भूमिका: लोकतंत्र अपने ही संविधान से कैसे घिर गया?
लोकतंत्र का काला अध्याय: आपातकाल (1975–1977)
25 जून 1975 की आधी रात भारतीय लोकतंत्र के इतिहास की सबसे निर्णायक रातों में गिनी जाती है। देश पर किसी विदेशी सेना ने हमला नहीं किया था। संसद भवन पर कब्जा नहीं हुआ था। संविधान औपचारिक रूप से समाप्त नहीं किया गया था और न ही किसी सैनिक जनरल ने रेडियो स्टेशन पर जाकर सत्ता अपने हाथ में लेने की घोषणा की थी। फिर भी कुछ ही घंटों के भीतर विपक्ष के प्रमुख नेता गिरफ्तार कर लिए गए, अखबारों की बिजली काट दी गई, समाचारों पर पूर्व-सेंसरशिप लगा दी गई और नागरिकों से अदालत जाकर अपनी स्वतंत्रता की रक्षा कराने का प्रभावी अधिकार छीन लिया गया।
भारत में तानाशाही किसी सैन्य विद्रोह से नहीं आई; वह संविधान के आपातकालीन प्रावधानों, राष्ट्रपति की उद्घोषणा, संसद में विशाल सरकारी बहुमत, प्रशासनिक आदेशों और ऐसे कानूनों के माध्यम से आई जिनका बाहरी स्वरूप वैधानिक था। यही इस दौर की सबसे गंभीर चेतावनी है। संविधान मौजूद था, न्यायालय खुले थे, संसद बैठ रही थी और सरकारी राजपत्र प्रकाशित हो रहे थे—लेकिन सत्ता पर प्रभावी लोकतांत्रिक नियंत्रण, नागरिक स्वतंत्रता और असहमति की गुंजाइश तेजी से सिकुड़ चुकी थी।
तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी और उनकी सरकार ने आपातकाल को राष्ट्र की सुरक्षा, राजनीतिक स्थिरता, आर्थिक अनुशासन और कथित षड्यंत्रों से निपटने के लिए आवश्यक कदम बताया। सरकार का तर्क था कि विपक्षी आंदोलन निर्वाचित व्यवस्था को पंगु बना रहे थे, प्रशासन को आदेश न मानने के लिए उकसाया जा रहा था और देश को आंतरिक अव्यवस्था की तरफ धकेला जा रहा था। आपातकाल के समर्थकों ने उस समय रेलगाड़ियों के समय पर चलने, हड़तालों में कमी, सरकारी कार्यालयों में अनुशासन, जमाखोरी पर कार्रवाई तथा महंगाई में कुछ राहत को उपलब्धि के रूप में प्रस्तुत किया। विनोबा भावे ने इस दौर को “अनुशासन पर्व” कहा, जबकि कुछ उद्योगपतियों और सार्वजनिक व्यक्तियों ने भी प्रारंभिक रूप से व्यवस्था और स्थिरता का स्वागत किया।
इसके विपरीत, बाद की जांचों, बंदियों के अनुभवों, पत्रकारों के विवरणों, न्यायिक अभिलेखों और शाह आयोग के निष्कर्षों ने दिखाया कि व्यवस्था कायम करने के नाम पर सत्ता के निजीकरण, मनमानी गिरफ्तारी, प्रेस नियंत्रण, जबरन परिवार-नियोजन, झुग्गी हटाने, राजनीतिक प्रतिशोध और प्रशासनिक भय का व्यापक तंत्र खड़ा हो गया था। प्रधानमंत्री के छोटे पुत्र संजय गांधी, जो किसी निर्वाचित या संवैधानिक पद पर नहीं थे, सत्ता के एक समानांतर केंद्र के रूप में उभरे। उनके पांच सूत्री कार्यक्रम—परिवार नियोजन, वृक्षारोपण, निरक्षरता उन्मूलन, दहेज-विरोध और जाति-उन्मूलन—के घोषित उद्देश्य सामाजिक सुधार थे, पर कई स्थानों पर उनकी क्रियान्वयन पद्धति coercion अर्थात दबाव और दमन से जुड़ गई।
आपातकाल का अध्ययन केवल इंदिरा गांधी या कांग्रेस की आलोचना के लिए नहीं होना चाहिए। यह भारतीय राज्य, राजनीतिक दलों, नौकरशाही, पुलिस, मीडिया, न्यायपालिका, व्यापारिक वर्ग और समाज के व्यवहार की संयुक्त परीक्षा है। कुछ लोगों ने विरोध किया, जेल गए और अपनी आजीविका गंवाई; कुछ ने आदेशों का पालन किया; कुछ ने सत्ता की इच्छा को अनुमान से भी आगे बढ़कर लागू किया; और एक बड़ा वर्ग भय, सुविधा, अनिश्चितता या सामान्य जीवन की आवश्यकता के कारण मौन रहा।
यह अध्याय आपातकाल को तीन स्तरों पर देखता है। पहला, उस समय सरकार ने क्या कहा और किन परिस्थितियों को आधार बनाया। दूसरा, व्यवहार में शासन और प्रशासन ने क्या किया। तीसरा, भारतीय लोकतंत्र ने इस अनुभव से क्या सीखा और बाद में कौन-सी संवैधानिक सुरक्षा दीवारें बनाई गईं। इस दृष्टि से यह न तो केवल राजनीतिक अभियोग है, न किसी एक परिवार की जीवनी और न ही घटनाओं की भावनात्मक पुनरावृत्ति। इसका उद्देश्य तथ्य, कानून, संस्थागत व्यवहार और मानवीय अनुभव को एक साथ रखकर समझना है कि लोकतंत्र किस तरह कमजोर पड़ता है—और नागरिक उसे किस तरह वापस प्राप्त कर सकते हैं।