें नष्ट किए जाने का मामला सामने आया। गायक किशोर कुमार ने सरकारी कार्यक्रम में भाग लेने से इनकार किया तो उनके गीतों के आकाशवाणी प्रसारण पर रोक लगाए जाने का उल्लेख व्यापक रूप से मिलता है। ये उदाहरण बताते हैं कि नियंत्रण समाचार से आगे सिनेमा, संगीत और लोकप्रिय संस्कृति तक पहुंच गया था।
सेंसरशिप का सबसे गहरा प्रभाव वह खबर नहीं थी जो काट दी गई, बल्कि वह थी जिसे पत्रकार ने संभावित दंड के भय से लिखना ही छोड़ दिया। आत्म-सेंसरशिप किसी भी औपचारिक आदेश से अधिक टिकाऊ होती है, क्योंकि उसमें सत्ता को हर पंक्ति पर निर्देश देने की जरूरत नहीं पड़ती।