मीसा, डीआईआर और बिना मुकदमे की बंदी
लोकतंत्र का काला अध्याय: आपातकाल (1975–1977)
मेंटेनेंस ऑफ इंटरनल सिक्योरिटी एक्ट, 1971—मीसा—सरकार को निवारक हिरासत की व्यापक शक्ति देता था। निवारक हिरासत का उद्देश्य किसी सिद्ध अपराध के लिए दंड देना नहीं, बल्कि आशंका के आधार पर भविष्य की कथित हानिकारक गतिविधि रोकना होता है। सामान्य आपराधिक मुकदमे में आरोप, साक्ष्य, वकील, सुनवाई और निर्णय की प्रक्रिया होती है; निवारक हिरासत में व्यक्ति को बिना मुकदमे लंबे समय तक बंद रखा जा सकता था।
आपातकाल में मीसा राजनीतिक नियंत्रण का केंद्रीय औजार बना। इसके साथ डिफेंस ऑफ इंडिया रूल्स, राज्य सुरक्षा कानून और सामान्य दंड प्रावधान भी उपयोग हुए। सरकार ने बंदियों को राष्ट्र-विरोधी, हिंसक, विघटनकारी या व्यवस्था के लिए खतरनाक गतिविधियों से जोड़कर देखा। वास्तविकता में बंदियों में बड़े विपक्षी नेता, छात्र, ट्रेड यूनियन कार्यकर्ता, पत्रकार, आरएसएस तथा जमात-ए-इस्लामी के सदस्य, आनंदमार्गी, समाजवादी, अकाली कार्यकर्ता और अनेक ऐसे लोग भी थे जिनके विरुद्ध हिंसा का ठोस आरोप नहीं था।
कितने लोग गिरफ्तार हुए?
गिरफ्तारियों के अलग-अलग आंकड़े प्रचलित हैं। शाह आयोग और सरकारी स्रोतों में श्रेणी के अनुसार संख्या बदलती है। केवल मीसा के अंतर्गत निवारक हिरासत की संख्या लगभग 35 हजार के आसपास बताई गई है, जबकि मीसा और डिफेंस ऑफ इंडिया रूल्स सहित व्यापक श्रेणियों में कुल बंदियों का आंकड़ा एक लाख से अधिक—लगभग 1.10 लाख—तक पहुंचता है। कुछ राजनीतिक विवरण इससे अधिक संख्या बताते हैं, पर उनकी गणना-पद्धति समान नहीं है।
वेबसाइट या शोध में “एक लाख से अधिक लोग बंदी बनाए गए” कहना सुरक्षित है, बशर्ते स्पष्ट किया जाए कि इसमें विभिन्न कानूनों और हिरासत श्रेणियों को सम्मिलित किया गया है। “सभी एक लाख लोग केवल मीसा में थे” कहना तथ्यात्मक रूप से भ्रामक होगा।
गिरफ्तारी आदेशों की मनमानी
शाह आयोग के सामने ऐसे मामले आए जिनमें गिरफ्तारी के आधार अस्पष्ट, पुराने, प्रतिलिपित या बाद में तैयार किए गए दिखाई दिए। कुछ जिलाधिकारियों और पुलिस अधिकारियों पर राजनीतिक सूची के अनुसार आदेश जारी करने का दबाव था। कई बंदियों को गिरफ्तारी के कारण समय पर नहीं बताए गए। सलाहकार बोर्डों की समीक्षा प्रभावी न्यायिक सुनवाई का विकल्प नहीं बन सकी।
कुछ प्रशासनिक अधिकारियों ने प्रतिरोध किया या अधिक ठोस कारण मांगे, लेकिन अनेक ने आदेशों को नियमित सरकारी कार्य मानकर लागू किया। आपातकाल की संस्थागत शिक्षा यही है कि दमन केवल शीर्ष नेता के आदेश से नहीं चलता; वह हजारों छोटे हस्ताक्षरों, हिरासत आदेशों, पुलिस डायरी, स्थानांतरण, विज्ञापन रोकने और मौखिक निर्देशों से बनता है।
जेलों की परिस्थितियां और स्वास्थ्य
प्रमुख नेताओं को विभिन्न जेलों और विश्रामगृहों में रखा गया। अटल बिहारी वाजपेयी और अन्य नेताओं की तबीयत खराब हुई; जयप्रकाश नारायण गंभीर रूप से बीमार पड़े और उनके गुर्दों ने काम करना कम कर दिया। बाद में उन्हें उपचार तथा स्वास्थ्य कारणों से छोड़ा गया। राजनीतिक बंदियों ने जेलों में अध्ययन, पत्राचार और आपसी संवाद जारी रखने की कोशिश की, पर सेंसरशिप और मुलाकात प्रतिबंध आम थे।
सभी बंदियों के साथ समान व्यवहार नहीं हुआ। वरिष्ठ राष्ट्रीय नेताओं को कुछ सुविधाएं मिलीं, जबकि स्थानीय कार्यकर्ता, छात्र और गरीब बंदी अधिक कठोर परिस्थितियों में रह सकते थे। महिलाओं की हिरासत, परिवार से दूरी और आर्थिक निर्भरता के प्रभाव पर मुख्य राजनीतिक इतिहास अपेक्षाकृत कम ध्यान देता है।
राजनीतिक बंदी और अपराधी का अंतर मिटना
सरकार ने विरोध को सुरक्षा समस्या के रूप में परिभाषित किया। इससे असहमति और अपराध के बीच रेखा कमजोर हुई। कोई व्यक्ति हिंसक षड्यंत्र में शामिल हो तो उसके विरुद्ध विधिसम्मत आपराधिक कार्रवाई आवश्यक है; लेकिन केवल भाषण, संगठन या सरकार-विरोधी प्रचार को अनिश्चित हिरासत का आधार बनाना लोकतंत्र के मूल को चोट पहुंचाता है। आपातकाल में यही असाधारणता सामान्य प्रशासन में बदल गई।