इंदिरा गांधी का 20 सूत्री कार्यक्रम: सुधार, प्रचार और वास्तविकता
लोकतंत्र का काला अध्याय: आपातकाल (1975–1977)
1 जुलाई 1975 को प्रधानमंत्री ने 20 सूत्री आर्थिक कार्यक्रम घोषित किया। इसका उद्देश्य आपातकाल को केवल सुरक्षा कदम नहीं, सामाजिक-आर्थिक परिवर्तन का अभियान दिखाना था। इसमें महंगाई पर नियंत्रण, आवश्यक वस्तुओं की आपूर्ति, जमाखोरी और कर-चोरी के विरुद्ध कार्रवाई, बंधुआ मजदूरी समाप्त करना, ग्रामीण ऋण राहत, भूमि सुधार लागू करना, भूमिहीनों को घर की जमीन देना, न्यूनतम मजदूरी, सिंचाई, बिजली उत्पादन, हथकरघा विकास, गरीबों के लिए आवास और प्रशासनिक दक्षता जैसे विषय शामिल थे।
वास्तविक उपलब्धियां
कुछ क्षेत्रों में असर दिखाई दिया। बंधुआ मजदूरी उन्मूलन कानून बना; जमाखोरों और तस्करों के विरुद्ध कार्रवाई हुई; सरकारी दफ्तरों में समयपालन बढ़ा; औद्योगिक विवाद और हड़तालें कम हुईं; 1975–76 में महंगाई पर कुछ नियंत्रण आया और विदेशी मुद्रा तथा उत्पादन के कुछ संकेतकों में सुधार हुआ। भूमि वितरण, ऋण राहत और आवश्यक वस्तुओं की निगरानी के अभियान भी चले।
इन उपलब्धियों का निष्पक्ष उल्लेख आवश्यक है। कोई शासन केवल इसलिए हर क्षेत्र में विफल नहीं हो जाता कि उसका राजनीतिक ढांचा दमनकारी है। आर्थिक सुधारों का कुछ वास्तविक लाभ हो सकता है। लेकिन दो प्रश्न अलग रखने होंगे: क्या सुधार हुए, और क्या उनके लिए नागरिक स्वतंत्रता समाप्त करना आवश्यक था? दूसरा प्रश्न अधिक निर्णायक है। जमाखोरी रोकना, बंधुआ मजदूरी खत्म करना या सरकारी कार्यालय समय पर खुलवाना सामान्य कानून और जवाबदेह प्रशासन से भी संभव था।
भय से पैदा अनुशासन
आपातकाल के समर्थकों ने कहा कि रेलगाड़ियां समय पर चलने लगीं और कर्मचारी नियमित हुए। आलोचकों ने इसे “कब्रिस्तान का अनुशासन” कहा—ऐसी शांति जिसमें विरोध करना जोखिमपूर्ण हो। हड़ताल की कमी श्रम-संबंध सुधार का संकेत हो सकती है, लेकिन यदि यूनियन नेता जेल में हों और हड़ताल का अधिकार निष्प्रभावी हो तो वही आंकड़ा भय का संकेत भी है।
प्रचार और लक्ष्य-संस्कृति
सरकारी मीडिया ने 20 सूत्री कार्यक्रम को व्यापक प्रचार दिया। मंत्रालय, राज्य और जिले अपनी उपलब्धियां ऊपर भेजते थे। लक्ष्य पूरा दिखाने की प्रशासनिक होड़ ने आंकड़ों की विश्वसनीयता पर प्रश्न उठाए। जब स्वतंत्र प्रेस सत्यापन न कर सके और विपक्ष निरीक्षण न कर सके, तब सरकारी उपलब्धि-सूची का स्वतंत्र मूल्यांकन कठिन हो जाता है।
गरीब समर्थक भाषा और गरीबों पर दबाव
कार्यक्रम की भाषा गरीबों के पक्ष में थी, लेकिन आपातकाल के सबसे कठोर अतिरेक—नसबंदी और झुग्गी विध्वंस—का भार भी गरीबों, ग्रामीणों, दलितों, पिछड़े वर्गों, मजदूरों और अल्पसंख्यक बस्तियों ने अधिक उठाया। सत्ता ने “गरीबी हटाओ” और “शहर सुंदर बनाओ” को कहीं-कहीं गरीबों की बस्तियां हटाने के रूप में लागू किया। यही घोषित कल्याण और प्रशासनिक व्यवहार का सबसे तीखा विरोधाभास था।