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दस्तावेज़ · तथ्य · विश्लेषण
OCN Research Dossier–014 · अध्याय 15

प्रतिरोध: जेलों से भूमिगत प्रेस तक

लोकतंत्र का काला अध्याय: आपातकाल (1975–1977)

Omkar Chaudhary / OCN Research Deskविस्तृत शोध संस्करण · 2 अगस्त 2026

आपातकाल का अर्थ यह नहीं था कि पूरा देश बिना प्रतिरोध के झुक गया। विरोध का स्वरूप बदल गया—खुले मंच और रैलियां बंद हुईं तो भूमिगत पर्चे, गुप्त बैठकें, जेल संदेश, विदेशी रेडियो प्रसारण, धार्मिक संस्थाएं और व्यक्तिगत साहस महत्वपूर्ण बने।

समाजवादी और बारोडा डायनामाइट मामला

जॉर्ज फर्नांडिस भूमिगत हो गए। उन पर और उनके सहयोगियों पर सरकारी प्रतिष्ठानों को विस्फोट से नुकसान पहुंचाकर शासन के विरुद्ध प्रतिरोध की योजना बनाने का आरोप लगा, जिसे बारोडा डायनामाइट केस कहा गया। 1976 में गिरफ्तारी के बाद हथकड़ी में उनका प्रसिद्ध चित्र आपातकाल-विरोध का प्रतीक बना। आरोप गंभीर और हिंसक साधन से जुड़े थे; फर्नांडिस ने इसे तानाशाही के विरुद्ध प्रतिरोध बताया। जनता सरकार आने के बाद मुकदमा वापस ले लिया गया।

यह प्रकरण लोकतांत्रिक प्रतिरोध की सीमा पर कठिन प्रश्न खड़ा करता है। दमनकारी शासन के विरुद्ध भी विस्फोटक साधन नागरिकों की सुरक्षा और कानून के लिए खतरा हो सकते हैं। आपातकाल की आलोचना करते हुए हर विरोधी कार्रवाई को स्वतः लोकतांत्रिक नहीं मानना चाहिए। फिर भी निष्पक्ष मुकदमा और स्वतंत्र प्रेस के अभाव में सरकार के आरोपों की सार्वजनिक जांच संभव नहीं थी।

आरएसएस की भूमिका

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ पर प्रतिबंध लगा और उसके हजारों कार्यकर्ता गिरफ्तार हुए। संघ से जुड़े नेटवर्क ने भूमिगत साहित्य, संदेश और सत्याग्रह में भाग लिया। बाद के राजनीतिक आख्यान में आरएसएस ने अपने प्रतिरोध को प्रमुखता दी। इसके साथ यह तथ्य भी चर्चा में रहता है कि जेल में बंद सरसंघचालक बालासाहेब देवरस ने इंदिरा गांधी को पत्र लिखे और प्रतिबंध हटाने/सहयोग की संभावना व्यक्त की।

दोनों तथ्य साथ रखे जाने चाहिए: अनेक स्वयंसेवकों ने वास्तविक जोखिम उठाकर विरोध किया; संगठन का शीर्ष नेतृत्व राहत और समझौते का रास्ता भी खोज रहा था। किसी व्यापक संगठन का व्यवहार एकरूप नहीं होता।

अकाली दल और सिख सत्याग्रह

शिरोमणि अकाली दल ने पंजाब में संगठित सत्याग्रह चलाया। जत्थे गिरफ्तारी देने गए और गुरुद्वारों ने प्रतिरोध को आधार दिया। इसे आपातकाल के विरुद्ध सबसे निरंतर खुले धार्मिक-राजनीतिक आंदोलनों में गिना जाता है। सरकार ने इसे कानून-व्यवस्था और अलग राजनीतिक मांगों के संदर्भ में देखा, पर अकाली नेतृत्व ने नागरिक स्वतंत्रता की रक्षा का अभियान बताया।

विद्यार्थी, समाजवादी और गांधीवादी नेटवर्क

अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद, समाजवादी युवजन समूह, सर्वोदय कार्यकर्ता और विभिन्न दलों के स्थानीय नेटवर्क ने पर्चे बांटे, गुप्त बुलेटिन छापे और बंदियों के परिवारों की सहायता की। गुजरात का भूमिपुत्र, भूमिगत सत्य समाचार और अन्य छोटे प्रकाशन वैकल्पिक सूचना माध्यम बने। छापाखाना, स्टेंसिल, साइक्लोस्टाइल मशीन और हाथ से पहुंचाया गया पर्चा लोकतांत्रिक संचार के औजार बने।

विदेशी मीडिया और प्रवासी भारतीय

बीबीसी की हिंदी सेवा तथा विदेशी समाचार-पत्रों ने उन घटनाओं की जानकारी दी जिन्हें भारतीय प्रेस नहीं छाप सकता था। सरकार ने कुछ विदेशी संवाददाताओं पर प्रतिबंध लगाया और समाचार प्रेषण की जांच की। विदेशों में भारतीय लोकतंत्र और मानवाधिकार को लेकर अभियान चले। सरकार ने विदेशी आलोचना को भारत के आंतरिक मामले में हस्तक्षेप और पक्षपाती प्रचार कहा।

मौन भी एक ऐतिहासिक तथ्य

प्रतिरोध की वीरगाथाओं के बीच यह स्वीकार करना होगा कि करोड़ों लोगों का दैनिक जीवन चलता रहा। कुछ लोगों ने अनुशासन और कीमतों में राहत का स्वागत किया; कुछ राजनीति से दूर थे; कुछ को सूचना ही नहीं थी; और कुछ भयभीत थे। लोकतंत्र के संकट में मौन हमेशा समर्थन नहीं होता, पर सत्ता उसे सहमति के रूप में प्रस्तुत कर सकती है। स्वतंत्र चुनाव ही मौन नागरिक की वास्तविक राय जानने का सबसे विश्वसनीय माध्यम बने—और 1977 में वही हुआ।