आपातकाल का संवैधानिक और कानूनी ढांचा
लोकतंत्र का काला अध्याय: आपातकाल (1975–1977)
आपातकाल को समझने के लिए उस समय प्रभावी संविधान और आज के संविधान में अंतर जानना आवश्यक है। 1975 की घटनाओं के बाद 44वें संशोधन ने कई प्रावधान बदल दिए; इसलिए आज की सुरक्षा दीवारों को अतीत पर लागू करके यह मान लेना गलत होगा कि वही शर्तें उस समय भी थीं।
अनुच्छेद 352 और “आंतरिक अशांति”
1975 में अनुच्छेद 352 में प्रयुक्त शब्द “internal disturbance”—आंतरिक अशांति—की कोई संकीर्ण संवैधानिक परिभाषा नहीं थी। यह “armed rebellion”—सशस्त्र विद्रोह—से कहीं व्यापक था। हिंसक विद्रोह न होने पर भी सरकार राजनीतिक आंदोलन, हड़ताल, प्रशासनिक अव्यवस्था या आंतरिक तनाव को इस श्रेणी में रख सकती थी। राष्ट्रपति प्रधानमंत्री की सलाह पर उद्घोषणा कर सकते थे और पूरे मंत्रिमंडल की लिखित सलाह की स्पष्ट संवैधानिक आवश्यकता नहीं थी।
यही अस्पष्टता सत्ता के लिए बड़ा दरवाजा बनी। राजनीतिक अस्थिरता और राष्ट्रीय सुरक्षा के बीच सीमा धुंधली कर दी गई। लोकतंत्र में आंदोलन, हड़ताल और सरकार-विरोधी भाषण असुविधाजनक हो सकते हैं, लेकिन वे प्रत्येक स्थिति में राज्य की सुरक्षा के लिए वैसा खतरा नहीं होते जैसा गृहयुद्ध या सशस्त्र विद्रोह। 1975 ने दिखाया कि अस्पष्ट आपातकालीन शब्दावली का उपयोग निर्वाचित सरकार अपने राजनीतिक संकट को राष्ट्रीय संकट घोषित करने के लिए कर सकती है।
अनुच्छेद 358: अभिव्यक्ति और अन्य स्वतंत्रताएं
आपातकाल लागू होने पर अनुच्छेद 358 के तत्कालीन स्वरूप ने अनुच्छेद 19 की स्वतंत्रताओं को स्वतः निष्क्रिय कर दिया। इनमें वाक् एवं अभिव्यक्ति, शांतिपूर्ण सभा, संगठन, आवागमन, निवास और व्यवसाय की स्वतंत्रताएं शामिल थीं। राज्य ऐसे कानून बना सकता था या कार्रवाइयां कर सकता था जो सामान्य समय में अनुच्छेद 19 की कसौटी पर असंवैधानिक ठहर सकती थीं।
इसका सीधा असर प्रेस, सभाओं, राजनीतिक प्रचार, हड़तालों और संगठनों पर पड़ा। सरकार ने इसे व्यवस्था कायम रखने का वैधानिक साधन माना; आलोचकों ने इसे राजनीतिक जीवन की ऑक्सीजन रोकने वाला प्रावधान कहा। बाद में 44वें संशोधन ने अनुच्छेद 358 के स्वतः निलंबन को केवल युद्ध या बाहरी आक्रमण के आधार पर घोषित आपातकाल तक सीमित किया।
अनुच्छेद 359 और अदालत जाने का अधिकार
27 जून 1975 के राष्ट्रपति आदेश ने अनुच्छेद 14, 21 और 22 सहित निर्दिष्ट मौलिक अधिकारों को लागू कराने के लिए अदालत जाने का अधिकार निलंबित कर दिया। इस अंतर को समझना जरूरी है: राष्ट्रपति आदेश ने पाठ्य रूप में हर अधिकार मिटा नहीं दिया, बल्कि उसके न्यायिक प्रवर्तन का रास्ता बंद किया। व्यवहार में यह अंतर बंदी के लिए लगभग अर्थहीन हो गया, क्योंकि यदि कोई व्यक्ति यह दावा भी नहीं कर सकता कि उसकी हिरासत कानूनविहीन या दुर्भावनापूर्ण है, तो व्यक्तिगत स्वतंत्रता राज्य की इच्छा पर निर्भर हो जाती है।
38वां संविधान संशोधन
जुलाई 1975 में पारित 38वें संशोधन ने राष्ट्रपति द्वारा आपातकाल घोषित करने की “संतुष्टि” को अंतिम और निर्णायक बताकर न्यायिक समीक्षा से बाहर रखने की कोशिश की। अध्यादेशों तथा कुछ अन्य आपातकालीन निर्णयों की संतुष्टि को भी व्यापक सुरक्षा दी गई। इससे कार्यपालिका की असाधारण शक्ति पर न्यायालय की निगरानी और कमजोर हुई।
