पृष्ठभूमि: इंदिरा गांधी का उदय और सत्ता का केंद्रीकरण
लोकतंत्र का काला अध्याय: आपातकाल (1975–1977)
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आपातकाल को केवल 12 जून 1975 के इलाहाबाद हाईकोर्ट फैसले की तात्कालिक प्रतिक्रिया मानना अधूरा होगा। उसकी राजनीतिक जड़ें 1960 के दशक के अंत से विकसित हो रही थीं। लालबहादुर शास्त्री की मृत्यु के बाद जनवरी 1966 में इंदिरा गांधी प्रधानमंत्री बनीं। कांग्रेस के वरिष्ठ संगठनात्मक नेताओं—जिन्हें प्रायः “सिंडिकेट” कहा जाता था—ने उन्हें समझौता उम्मीदवार माना था। लेकिन कुछ ही वर्षों में उन्होंने पार्टी और सरकार दोनों में अपना स्वतंत्र प्रभुत्व स्थापित कर लिया।
1969 में राष्ट्रपति चुनाव और बैंक राष्ट्रीयकरण के प्रश्न पर कांग्रेस विभाजित हुई। इंदिरा गांधी ने पुरानी संगठनात्मक सत्ता को चुनौती देकर स्वयं को गरीबों, युवाओं और परिवर्तन की नेता के रूप में प्रस्तुत किया। 1971 के लोकसभा चुनाव में “गरीबी हटाओ” नारे के साथ उनकी कांग्रेस को भारी बहुमत मिला। उसी वर्ष बांग्लादेश मुक्ति युद्ध और पाकिस्तान पर भारत की विजय ने उनकी लोकप्रियता को अभूतपूर्व ऊंचाई दी। दिसंबर 1971 की सैन्य सफलता के बाद वे राष्ट्रीय शक्ति और निर्णायक नेतृत्व की प्रतीक बन गईं।
परंतु राजनीतिक सफलता के साथ सत्ता का केंद्रीकरण भी बढ़ा। कांग्रेस के भीतर स्वतंत्र क्षेत्रीय नेतृत्व कमजोर हुआ; मुख्यमंत्री और प्रदेश संगठन दिल्ली पर अधिक निर्भर हुए; प्रधानमंत्री कार्यालय की भूमिका मजबूत हुई; और सरकार तथा पार्टी के बीच संस्थागत दूरी कम होती गई। इंदिरा गांधी की व्यक्तिगत लोकप्रियता कांग्रेस के संगठनात्मक ढांचे का विकल्प बनती चली गई। “इंदिरा इज इंडिया” जैसी राजनीतिक अभिव्यक्तियां इसी व्यक्तिकेंद्रित वातावरण का प्रतीक थीं, भले ही वह संविधान का औपचारिक सिद्धांत नहीं थीं।
आर्थिक संकट और जनता का असंतोष
1971 की विजय के बाद भारत गंभीर आर्थिक चुनौतियों में घिरा। बांग्लादेश युद्ध और शरणार्थी संकट का वित्तीय बोझ, लगातार कमजोर मानसून, खाद्यान्न की कठिनाई, वैश्विक तेल संकट, औद्योगिक सुस्ती, बेरोजगारी और तेज महंगाई ने आम परिवारों पर दबाव बढ़ाया। 1973 के अरब-इजराइल युद्ध के बाद तेल की अंतरराष्ट्रीय कीमतों में उछाल ने आयात-निर्भर भारतीय अर्थव्यवस्था को प्रभावित किया। आवश्यक वस्तुओं के दाम बढ़े, शहरी मध्यवर्ग में असंतोष फैला और भ्रष्टाचार राजनीतिक विमर्श के केंद्र में आया।
सरकार की दृष्टि में कठिनाइयों का बड़ा कारण अंतरराष्ट्रीय आर्थिक परिस्थिति, जमाखोरी, विपक्षी अस्थिरता और उत्पादन की कमी थी। विपक्ष के अनुसार समस्या केवल बाहरी नहीं थी; प्रशासनिक भ्रष्टाचार, कांग्रेस शासन का केंद्रीकरण और जवाबदेही का अभाव भी जिम्मेदार थे। इन दोनों व्याख्याओं में कुछ न कुछ सत्य था। आर्थिक संकट वास्तविक था, लेकिन उसने पहले से कमजोर हो रही राजनीतिक संवाद-व्यवस्था को और तनावपूर्ण बना दिया।
गुजरात का नवनिर्माण आंदोलन
1973 के अंत में गुजरात में छात्रावास भोजन शुल्क वृद्धि के विरोध से शुरू हुआ छात्र आंदोलन शीघ्र ही महंगाई, भ्रष्टाचार और मुख्यमंत्री चिमनभाई पटेल के विरुद्ध व्यापक नवनिर्माण आंदोलन में बदल गया। प्रदर्शन, बंद, पुलिस कार्रवाई और हिंसा के बीच राज्य सरकार पर दबाव बढ़ा। अंततः विधानसभा भंग हुई और 1975 में नए चुनाव कराए गए। विपक्षी गठबंधन की सफलता ने संकेत दिया कि कांग्रेस का चुनावी प्रभुत्व अजेय नहीं रहा।
गुजरात आंदोलन का महत्व केवल एक राज्य सरकार के पतन में नहीं था। इसने छात्रों, मध्यवर्ग, व्यापारिक वर्ग और विपक्षी दलों की संयुक्त लामबंदी का मॉडल प्रस्तुत किया। इसके बाद बिहार में भी छात्र आंदोलन उभरा और उसने जयप्रकाश नारायण को सक्रिय राजनीति के केंद्र में ला दिया।
1974 की रेल हड़ताल
मई 1974 में जॉर्ज फर्नांडिस के नेतृत्व में रेल कर्मचारियों की देशव्यापी हड़ताल हुई। वेतन, कार्य-परिस्थितियों और बोनस सहित श्रमिक मांगों पर केंद्रित यह आंदोलन लगभग तीन सप्ताह चला। सरकार ने इसे राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था और आवश्यक सेवाओं के लिए गंभीर खतरा माना। बड़े पैमाने पर गिरफ्तारियां हुईं, कर्मचारियों को बर्खास्त या निलंबित किया गया और सेना की सहायता से रेल संचालन बनाए रखने की कोशिश हुई।
रेल हड़ताल ने सरकार और संगठित विरोध के बीच अविश्वास को गहरा किया। सरकार को लगा कि विपक्ष और ट्रेड यूनियन व्यवस्था को ठप कर सकते हैं; विरोधियों को लगा कि सरकार वैध श्रमिक असंतोष को पुलिस शक्ति से कुचल रही है। आपातकाल के समय सरकार ने इसी प्रकार की घटनाओं को अनुशासनहीनता और राष्ट्रीय अस्थिरता के प्रमाण के रूप में प्रस्तुत किया।