राजनीतिक दलों का व्यवहार: विरोध, समर्थन और अवसरवाद
लोकतंत्र का काला अध्याय: आपातकाल (1975–1977)
आपातकाल की स्मृति आज प्रायः कांग्रेस बनाम भाजपा के समकालीन विवाद में सिमट जाती है, जबकि 1975–77 में दलों और संगठनों का व्यवहार अधिक जटिल था।
कांग्रेस
कांग्रेस सरकार ने आपातकाल घोषित और संचालित किया। पार्टी के अधिकांश नेताओं ने समर्थन किया। संसदीय बहुमत ने संवैधानिक संशोधन पारित किए और राज्य सरकारों ने कार्यक्रम लागू किए। कुछ कांग्रेसी—चंद्रशेखर, मोहन धारिया, रामधन, कृष्णकांत जैसे “यंग टर्क”—आलोचनात्मक थे और कार्रवाई झेली। जगजीवन राम तथा बहुगुणा ने चुनाव से कुछ सप्ताह पहले पार्टी छोड़ी। इसलिए कांग्रेस की जिम्मेदारी संस्थागत है, भले ही हर सदस्य अतिरेक में भागीदार न था।
बाद के दशकों में कांग्रेस नेताओं ने अलग-अलग भाषा अपनाई। इंदिरा गांधी ने अतिरेक पर खेद जताया पर मूल घोषणा का बचाव किया। राहुल गांधी ने 2021 में आपातकाल को “गलती” कहा और स्वीकार किया कि जो हुआ वह गलत था। यह राजनीतिक स्वीकारोक्ति महत्वपूर्ण है, पर संगठनात्मक स्तर पर विस्तृत आत्म-परीक्षण या आधिकारिक क्षमायाचना पर बहस जारी रहती है।
भारतीय जनसंघ और आरएसएस
जनसंघ के नेता गिरफ्तार हुए और पार्टी जनता गठबंधन का प्रमुख अंग बनी। आरएसएस पर प्रतिबंध लगा, उसके कार्यकर्ताओं ने भूमिगत प्रतिरोध और सत्याग्रह किया। बाद में इसी परंपरा से भारतीय जनता पार्टी ने आपातकाल-विरोध को अपनी लोकतांत्रिक पहचान का केंद्रीय हिस्सा बनाया।
आलोचक देवरस के पत्रों और समझौते की कोशिशों का उल्लेख करते हैं। समर्थक कहते हैं कि जेल में बंद नेतृत्व द्वारा संगठन तथा बंदियों की रिहाई के लिए संवाद प्रतिरोध को नकारता नहीं। संतुलित निष्कर्ष यह है कि जमीनी कार्यकर्ता और शीर्ष नेतृत्व के व्यवहार में अलग-अलग प्रवृत्तियां थीं।
समाजवादी
समाजवादी नेता आपातकाल-विरोध के अग्रिम मोर्चे पर थे। जेपी, जॉर्ज फर्नांडिस, मधु लिमये, मधु दंडवते और राज नारायण महत्वपूर्ण चेहरे बने। उन्होंने नागरिक स्वतंत्रता के लिए भारी कीमत चुकाई। पर जनता सरकार के समय उनका आंतरिक विभाजन और सत्ता-संघर्ष यह भी दिखाता है कि तानाशाही-विरोध अपने आप स्थिर शासन क्षमता में नहीं बदलता।
कम्युनिस्ट दल
भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी ने आपातकाल का समर्थन किया। उसका आकलन था कि देश दक्षिणपंथी प्रतिक्रिया और फासीवादी खतरे से जूझ रहा है तथा इंदिरा गांधी की प्रगतिशील नीतियों की रक्षा आवश्यक है। सोवियत संघ के साथ निकट वैचारिक संबंध ने भी दृष्टिकोण प्रभावित किया। CPI(M) ने आपातकाल का विरोध किया और उसके कार्यकर्ता गिरफ्तार हुए। वाम राजनीति का यह विभाजन दिखाता है कि नागरिक स्वतंत्रता को वर्गीय या तत्काल रणनीतिक समीकरण के अधीन करने पर कितनी गंभीर भूल हो सकती है।
शिवसेना और अन्य समर्थक
बाल ठाकरे ने आपातकाल और अनुशासन का समर्थन किया। कुछ सामाजिक प्रतिष्ठित व्यक्तियों, उद्योगपतियों और लेखकों ने भी आरंभ में व्यवस्था का स्वागत किया। समर्थन के कारण समान नहीं थे—किसी को हड़ताल और वाम आंदोलन का भय था, किसी को आर्थिक स्थिरता चाहिए थी, किसी का इंदिरा गांधी से व्यक्तिगत संबंध था और किसी को मजबूत नेतृत्व आकर्षक लगा।
इतिहास में समर्थन दर्ज करना इसलिए जरूरी है कि लोकतंत्र केवल शासक की इच्छा से नहीं टूटता; समाज का एक हिस्सा कभी-कभी स्वतंत्रता की तुलना में व्यवस्था को प्राथमिकता देता है।
अकाली दल, डीएमके और क्षेत्रीय प्रतिरोध
अकाली दल ने संगठित सत्याग्रह किया। डीएमके सरकार केंद्र से टकराई और बर्खास्त हुई। गुजरात में विपक्षी शक्तियां सक्रिय रहीं। क्षेत्रीय दलों का अनुभव संघवाद और नागरिक स्वतंत्रता को जोड़ता है—केंद्र की असाधारण शक्ति सबसे पहले उन राज्यों को प्रभावित कर सकती है जहां अलग राजनीतिक दल शासन कर रहा हो।