जयप्रकाश नारायण और “संपूर्ण क्रांति”
लोकतंत्र का काला अध्याय: आपातकाल (1975–1977)
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जयप्रकाश नारायण, जिन्हें लोकप्रिय रूप से जेपी या लोकनायक कहा गया, स्वतंत्रता आंदोलन के समाजवादी नेता थे। आजादी के बाद उन्होंने सक्रिय दलगत राजनीति से दूरी बनाकर सर्वोदय, भूदान और सामाजिक पुनर्निर्माण के कार्यों में स्वयं को लगाया। 1974 के बिहार छात्र आंदोलन ने उन्हें फिर राष्ट्रीय राजनीति के केंद्र में ला दिया।
बिहार में छात्रों ने शिक्षा व्यवस्था, महंगाई, बेरोजगारी और भ्रष्टाचार के विरुद्ध आंदोलन शुरू किया। उन्होंने जेपी से नेतृत्व का आग्रह किया। जेपी ने आंदोलन को अहिंसक रखने की शर्त पर समर्थन दिया और इसे “संपूर्ण क्रांति” की व्यापक अवधारणा से जोड़ा। उनके अनुसार केवल सरकार बदलना पर्याप्त नहीं था; राजनीति, प्रशासन, शिक्षा, अर्थव्यवस्था, सामाजिक संबंधों और नैतिक जीवन में परिवर्तन जरूरी था।
निर्वाचित सरकार बनाम जनांदोलन
जेपी ने बिहार विधानसभा भंग करने की मांग की। कांग्रेस ने तर्क दिया कि सड़क का आंदोलन चुनाव से बनी सरकार को हटाने का अधिकार नहीं रखता। विपक्ष का उत्तर था कि भ्रष्ट और जनविश्वास खो चुकी सरकार को संवैधानिक पद पर बने रहने का नैतिक अधिकार नहीं है। यही बहस बाद में राष्ट्रीय स्तर पर गहरी हुई: क्या चुनावों के बीच शांतिपूर्ण जनांदोलन सरकार पर इस्तीफे का दबाव डाल सकता है, और क्या उस दबाव की कोई लोकतांत्रिक सीमा है?
जेपी आंदोलन में समाजवादी, भारतीय जनसंघ, कांग्रेस (ओ), भारतीय लोकदल, विद्यार्थी परिषद और अनेक गैर-कांग्रेसी समूह साथ आए। आलोचकों ने कहा कि जेपी ने वैचारिक रूप से परस्पर विरोधी दलों और आरएसएस-जनसंघ को वैधता दी। समर्थकों ने उत्तर दिया कि जब लोकतांत्रिक संस्थाएं कमजोर हों तो व्यापक विपक्षी एकता आवश्यक होती है। इस गठबंधन की विविधता बाद में जनता पार्टी की शक्ति भी बनी और उसकी आंतरिक कमजोरी भी।
पुलिस और सैनिकों से अपील का विवाद
25 जून 1975 को दिल्ली के रामलीला मैदान की रैली में जेपी ने पुलिस और सशस्त्र बलों से “अवैध” या “अनैतिक” आदेश न मानने की अपील की। लोकतांत्रिक प्रतिरोध की परंपरा में इसे अंतरात्मा और कानूनसम्मत आचरण का आग्रह कहा जा सकता है। इंदिरा गांधी सरकार ने इसे पुलिस और सेना में विद्रोह भड़काने की कोशिश के रूप में लिया। सरकारी प्रचार में यह भाषण आंतरिक सुरक्षा के लिए तत्काल खतरे का प्रमुख प्रमाण बना।
दोनों पक्षों के बीच मूल अंतर “अवैध आदेश” की व्याख्या का था। जेपी का दावा था कि वे राज्य के विरुद्ध सैनिक विद्रोह नहीं, गांधीवादी नागरिक अवज्ञा की बात कर रहे थे। सरकार का तर्क था कि किसी राजनीतिक नेता द्वारा वर्दीधारी बलों को आदेशों की वैधता स्वयं तय करने के लिए कहना कमांड व्यवस्था को तोड़ सकता है। स्वतंत्र विश्लेषण में यह स्वीकार करना होगा कि ऐसी अपील संवेदनशील और जोखिमपूर्ण थी; लेकिन उससे पूरे देश की नागरिक स्वतंत्रता निलंबित करने और समूचे विपक्ष को बंदी बनाने की अनिवार्यता स्वतः सिद्ध नहीं होती।
आंदोलन की सीमाएं
जेपी आंदोलन को लोकतांत्रिक पुनर्जागरण का प्रतीक माना गया, पर वह आलोचना से परे नहीं था। “संपूर्ण क्रांति” का संस्थागत कार्यक्रम स्पष्ट नहीं था। निर्वाचित विधानसभाओं के इस्तीफे की मांग, सरकारी कार्यालयों का घेराव और व्यापक असहयोग कभी-कभी संवैधानिक प्रक्रिया के समानांतर जन-दबाव पैदा करते थे। आंदोलन में शामिल सभी संगठन अहिंसा या समान लोकतांत्रिक मूल्यों के प्रति एक जैसे प्रतिबद्ध नहीं थे।
फिर भी आंदोलन की सीमाएं आपातकालीन दमन को वैध नहीं बनातीं। लोकतंत्र का उत्तर विपक्षी अतिशयोक्ति का राजनीतिक प्रत्युत्तर, चुनाव, संवाद और विधिसम्मत कार्रवाई होना चाहिए था—न कि प्रेस को नियंत्रित करना, बिना मुकदमे विरोधियों को जेल भेजना और न्यायिक उपचार रोक देना।