39वां संविधान संशोधन और प्रधानमंत्री का निर्वाचन
अगस्त 1975 का 39वां संशोधन सीधे इंदिरा गांधी के चुनाव विवाद से जुड़ा था। नए अनुच्छेद 329A के माध्यम से राष्ट्रपति, उपराष्ट्रपति, प्रधानमंत्री और लोकसभा अध्यक्ष के चुनाव विवादों को सामान्य न्यायिक प्रक्रिया से अलग करने की व्यवस्था की गई। उसके एक प्रावधान ने प्रधानमंत्री के निर्वाचन पर लागू कानून को इस तरह बदला कि लंबित विवाद पर प्रतिगामी प्रभाव पड़े।
सर्वोच्च न्यायालय ने इंदिरा नेहरू गांधी बनाम राज नारायण में उनके चुनाव को बहाल किया, पर 39वें संशोधन के उस हिस्से को असंवैधानिक माना जिसने न्यायिक निर्णय को निष्प्रभावी करने और चुनाव को चुनौती से लगभग परे रखने की कोशिश की थी। न्यायालय ने स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव तथा न्यायिक समीक्षा को संविधान की मूल संरचना से जोड़ा। यह आपातकाल के भीतर न्यायपालिका द्वारा खींची गई महत्वपूर्ण सीमा थी।
40वां और 41वां संशोधन
1976 के 40वें संशोधन ने कुछ केंद्रीय कानूनों को नौवीं अनुसूची में डालकर न्यायिक चुनौती से बचाने का प्रयास किया तथा समुद्री संसाधनों पर संघ के अधिकार स्पष्ट किए। 41वें संशोधन ने राज्य लोक सेवा आयोगों के अध्यक्ष और सदस्यों की सेवानिवृत्ति आयु बढ़ाई। ये दोनों संशोधन पूरी तरह आपातकालीन दमन तक सीमित नहीं थे, लेकिन वे उस व्यापक विधायी दौर का हिस्सा थे जिसमें संसद के सरकारी बहुमत ने संविधान में तीव्र परिवर्तन किए।
42वां संशोधन: “मिनी संविधान”
1976 में पारित 42वां संशोधन भारतीय संवैधानिक इतिहास का सबसे व्यापक संशोधन था। इसे प्रायः “मिनी संविधान” कहा जाता है। प्रस्तावना में “समाजवादी”, “पंथनिरपेक्ष” और “अखंडता” शब्द जोड़े गए; मौलिक कर्तव्यों का नया भाग जोड़ा गया; नीति-निर्देशक तत्वों को मजबूत करने का प्रयास हुआ; न्यायाधिकरणों की व्यवस्था विस्तृत की गई; लोकसभा और विधानसभाओं का सामान्य कार्यकाल पांच से बढ़ाकर छह वर्ष किया गया; तथा केंद्र की शक्ति को मजबूत करने वाले अनेक परिवर्तन हुए।
इनमें से कुछ प्रावधान—जैसे मौलिक कर्तव्य और प्रस्तावना के नए शब्द—आज भी संविधान का हिस्सा हैं। इसलिए 42वें संशोधन को एक ही रंग में देखना उचित नहीं। समस्या उन प्रावधानों में विशेष रूप से थी जिन्होंने संसद की संशोधन शक्ति को लगभग असीम बनाने, न्यायिक समीक्षा को संकुचित करने और मौलिक अधिकारों पर नीति-निर्देशक तत्वों की व्यापक प्रधानता स्थापित करने की कोशिश की। बाद में 43वें और 44वें संशोधनों तथा मिनर्वा मिल्स जैसे निर्णयों ने इसके कई अति-केंद्रीकृत हिस्से हटाए या निष्प्रभावी किए।
42वें संशोधन की लोकतांत्रिक वैधता पर एक मूल प्रश्न बना रहता है: क्या बंद विपक्ष, नियंत्रित प्रेस और एक वर्ष बढ़ाई गई लोकसभा को संविधान के बुनियादी संतुलन में इतने व्यापक परिवर्तन करने चाहिए थे? विधिक रूप से संसद सक्षम थी, पर जनता से ताजा जनादेश और स्वतंत्र सार्वजनिक बहस का अभाव इस संशोधन पर स्थायी छाया डालता है।