न्यायपालिका की परीक्षा: हैबियस कॉर्पस से एडीएम जबलपुर तक
लोकतंत्र का काला अध्याय: आपातकाल (1975–1977)
आपातकाल में सबसे मूल प्रश्न यह था: यदि राज्य किसी व्यक्ति को उठा ले और कहे कि उसकी हिरासत को अदालत में चुनौती नहीं दी जा सकती, तो क्या न्यायपालिका उसकी स्वतंत्रता की जांच कर सकती है? देश के कई उच्च न्यायालयों ने बंदियों को कुछ राहत देते हुए माना कि राष्ट्रपति आदेश के बावजूद अदालत यह देख सकती है कि हिरासत कानून के अनुसार है या दुर्भावना से की गई है। केंद्र सरकार ने इन निर्णयों को सर्वोच्च न्यायालय में चुनौती दी।
एडीएम जबलपुर बनाम शिवकांत शुक्ला
अप्रैल 1976 में पांच न्यायाधीशों की संविधान पीठ ने एडीएम जबलपुर बनाम शिवकांत शुक्ला में 4–1 बहुमत से सरकार के पक्ष में निर्णय दिया। बहुमत ने कहा कि राष्ट्रपति आदेश लागू रहने के दौरान बंदी अनुच्छेद 21 के प्रवर्तन के लिए हैबियस कॉर्पस याचिका नहीं ला सकता। व्यावहारिक अर्थ यह था कि हिरासत आदेश को अदालत में चुनौती देने का मार्ग लगभग बंद हो गया।
सरकार की ओर से बहस के दौरान यह चरम प्रश्न उठा कि यदि किसी अधिकारी ने निजी दुर्भावना से किसी व्यक्ति की जान भी ले ली तो क्या न्यायिक उपचार उपलब्ध होगा। सरकार के विधिक पक्ष का उत्तर नागरिक स्वतंत्रता के इतिहास में अत्यंत भयावह माना गया—आपातकालीन निलंबन के दौरान अदालत से उस अधिकार का प्रवर्तन नहीं मांगा जा सकता। यह उस समय की कानूनी परिस्थिति का शुष्क तर्क था, लेकिन उसने राज्य शक्ति की नैतिक सीमा पर गहरी चिंता पैदा की।
न्यायमूर्ति एच. आर. खन्ना की असहमति
न्यायमूर्ति हंसराज खन्ना अकेले असहमत हुए। उनका मत था कि जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता केवल संविधान की देन नहीं; राज्य किसी विधिक प्राधिकार के बिना व्यक्ति को स्वतंत्रता से वंचित नहीं कर सकता। मौलिक अधिकार के प्रवर्तन का निलंबन कानून के शासन को समाप्त नहीं करता।
उनकी असहमति भारतीय न्यायिक साहस का प्रतीक बनी। वरिष्ठता के क्रम में वे अगले मुख्य न्यायाधीश हो सकते थे, लेकिन बाद में उन्हें दरकिनार कर न्यायमूर्ति एम. एच. बेग को मुख्य न्यायाधीश नियुक्त किया गया। न्यायमूर्ति खन्ना ने इस्तीफा दे दिया। यह घटनाक्रम न्यायिक स्वतंत्रता और नियुक्ति में कार्यपालिका की शक्ति पर स्थायी बहस का हिस्सा बना।
“कमिटेड ज्यूडिशियरी” और न्यायाधीशों का स्थानांतरण
आपातकाल से पहले ही सरकार के कुछ नेताओं ने “प्रतिबद्ध न्यायपालिका” की अवधारणा पर जोर दिया था—अर्थात ऐसी न्यायपालिका जो सरकार के सामाजिक-आर्थिक परिवर्तन कार्यक्रम के प्रति संवेदनशील हो। आलोचकों को इसमें संविधान के बजाय सत्तारूढ़ विचारधारा से प्रतिबद्ध न्यायाधीशों की मांग दिखाई दी। 1973 में केशवानंद भारती निर्णय के बाद वरिष्ठ न्यायाधीशों को पार कर ए. एन. रे को मुख्य न्यायाधीश बनाना विवाद का कारण बन चुका था। आपातकाल के दौरान उच्च न्यायालय के न्यायाधीशों के स्थानांतरण ने असुरक्षा बढ़ाई।
क्या पूरी न्यायपालिका विफल हुई?
ऐसा कहना अत्यधिक सरलीकरण होगा। अनेक उच्च न्यायालयों ने बंदियों के अधिकार में फैसले दिए। सर्वोच्च न्यायालय ने 39वें संशोधन के हिस्से को मूल संरचना के विरुद्ध ठहराया। न्यायमूर्ति खन्ना की असहमति न्यायपालिका के भीतर प्रतिरोध थी। फिर भी सर्वोच्च न्यायालय का एडीएम जबलपुर बहुमत उस क्षण व्यक्तिगत स्वतंत्रता की रक्षा में विफल रहा जब उसकी सबसे अधिक आवश्यकता थी।
2017 के निजता अधिकार निर्णय के. एस. पुट्टस्वामी में सर्वोच्च न्यायालय की नौ-न्यायाधीश पीठ ने एडीएम जबलपुर के बहुमत को गंभीर रूप से त्रुटिपूर्ण मानते हुए प्रभावी रूप से अस्वीकार कर दिया। इस प्रकार न्यायपालिका ने चार दशक बाद अपनी ऐतिहासिक गलती को स्पष्ट रूप से स्वीकार किया।