तुर्कमान गेट: सौंदर्यीकरण, बेदखली और पुलिस गोलीबारी
लोकतंत्र का काला अध्याय: आपातकाल (1975–1977)
पुरानी दिल्ली का तुर्कमान गेट क्षेत्र घनी आबादी, छोटे व्यापार, धार्मिक-सांस्कृतिक विरासत और निम्न-आय परिवारों का इलाका था। आपातकाल में दिल्ली को आधुनिक और “सुंदर” बनाने की योजना के अंतर्गत झुग्गियों तथा कथित अवैध निर्माणों को हटाने का अभियान तेज हुआ। दिल्ली विकास प्राधिकरण और नगर निकायों ने बड़े पैमाने पर ढांचों को तोड़ा और लोगों को शहर की बाहरी पुनर्वास कॉलोनियों में भेजा।
समस्या केवल अतिक्रमण हटाने की नीति नहीं थी। प्रश्न था—क्या निवासियों को पर्याप्त नोटिस, सुनवाई, वैकल्पिक आवास, जीविका तक पहुंच और मानवीय पुनर्वास मिला? शहर के केंद्र में रहने वाला रिक्शा चालक, कारीगर, दुकानदार या घरेलू कामगार यदि कई किलोमीटर दूर निर्जन कॉलोनी भेज दिया जाए तो मकान का प्लॉट मिलने पर भी उसकी आजीविका टूट सकती है।
अप्रैल 1976 की कार्रवाई
तुर्कमान गेट के आसपास अप्रैल 1976 में विध्वंस तेज हुआ। स्थानीय लोगों ने बुलडोजरों का विरोध किया। 19 अप्रैल को तनाव हिंसक टकराव और पुलिस गोलीबारी में बदल गया। शाह आयोग के अनुसार गोलीबारी में छह लोगों की मृत्यु हुई; पुलिस अधिकारियों और स्वतंत्र अध्ययनों में अधिक संख्या के दावे भी मिलते हैं। इसलिए छह को आधिकारिक/आयोग-समर्थित न्यूनतम संख्या के रूप में देखना चाहिए, न कि निर्विवाद अंतिम आंकड़ा।
सेंसरशिप के कारण घटना की तत्काल स्वतंत्र रिपोर्टिंग नहीं हो सकी। बीबीसी और मौखिक खबरों से जानकारी फैली। जब राज्य किसी कार्रवाई के साथ समाचार पर भी नियंत्रण रखता है, तो अफवाह और भय दोनों बढ़ते हैं। मृतकों की संख्या पर आज तक विवाद उसी सूचना-अंधकार का परिणाम है।
रुखसाना सुल्ताना और नसबंदी शिविर
संजय गांधी की सहयोगी रुखसाना सुल्ताना पुरानी दिल्ली के मुस्लिम इलाकों में परिवार नियोजन अभियान का प्रमुख चेहरा बनीं। तुर्कमान गेट के निकट दुजाना हाउस में नसबंदी शिविर चलाया गया। स्थानीय निवासियों के लिए विध्वंस और नसबंदी अलग सरकारी कार्यक्रम न रहकर एक संयुक्त दमनकारी अनुभव बन गए—घर बचाने, पुनर्वास पाने या प्रशासनिक दबाव से निकलने के लिए शरीर तक पर राज्य का अधिकार महसूस हुआ।
दिल्ली भर में विध्वंस
शाह आयोग-आधारित विवरणों में आपातकाल के दौरान दिल्ली में डेढ़ लाख से अधिक संरचनाएं गिराए जाने की बात आती है। हर संरचना आवासीय घर नहीं थी और सभी कार्रवाइयां तुर्कमान गेट जैसी हिंसक नहीं थीं, लेकिन पैमाना असाधारण था। त्रिलोकपुरी, मंगोलपुरी, नंद नगरी, सुल्तानपुरी और अन्य बाहरी क्षेत्रों में पुनर्वास ने दिल्ली की सामाजिक भूगोल बदल दी।
तुर्कमान गेट इसीलिए स्मृति का केंद्र बना क्योंकि वहां तीन शक्तियां एक साथ दिखीं—शहरी विकास की तकनीकी भाषा, संजय गांधी का अनौपचारिक प्रभाव और पुलिस की घातक शक्ति। “सुंदर शहर” का सपना उन नागरिकों के लिए विनाश बन गया जिनकी आवाज सेंसरशिप के कारण सार्वजनिक नहीं हो सकती थी।