जनता पार्टी का गठन और 1977 का ऐतिहासिक जनादेश
लोकतंत्र का काला अध्याय: आपातकाल (1975–1977)
भारतीय लोकदल, भारतीय जनसंघ, कांग्रेस (संगठन) और समाजवादी धाराओं ने जनवरी 1977 में अपने संगठनों को मिलाकर जनता पार्टी बनाई। जयप्रकाश नारायण इसके नैतिक प्रेरक थे। मोरारजी देसाई, चरण सिंह, अटल बिहारी वाजपेयी, लालकृष्ण आडवाणी, जॉर्ज फर्नांडिस, चंद्रशेखर, मधु दंडवते और अनेक नेता एक मंच पर आए। विचारधाराएं अलग थीं—समाजवाद से बाजार समर्थक रुझान और गांधीवाद से हिंदू राष्ट्रवाद तक—पर तत्काल साझा लक्ष्य लोकतंत्र की बहाली था।
2 फरवरी 1977 को जगजीवन राम, हेमवती नंदन बहुगुणा और नंदिनी सत्पथी ने कांग्रेस छोड़कर कांग्रेस फॉर डेमोक्रेसी बनाई। दलित समाज और कांग्रेस के पुराने सामाजिक आधार पर जगजीवन राम का प्रभाव महत्वपूर्ण था। इस टूट ने संकेत दिया कि सत्ता के भीतर भी इंदिरा गांधी की विजय निश्चित नहीं मानी जा रही।
चुनाव का केंद्रीय मुद्दा
कांग्रेस ने स्थिरता, विकास, 20 सूत्री कार्यक्रम और राष्ट्रीय एकता पर प्रचार किया। इंदिरा गांधी ने अतिरेक होने की बात कुछ हद तक स्वीकार की, लेकिन आपातकाल के मूल निर्णय का बचाव किया। विपक्ष ने चुनाव को लोकतंत्र बनाम तानाशाही का जनमत-संग्रह बना दिया। नसबंदी, मीसा, प्रेस सेंसरशिप, तुर्कमान गेट और संजय गांधी की भूमिका गांव-गांव चर्चा में आई।
प्रचार में “नसबंदी के तीन दलाल—इंदिरा, संजय, बंसीलाल” जैसे तीखे और कभी-कभी असभ्य नारे चले। राजनीतिक भाषा में भावनात्मक अतिरेक था, पर उसके पीछे वास्तविक पीड़ा थी। जिन लोगों की शिकायतें 21 महीने समाचार नहीं बन सकीं, वे चुनाव अभियान में अचानक सार्वजनिक कथा बन गईं।
परिणाम
16 से 20 मार्च 1977 के बीच मतदान हुआ। चुनाव आयोग की आधिकारिक सांख्यिकीय रिपोर्ट के अनुसार जनता पार्टी सबसे बड़ी शक्ति बनकर उभरी; व्यापक सहयोगी व्यवस्था सहित उसने स्पष्ट बहुमत प्राप्त किया। अलग-अलग स्रोत जनता पार्टी और उसके साथ लड़े कांग्रेस फॉर डेमोक्रेसी के विलय/गणना के कारण सीट संख्या को कुछ भिन्न ढंग से प्रस्तुत करते हैं। सामान्यतः जनता पार्टी को लगभग 295 सीटें और कांग्रेस को 154 के आसपास सीटें दी जाती हैं; समकालीन आरंभिक गणनाओं में जनता पार्टी के 270–271 तथा सहयोगी कांग्रेस फॉर डेमोक्रेसी की 28 सीटें अलग दिखती हैं।
| प्रमुख परिणाम | स्थिति |
|---|---|
| जनता पार्टी/सहयोगी | स्पष्ट बहुमत; उत्तर भारत में भारी विजय |
| कांग्रेस | लगभग 154 सीटें; उत्तर भारत में गंभीर पराजय |
| इंदिरा गांधी | रायबरेली में राज नारायण से पराजित |
| संजय गांधी | अमेठी में पराजित |
| उत्तर प्रदेश | कांग्रेस एक भी लोकसभा सीट नहीं जीत सकी |
| नई सरकार | 24 मार्च 1977 को मोरारजी देसाई प्रधानमंत्री बने |
उत्तर-दक्षिण का अंतर
कांग्रेस उत्तर प्रदेश, बिहार, दिल्ली, हरियाणा, पंजाब और राजस्थान जैसे क्षेत्रों में बुरी तरह हारी, जहां नसबंदी, गिरफ्तारी और प्रशासनिक कठोरता का अनुभव अधिक तीखा था। दक्षिण भारत में कांग्रेस का प्रदर्शन अपेक्षाकृत बेहतर रहा। इसका एक कारण वहां नसबंदी अतिरेक का कम पैमाना और अलग क्षेत्रीय राजनीति थी। इसलिए 1977 को पूर्णतः एक समान राष्ट्रीय लहर कहना भी सरलता होगी; जनादेश मजबूत था, पर भौगोलिक रूप से असमान।
लोकतंत्र की निर्णायक विजय
1977 का सबसे महत्वपूर्ण तथ्य केवल कांग्रेस की हार नहीं, सत्ता का शांतिपूर्ण हस्तांतरण था। जिन नेताओं को जेल में बंद किया गया था, वे चुनाव जीतकर सरकार में आए। मतदाता ने मतपत्र से अत्यंत शक्तिशाली प्रधानमंत्री और उनके पुत्र को हरा दिया। सेना बैरकों में रही, चुनाव आयोग ने प्रक्रिया चलाई और प्रशासन ने नई सरकार को सत्ता सौंपी। इससे सिद्ध हुआ कि भारतीय लोकतंत्र की संस्थाएं घायल थीं, मृत नहीं।