शाह आयोग: सत्ता-दुरुपयोग की आधिकारिक जांच
लोकतंत्र का काला अध्याय: आपातकाल (1975–1977)
28 मई 1977 को जनता सरकार ने सर्वोच्च न्यायालय के पूर्व मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति जे. सी. शाह की अध्यक्षता में जांच आयोग बनाया। उद्देश्य आपातकाल के दौरान सत्ता-दुरुपयोग, मनमानी, कदाचार और प्रशासनिक अतिरेक की जांच करना था। आयोग ने सार्वजनिक सुनवाई की, अधिकारियों, मंत्रियों, पत्रकारों और पीड़ितों के बयान लिए तथा सरकारी अभिलेख मांगे।
आयोग ने तीन रिपोर्टें प्रस्तुत कीं—पहली अंतरिम रिपोर्ट 11 मार्च 1978, दूसरी 26 अप्रैल 1978 और अंतिम रिपोर्ट 6 अगस्त 1978 को। कुल सामग्री पांच सौ से अधिक पृष्ठों में फैली थी। आयोग के सामने समय, रिकॉर्ड और सहयोग की सीमाएं थीं; इसलिए इसे प्रत्येक अतिरेक की पूर्ण सूची नहीं माना जा सकता। फिर भी यह आपातकाल पर सबसे महत्वपूर्ण आधिकारिक प्राथमिक स्रोत है।
प्रमुख निष्कर्ष
आयोग ने व्यापक रूप से पाया कि:
- आपातकाल की घोषणा के लिए प्रस्तुत सामग्री उस असाधारण कदम को पर्याप्त रूप से न्यायोचित नहीं करती थी;
- निर्णय अत्यधिक केंद्रीकृत और उचित कैबिनेट प्रक्रिया के बिना आगे बढ़ा;
- निवारक हिरासत का उपयोग राजनीतिक विरोधियों और असहमति को दबाने में हुआ;
- पुलिस तथा जिलाधिकारियों पर नामों के अनुसार आदेश बनाने का दबाव पड़ा;
- प्रेस को औपचारिक नियमों के साथ मौखिक और आर्थिक निर्देशों से नियंत्रित किया गया;
- परिवार नियोजन में लक्ष्य और बल-प्रयोग ने गंभीर अतिरेक पैदा किए;
- दिल्ली में विध्वंस और पुनर्वास में प्रक्रिया तथा मानवीय अधिकारों की उपेक्षा हुई;
- संजय गांधी जैसे गैर-संवैधानिक व्यक्ति का प्रशासन पर अनुचित प्रभाव था;
- अनेक अधिकारियों ने अनुचित आदेशों का प्रतिरोध करने के बजाय उत्साहपूर्वक पालन किया।
इंदिरा गांधी का रुख
इंदिरा गांधी ने आयोग की वैधता, प्रक्रिया और राजनीतिक उद्देश्य पर प्रश्न उठाए तथा विस्तृत सहयोग से परहेज किया। उनका पक्ष था कि आयोग जनता सरकार का राजनीतिक उपकरण है और आपातकालीन निर्णय राष्ट्रीय सुरक्षा के आकलन पर आधारित थे। आयोग ने उनके व्यवहार की आलोचना की।
किसी जांच आयोग की रिपोर्ट न्यायालय का आपराधिक निर्णय नहीं होती। आयोग तथ्य और प्रशासनिक जिम्मेदारी निर्धारित करता है; दंड के लिए नियमित मुकदमा और साक्ष्य आवश्यक हैं। जनता सरकार ने कुछ मामलों में प्राथमिकी और विशेष अदालतों की दिशा में कदम उठाए, पर राजनीतिक अस्थिरता तथा बाद में कांग्रेस की वापसी से अधिकांश जवाबदेही अधूरी रह गई।
रिपोर्टों का लुप्त होना और पुनर्प्राप्ति
इंदिरा गांधी की 1980 में वापसी के बाद शाह आयोग रिपोर्टों की प्रतियां सरकारी प्रसार से हट गईं और लंबे समय तक दुर्लभ रहीं। निजी संग्रह, पुस्तकालय और अभिलेखीय प्रतियों ने सामग्री बचाई। बाद के वर्षों में रिपोर्टें फिर सार्वजनिक चर्चा और अभिलेखों में आईं। यह स्वयं इस बात की शिक्षा है कि सत्ता-दुरुपयोग की जांच के दस्तावेजों का स्वतंत्र और बहु-स्थानिक संरक्षण क्यों आवश्यक है।