राज नारायण मामला और इलाहाबाद हाईकोर्ट का ऐतिहासिक निर्णय
लोकतंत्र का काला अध्याय: आपातकाल (1975–1977)
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1971 के लोकसभा चुनाव में इंदिरा गांधी ने रायबरेली से संयुक्त सोशलिस्ट पार्टी के राज नारायण को बड़े अंतर से हराया था। राज नारायण ने उनकी जीत को चुनाव याचिका के माध्यम से इलाहाबाद हाईकोर्ट में चुनौती दी। उन्होंने रिश्वत, सरकारी संसाधनों के दुरुपयोग, धार्मिक प्रतीकों, चुनाव खर्च और सरकारी कर्मचारियों की सेवाएं लेने सहित कई आरोप लगाए। लंबी सुनवाई के दौरान स्वयं प्रधानमंत्री से भी न्यायालय में पूछताछ हुई।
12 जून 1975 को न्यायमूर्ति जगमोहनलाल सिन्हा ने निर्णय दिया। अदालत ने अधिकांश गंभीर आरोप खारिज कर दिए, लेकिन दो बिंदुओं पर इंदिरा गांधी को भ्रष्ट चुनावी आचरण का दोषी माना। पहला, यशपाल कपूर ने सरकारी पद से उनका इस्तीफा प्रभावी होने से पहले चुनाव संबंधी कार्य किया। दूसरा, उत्तर प्रदेश सरकार के अधिकारियों की सहायता से चुनावी मंच, बिजली और अन्य व्यवस्थाएं कराई गईं। ये निष्कर्ष जनप्रतिनिधित्व अधिनियम की धारा 123(7) के अंतर्गत सरकारी कर्मचारी की सहायता लेने से संबंधित थे।
अदालत ने उनका 1971 का चुनाव निरस्त कर दिया और छह वर्ष तक चुनाव लड़ने से अयोग्य ठहराया। निर्णय का कानूनी आधार अपेक्षाकृत तकनीकी था; अदालत ने उन्हें मतदाताओं को रिश्वत देने या बड़े पैमाने पर चुनाव धांधली का दोषी नहीं ठहराया था। फिर भी राजनीतिक प्रभाव विस्फोटक था, क्योंकि पहली बार किसी सत्तारूढ़ प्रधानमंत्री का निर्वाचन न्यायालय ने रद्द किया था।
क्या उन्हें तत्काल इस्तीफा देना चाहिए था?
विपक्ष ने प्रधानमंत्री से तत्काल इस्तीफा मांगा। कांग्रेस ने कहा कि निर्णय के विरुद्ध सर्वोच्च न्यायालय में अपील का संवैधानिक अधिकार है और अंतिम निर्णय तक इस्तीफा आवश्यक नहीं। संसदीय प्रणाली में प्रधानमंत्री बने रहने के लिए लोकसभा सदस्य होना सामान्य नियम है, पर संविधान किसी गैर-सदस्य को भी छह महीने तक मंत्री रहने की अनुमति देता है। इसलिए स्थिति राजनीतिक और नैतिक रूप से गंभीर थी, लेकिन कानूनी विकल्प समाप्त नहीं हुए थे।
व्यावहारिक समाधान संभव थे: इंदिरा गांधी अस्थायी रूप से पद छोड़कर किसी सहयोगी को प्रधानमंत्री बना सकती थीं; कांग्रेस संसदीय दल नया नेता चुन सकता था; या सर्वोच्च न्यायालय के अंतिम निर्णय तक सीमित राजनीतिक व्यवस्था बनाई जा सकती थी। उनके समर्थकों को आशंका थी कि पद छोड़ते ही पार्टी में प्रतिद्वंद्वी उभरेंगे और उनकी वापसी कठिन हो जाएगी। यहीं व्यक्तिगत सत्ता-सुरक्षा और संस्थागत लोकतंत्र के बीच संघर्ष तीखा हुआ।
सर्वोच्च न्यायालय की सशर्त राहत
इंदिरा गांधी ने हाईकोर्ट के निर्णय को सर्वोच्च न्यायालय में चुनौती दी। अवकाशकालीन न्यायाधीश न्यायमूर्ति वी. आर. कृष्ण अय्यर ने 24 जून 1975 को पूर्ण स्थगन देने से इनकार करते हुए सशर्त अंतरिम राहत दी। वे प्रधानमंत्री पद पर बनी रह सकती थीं और संसद की कार्यवाही में भाग ले सकती थीं, लेकिन लोकसभा में मतदान के अधिकार और सदस्य के रूप में कुछ विशेषाधिकारों पर रोक रही।
यह आदेश न तो हाईकोर्ट के निर्णय की अंतिम पुष्टि था और न पूर्ण निरस्तीकरण। सर्वोच्च न्यायालय में अपील लंबित थी। पर राजनीतिक रूप से यह आधी राहत थी: इंदिरा गांधी पद पर रह सकती थीं, किंतु उनका संसदीय अधिकार सीमित और वैधता विवादित बनी रही। अगले दिन विपक्ष की विशाल रैली हुई और उसी रात आपातकाल की प्रक्रिया आगे बढ़ी।
फैसले और आपातकाल का संबंध
सरकार ने आपातकाल को केवल प्रधानमंत्री के निर्वाचन विवाद से जोड़ने से इनकार किया। उसका कहना था कि देश पहले से आंदोलन, षड्यंत्र, आर्थिक संकट और प्रशासनिक अव्यवस्था का सामना कर रहा था; न्यायालय का निर्णय केवल घटनाक्रम का एक हिस्सा था। आलोचकों के अनुसार समय-क्रम स्वयं बहुत कुछ कहता है: 12 जून को चुनाव निरस्त, 24 जून को सर्वोच्च न्यायालय से सीमित राहत और 25 जून की रात आंतरिक आपातकाल।
स्वतंत्र मूल्यांकन में दोनों पहलू जुड़े दिखाई देते हैं। देश में वास्तविक राजनीतिक तनाव और आर्थिक असंतोष था, लेकिन प्रधानमंत्री के पद पर तत्काल संकट ने असाधारण कदम उठाने की प्रेरणा को तीव्र किया। यदि केवल राष्ट्रीय सुरक्षा कारण निर्णायक होते, तो सरकार कैबिनेट, संसद और राज्यों के सामने विस्तृत तथ्य रखकर पहले भी प्रक्रिया शुरू कर सकती थी। निर्णय का अचानक, गोपनीय और अत्यंत केंद्रीकृत स्वरूप व्यक्तिगत राजनीतिक संकट की भूमिका को मजबूत करता है।