संजय गांधी: बिना संवैधानिक पद का समानांतर सत्ता-केंद्र
लोकतंत्र का काला अध्याय: आपातकाल (1975–1977)
आपातकाल के समय संजय गांधी न सांसद थे, न मंत्री और न सरकार के किसी संवैधानिक पद पर थे। उनकी सार्वजनिक पहचान प्रधानमंत्री के छोटे पुत्र, युवा कांग्रेस से जुड़े प्रभावशाली व्यक्ति और मारुति कार परियोजना के प्रवर्तक की थी। फिर भी 1975–77 में मंत्रियों, मुख्यमंत्रियों, नौकरशाहों, पुलिस अधिकारियों और युवा कांग्रेस नेताओं पर उनका प्रभाव तेजी से बढ़ा।
इस प्रभाव का कोई औपचारिक सरकारी आदेश-पत्र नहीं था। वह प्रधानमंत्री तक निकट पहुंच, राजनीतिक संरक्षण और अधिकारियों की भविष्य-संबंधी आशंकाओं से पैदा हुआ। शासन में ऐसे गैर-औपचारिक केंद्र विशेष रूप से खतरनाक होते हैं, क्योंकि शक्ति होती है पर संवैधानिक उत्तरदायित्व नहीं। अधिकारी समझते हैं कि निर्देश प्रभावशाली है, लेकिन उसके विरुद्ध अपील, संसदीय प्रश्न या विभागीय जवाबदेही का स्पष्ट मार्ग नहीं होता।
मारुति परियोजना और हितों के टकराव का प्रश्न
आपातकाल से पहले ही संजय गांधी की मारुति कार परियोजना भूमि आवंटन, लाइसेंस, वित्त और सरकारी सहायता को लेकर विवाद में थी। आलोचकों ने आरोप लगाया कि प्रधानमंत्री के पुत्र को असाधारण सुविधा मिली। समर्थकों ने इसे भारत में सस्ती स्वदेशी कार बनाने का युवा औद्योगिक प्रयास बताया। परियोजना तत्काल सफल उत्पादन नहीं कर सकी, लेकिन इसने परिवार, व्यापार और सरकार के संबंधों पर प्रश्न खड़े किए।
युवा कांग्रेस और दरबारी राजनीति
संजय गांधी के आसपास युवा नेताओं और अधिकारियों का समूह बना। उनके कार्यक्रमों में भीड़ जुटाना, लक्ष्य घोषित करना और तत्काल परिणाम दिखाना राजनीतिक निष्ठा का प्रदर्शन बन गया। वरिष्ठ मंत्री भी उनके आयोजनों में उपस्थित रहते और मुख्यमंत्री निर्देश लेने पहुंचते। इस वातावरण में नीति विशेषज्ञता, विधिक प्रक्रिया और स्थानीय संवेदनशीलता की तुलना में “संजय जी क्या चाहते हैं” अधिक प्रभावी प्रश्न हो सकता था।
यह आवश्यक नहीं कि हर अतिरेक का व्यक्तिगत आदेश संजय गांधी ने दिया हो। प्रशासनिक दमन की एक विशेषता है कि अधीनस्थ अधिकारी अनुमानित इच्छा को भी लक्ष्य बनाकर उससे आगे निकल जाते हैं। शाह आयोग ने सत्ता के इस अनौपचारिक संचालन और अधिकारियों की स्वेच्छाचारी तत्परता पर गंभीर टिप्पणियां कीं। जिम्मेदारी इसलिए केवल निर्देश देने वाले व्यक्ति की नहीं, उन संवैधानिक पदाधिकारियों की भी थी जिन्होंने अनधिकृत प्रभाव को सरकारी शक्ति में बदला।
पांच सूत्री कार्यक्रम
संजय गांधी के कार्यक्रम के सामान्यतः पांच बिंदु बताए जाते हैं:
- परिवार नियोजन;
- वृक्षारोपण;
- निरक्षरता उन्मूलन;
- दहेज प्रथा का विरोध;
- जातिवाद/सामाजिक भेद समाप्त करना।
कुछ विवरणों में पर्यावरण-सुधार अथवा झुग्गी-सफाई को भी कार्यक्रम के व्यावहारिक विस्तार के रूप में जोड़ा गया। इन उद्देश्यों में कई अपने आप में प्रगतिशील थे। समस्या लोकतांत्रिक सहमति, स्वैच्छिक भागीदारी और विधिक प्रक्रिया के स्थान पर लक्ष्य, भय और पुलिस शक्ति के उपयोग से हुई। अच्छा घोषित उद्देश्य दमनकारी साधन को न्यायसंगत नहीं बना सकता।