प्रमुख व्यक्तित्व: भूमिका और ऐतिहासिक मूल्यांकन
लोकतंत्र का काला अध्याय: आपातकाल (1975–1977)
इंदिरा गांधी
प्रधानमंत्री और आपातकाल की केंद्रीय निर्णयकर्ता। उन्होंने राजनीतिक अस्थिरता और राष्ट्रीय सुरक्षा को आधार बताया। उनके नेतृत्व में भारत ने 1971 की विजय, बैंक राष्ट्रीयकरण और मजबूत केंद्रीय राज्य देखा; उसी नेतृत्व ने 1975 में नागरिक स्वतंत्रता सीमित की। चुनाव कराने और हार स्वीकारने से उनकी लोकतांत्रिक प्रवृत्ति का एक पक्ष सामने आया, पर सत्ता-केंद्रीकरण की जिम्मेदारी उनसे अलग नहीं की जा सकती।
संजय गांधी
किसी संवैधानिक पद के बिना अत्यधिक प्रभावशाली। पांच सूत्री कार्यक्रम, युवा कांग्रेस, नसबंदी और दिल्ली सौंदर्यीकरण से नाम जुड़ा। हर स्थानीय अतिरेक का व्यक्तिगत आदेश सिद्ध नहीं, लेकिन उनके प्रभाव ने उत्तरदायित्व-विहीन सत्ता का उदाहरण प्रस्तुत किया।
जयप्रकाश नारायण
आपातकाल-विरोध का नैतिक चेहरा। संपूर्ण क्रांति और विपक्षी एकता के प्रेरक। निर्वाचित सरकार पर सड़क के दबाव तथा पुलिस-सैनिकों से अपील पर आलोचना हुई। फिर भी उन्होंने व्यक्तिगत पद नहीं लिया और लोकतंत्र बहाली को लक्ष्य रखा।
राज नारायण
1971 में चुनाव हारे, कानूनी लड़ाई जारी रखी और प्रधानमंत्री का निर्वाचन रद्द कराया। 1977 में रायबरेली में इंदिरा गांधी को हराया। उनकी शैली रंगीन और विवादास्पद थी, लेकिन मामला दर्शाता है कि एक पराजित उम्मीदवार भी न्यायालय से सबसे शक्तिशाली पदाधिकारी को जवाबदेह बना सकता है।
न्यायमूर्ति जगमोहनलाल सिन्हा
इलाहाबाद हाईकोर्ट के न्यायाधीश जिन्होंने दबावपूर्ण वातावरण में निर्णय दिया। अधिकांश आरोप खारिज कर केवल सिद्ध कानूनी बिंदुओं पर चुनाव निरस्त करना न्यायिक स्वतंत्रता का उदाहरण बना।
न्यायमूर्ति वी. आर. कृष्ण अय्यर
सर्वोच्च न्यायालय के अवकाशकालीन न्यायाधीश जिन्होंने पूर्ण स्थगन के बजाय संतुलित सशर्त राहत दी। उनका आदेश कानूनी रूप से मध्य मार्ग था, पर उसने राजनीतिक संकट को समाप्त नहीं किया।
न्यायमूर्ति एच. आर. खन्ना
एडीएम जबलपुर में अकेले असहमत न्यायाधीश। जीवन और स्वतंत्रता को राज्य की कृपा मानने से इनकार किया। मुख्य न्यायाधीश पद की संभावित कीमत चुकाई। उनकी असहमति भारतीय संवैधानिक नैतिकता की स्थायी धरोहर है।
सिद्धार्थ शंकर रे
पश्चिम बंगाल के मुख्यमंत्री और इंदिरा गांधी के कानूनी-राजनीतिक सलाहकार। आंतरिक आपातकाल के संवैधानिक रास्ते के सुझाव से उनका नाम जुड़ा। बाद में उन्होंने कुछ अतिरेक से दूरी दिखाई। उनकी भूमिका बताती है कि कानूनी सलाह राजनीतिक निर्णय को वैधानिक आकार कैसे देती है।
फखरुद्दीन अली अहमद
राष्ट्रपति जिन्होंने उद्घोषणा पर हस्ताक्षर किए। आलोचना है कि उन्होंने पर्याप्त प्रश्न नहीं पूछे। राष्ट्रपति की सीमित भूमिका और संवैधानिक सतर्कता के बीच उनका निर्णय आज भी अध्ययन का विषय है।
बंसीलाल
हरियाणा के मुख्यमंत्री और बाद में रक्षा मंत्री; संजय गांधी के निकट सहयोगी माने गए। हरियाणा में कठोर नसबंदी और प्रशासनिक लक्ष्य से उनका नाम जुड़ा। उन्होंने सरकार की अनुशासन और विकास नीति का बचाव किया।
विद्याचरण शुक्ल
सूचना एवं प्रसारण मंत्री के रूप में प्रेस, फिल्म और प्रसारण नियंत्रण के प्रमुख राजनीतिक चेहरे। सेंसरशिप, किशोर कुमार के गीतों पर रोक और सरकारी प्रचार से जुड़ी आलोचनाओं में उनका नाम प्रमुख है।
देवकांत बरुआ
कांग्रेस अध्यक्ष। इंदिरा गांधी के प्रति व्यक्तिपूजक राजनीति के प्रतीक। उनका नाम “इंदिरा इज इंडिया” जैसी अभिव्यक्ति से जुड़ा, जिसने पार्टी और राष्ट्र के बीच भेद मिटाने वाली राजनीतिक संस्कृति को दर्शाया।
जॉर्ज फर्नांडिस
रेल हड़ताल के नेता, भूमिगत प्रतिरोध और बारोडा डायनामाइट मामले के आरोपी। हथकड़ी वाला चित्र आपातकाल-विरोध का प्रतीक। बाद में जनता सरकार में मंत्री बने। उनकी कहानी अहिंसक लोकतांत्रिक प्रतिरोध और कठोर भूमिगत कार्रवाई की सीमा पर बहस पैदा करती है।
मोरारजी देसाई, चरण सिंह और जगजीवन राम
जनता गठबंधन के तीन बड़े सत्ता-केंद्र। मोरारजी पहले गैर-कांग्रेसी प्रधानमंत्री बने; चरण सिंह ने ग्रामीण-किसान राजनीति का आधार दिया; जगजीवन राम के कांग्रेस छोड़ने से दलित और पारंपरिक कांग्रेस मत में परिवर्तन आया। आपसी प्रतिस्पर्धा ने जनता सरकार को कमजोर भी किया।
जे. सी. शाह
पूर्व मुख्य न्यायाधीश और जांच आयोग के अध्यक्ष। उनकी रिपोर्ट ने मौखिक आदेश, प्रशासनिक भय और गैर-संवैधानिक सत्ता को दर्ज किया। आयोग पर राजनीतिक पक्षपात का आरोप लगा, पर उसका दस्तावेजी महत्व बना रहा।