जनता सरकार: लोकतंत्र की बहाली और अंतर्विरोध
लोकतंत्र का काला अध्याय: आपातकाल (1975–1977)
मोरारजी देसाई भारत के पहले गैर-कांग्रेसी प्रधानमंत्री बने। नई सरकार ने राजनीतिक बंदियों को मुक्त किया, प्रेस सेंसरशिप हटाई, मीसा समाप्त करने की प्रक्रिया आगे बढ़ाई, आपातकालीन कानूनों की समीक्षा की और बर्खास्त रेल कर्मचारियों को राहत दी। बरौदा डायनामाइट मुकदमा वापस लिया गया।
जवाबदेही या राजनीतिक प्रतिशोध?
जनता सरकार के सामने कठिन संतुलन था। आपातकाल के दुरुपयोग की जांच आवश्यक थी; साथ ही जांच को विजेता का प्रतिशोध नहीं दिखना चाहिए था। इंदिरा गांधी की गिरफ्तारी के प्रयास और कुछ जल्दबाजी वाली कार्रवाइयों ने उन्हें राजनीतिक सहानुभूति दिलाई। कानूनी रूप से कमजोर मामला लोकतांत्रिक जवाबदेही को मजबूत करने के बजाय आरोपी को पीड़ित बना सकता है।
जनता पार्टी की अंतर्निहित कमजोरी
जनता पार्टी आंदोलन की एकता थी, विचारधारा की नहीं। मोरारजी देसाई, चरण सिंह और जगजीवन राम के बीच नेतृत्व प्रतिस्पर्धा थी। जनसंघ से आए सदस्यों की आरएसएस सदस्यता का “दोहरी सदस्यता” विवाद उठा। आर्थिक नीति, किसान हित, उद्योग और संगठनात्मक नियंत्रण पर मतभेद थे। 1979 में सरकार गिर गई और चरण सिंह अल्पकाल के लिए प्रधानमंत्री बने, पर लोकसभा का सामना नहीं कर सके। जनवरी 1980 के चुनाव में इंदिरा गांधी भारी बहुमत से सत्ता में लौट आईं।
यह वापसी 1975 के आपातकाल को निर्दोष सिद्ध नहीं करती। मतदाता अलग चुनावों में अलग प्राथमिकता तय करता है। 1977 में उसने नागरिक स्वतंत्रता बहाल की; 1980 में जनता सरकार की अस्थिरता और अंतर्कलह को दंडित किया। दोनों जनादेश भारतीय मतदाता की स्वतंत्र राजनीतिक क्षमता दिखाते हैं।