25 जून 1975 की रात: निर्णय, दस्तखत और गिरफ्तारियां
लोकतंत्र का काला अध्याय: आपातकाल (1975–1977)

आपातकाल की वास्तविक घोषणा 25 और 26 जून की मध्यरात्रि के बीच हुई। पश्चिम बंगाल के मुख्यमंत्री सिद्धार्थ शंकर रे को आंतरिक आपातकाल के संवैधानिक विकल्प का प्रमुख सलाहकार माना जाता है। उपलब्ध विवरणों के अनुसार प्रधानमंत्री ने राष्ट्रपति फखरुद्दीन अली अहमद को सलाह दी कि देश की सुरक्षा “आंतरिक अशांति” से खतरे में है और अनुच्छेद 352 के अंतर्गत उद्घोषणा की जाए। राष्ट्रपति ने दस्तखत कर दिए।
इस प्रक्रिया का सबसे विवादास्पद पहलू यह था कि पूर्ण केंद्रीय मंत्रिमंडल ने घोषणा से पहले औपचारिक सामूहिक विचार नहीं किया। प्रधानमंत्री ने कार्य-संचालन नियमों की विशेष व्यवस्था का उपयोग करते हुए राष्ट्रपति को सलाह दी और मंत्रिमंडल ने अगले दिन इसे अनुमोदित किया। उस समय संविधान में यह स्पष्ट शर्त नहीं थी कि राष्ट्रपति को लिखित रूप में पूरे मंत्रिमंडल का निर्णय मिलना चाहिए। 44वें संविधान संशोधन ने बाद में यही सुरक्षा जोड़ी।
गिरफ्तारी की सूचियां पहले से तैयार थीं?
घोषणा के प्रभावी होते ही मीसा और अन्य निवारक कानूनों के अंतर्गत विपक्षी नेताओं की गिरफ्तारी शुरू हो गई। जयप्रकाश नारायण, मोरारजी देसाई, अटल बिहारी वाजपेयी, लालकृष्ण आडवाणी, चरण सिंह, जॉर्ज फर्नांडिस, चंद्रशेखर, मधु दंडवते, बीजू पटनायक, राज नारायण और अनेक राष्ट्रीय-प्रादेशिक नेता बंदी बनाए गए। कांग्रेस के भीतर असहमति रखने वाले कुछ नेता भी बख्शे नहीं गए।
गिरफ्तारियों की गति बताती है कि पुलिस और प्रशासन के पास कई नाम तथा आदेश पहले से तैयार थे। कुछ मामलों में आदेशों के कानूनी आधार, तारीख, कारण और समीक्षा की प्रक्रिया पर गंभीर प्रश्न उठे। शाह आयोग ने बाद में पाया कि कई अधिकारी राजनीतिक निर्देशों के दबाव में काम कर रहे थे और हिरासत की शक्ति का उपयोग वास्तविक सुरक्षा आवश्यकता के बजाय असहमति दबाने के लिए हुआ।
अखबारों की बिजली और पहली सुबह
दिल्ली का बहादुर शाह जफर मार्ग प्रमुख समाचार-पत्र कार्यालयों का केंद्र था। रात में वहां कई अखबारों की बिजली काट दी गई, जिससे अगले दिन के संस्करण रोके जा सकें। दूरसंचार और समाचार प्रसारण पर निगरानी बढ़ी। जिन पाठकों तक 26 जून की सुबह अखबार पहुंचे, उन्हें भी घटनाओं की पूरी जानकारी नहीं मिली। उसी सुबह ऑल इंडिया रेडियो से इंदिरा गांधी ने देश को संबोधित किया और कहा कि राष्ट्रपति ने आपातकाल घोषित किया है तथा घबराने की कोई आवश्यकता नहीं है।
सरकार ने बताया कि एक गहरा षड्यंत्र देश की स्थिरता और प्रगतिशील कार्यक्रमों के विरुद्ध काम कर रहा था। प्रधानमंत्री ने इसे व्यक्तिगत पद बचाने का प्रयास न मानकर राष्ट्रहित का निर्णय बताया। लेकिन कुछ ही घंटों में विपक्षी नेतृत्व का जेल में होना और स्वतंत्र समाचार प्रवाह का रुकना इस आश्वासन के विपरीत वास्तविकता प्रस्तुत कर रहा था।
संसद की स्वीकृति
संविधान के अनुसार उद्घोषणा को संसद की स्वीकृति आवश्यक थी। जुलाई 1975 में दोनों सदनों ने इसे मंजूरी दी। कांग्रेस के विशाल बहुमत, विपक्षी सदस्यों की गिरफ्तारी और कठोर राजनीतिक वातावरण में संसदीय स्वीकृति सरकार के लिए कठिन नहीं थी। यह विधिक वैधता का महत्वपूर्ण चरण था, लेकिन उसकी लोकतांत्रिक गुणवत्ता पर प्रश्न इसलिए उठता है कि आलोचना करने वाले अनेक सांसद स्वतंत्र नहीं थे और प्रेस जनता तक वैकल्पिक मत नहीं पहुंचा सकता था।
यहीं वैधानिकता और लोकतांत्रिक वैधता का अंतर दिखाई देता है। किसी प्रस्ताव का संवैधानिक प्रक्रिया से पारित होना महत्वपूर्ण है; किंतु यदि विरोधी नेतृत्व बंदी हो, अभिव्यक्ति नियंत्रित हो और सरकारी बहुमत पर आंतरिक स्वतंत्रता न हो, तो संसदीय मुहर अपने आप स्वतंत्र लोकतांत्रिक सहमति सिद्ध नहीं करती।