आपातकाल क्या था?
लोकतंत्र का काला अध्याय: आपातकाल (1975–1977)
भारतीय संविधान का भाग XVIII असाधारण परिस्थितियों में केंद्र सरकार को विशेष शक्तियां देता है। 1975 में लागू अनुच्छेद 352 के अनुसार राष्ट्रपति युद्ध, बाहरी आक्रमण या “आंतरिक अशांति” से भारत अथवा उसके किसी भाग की सुरक्षा को खतरा होने पर आपातकाल घोषित कर सकते थे। “आंतरिक अशांति” एक अत्यंत व्यापक और अस्पष्ट अभिव्यक्ति थी। इसके लिए सशस्त्र विद्रोह जैसी स्पष्ट स्थिति का होना जरूरी नहीं था।
भारत में 1975 से पहले भी राष्ट्रीय आपातकाल लागू था। चीन युद्ध के समय 1962 में बाहरी आक्रमण के आधार पर उद्घोषणा की गई थी। दिसंबर 1971 में पाकिस्तान के साथ युद्ध के संदर्भ में बाहरी आक्रमण के आधार पर दूसरी उद्घोषणा की गई। 25 जून 1975 को “आंतरिक अशांति” के आधार पर नई उद्घोषणा हुई। इस प्रकार कुछ समय तक बाहरी और आंतरिक आधार वाली उद्घोषणाएं साथ-साथ प्रभावी रहीं। 1975 की विशेषता यह थी कि इसका केंद्र किसी विदेशी युद्ध की अपेक्षा देश के भीतर की राजनीतिक परिस्थिति थी।
आपातकाल का औपचारिक प्रभाव केवल एक घोषणा तक सीमित नहीं था। अनुच्छेद 358 के तत्कालीन स्वरूप के कारण अनुच्छेद 19 में दी गई स्वतंत्रताओं पर रोक लगाने वाले कानूनों और कार्यकारी कार्रवाइयों को व्यापक संरक्षण मिला। 27 जून 1975 के राष्ट्रपति आदेश के माध्यम से नागरिकों का अनुच्छेद 14, 21 और 22 सहित कुछ मौलिक अधिकार लागू कराने के लिए अदालत जाने का अधिकार निलंबित कर दिया गया। इसका अर्थ यह नहीं था कि जीवन या स्वतंत्रता का नैतिक विचार समाप्त हो गया, लेकिन राज्य की हिरासत को अदालत में चुनौती देने का सबसे प्रभावी साधन—हैबियस कॉर्पस—व्यावहारिक रूप से निष्प्रभावी कर दिया गया।
आपातकाल 21 महीने चला। जनवरी 1977 में चुनाव कराने की घोषणा हुई, राजनीतिक बंदियों की रिहाई आरंभ हुई और मार्च 1977 में लोकसभा चुनाव हुए। जनता पार्टी की विजय तथा कांग्रेस की पराजय के बाद 21 मार्च 1977 को आंतरिक आपातकाल समाप्त कर दिया गया। इस पूरे काल को सामान्यतः “द इमरजेंसी” कहा जाता है।
अध्ययन की सीमा और सावधानियां
आपातकाल से जुड़ी संख्याओं में स्रोत-भेद मिलता है। गिरफ्तारियों की संख्या इस बात पर बदलती है कि केवल मीसा बंदी गिने जाएं, अन्य निवारक कानूनों के तहत पकड़े गए लोग भी शामिल हों या थोड़े समय की पुलिस हिरासतें भी जोड़ी जाएं। नसबंदी के मामले में कुल प्रक्रियाओं, शिकायतों, दबाव में कराई गई प्रक्रियाओं और चिकित्सकीय मौतों को अलग-अलग समझना आवश्यक है। इसी प्रकार तुर्कमान गेट गोलीकांड में मृतकों की आधिकारिक और गैर-आधिकारिक संख्याएं एक जैसी नहीं हैं। जहां आंकड़ा विवादित है, इस अध्याय में उसे निश्चित संख्या के रूप में नहीं, सीमा अथवा स्रोत-विशिष्ट दावे के रूप में प्रस्तुत किया गया है।
एक और सावधानी शब्दावली की है। प्रत्येक नसबंदी प्रक्रिया “जबरन” नहीं थी; उस समय प्रोत्साहन राशि लेकर स्वेच्छा से परिवार नियोजन अपनाने वाले लोग भी थे। लेकिन लक्ष्य-आधारित प्रशासन, राशन, वेतन, लाइसेंस, आवास अथवा पुलिस शक्ति से जुड़ा दबाव स्वैच्छिक सहमति को संदिग्ध बना देता था। इसलिए कुल प्रक्रियाओं और प्रमाणित दबाव/शिकायतों के बीच अंतर रखते हुए भी अभियान की दमनकारी संरचना को अनदेखा नहीं किया जा सकता।