नसबंदी अभियान: जनसंख्या नीति से जबरदस्ती तक
लोकतंत्र का काला अध्याय: आपातकाल (1975–1977)
भारत में परिवार नियोजन कार्यक्रम आपातकाल से बहुत पहले शुरू हो चुका था। 1952 में राष्ट्रीय परिवार नियोजन कार्यक्रम अपनाने वाला भारत दुनिया के शुरुआती देशों में था। तेजी से बढ़ती जनसंख्या, सीमित संसाधन, गरीबी, मातृ-शिशु स्वास्थ्य और विकास योजनाओं पर दबाव वास्तविक नीति-चिंताएं थीं। नसबंदी के साथ गर्भनिरोधक, शिक्षा और स्वास्थ्य सेवाएं परिवार नियोजन के साधन थे।
आपातकाल में अंतर यह आया कि परिवार नियोजन को तेज राजनीतिक प्राथमिकता, संख्यात्मक लक्ष्य और प्रशासनिक प्रतिष्ठा से जोड़ दिया गया। विशेषकर 1976–77 में पुरुष नसबंदी—वैसेक्टॉमी—पर असाधारण जोर पड़ा। जिलाधिकारियों, पुलिस, स्वास्थ्य अधिकारियों, शिक्षकों, पटवारियों और अन्य कर्मचारियों को लक्ष्य दिए गए या लक्ष्य जैसी अपेक्षा बनाई गई। लक्ष्य पूरा न करने पर स्थानांतरण, वेतन, पदोन्नति या प्रतिकूल टिप्पणी का भय हो सकता था।
कुल आंकड़े क्या कहते हैं?
गृह मंत्रालय द्वारा 2025 में लोकसभा को दी गई शाह आयोग-आधारित जानकारी के अनुसार:
| वर्ष | निर्धारित लक्ष्य | दर्ज नसबंदी प्रक्रियाएं |
|---|---|---|
| 1975–76 | 24,85,000 | 26,24,755 |
| 1976–77 | 42,55,500 | 81,32,209 |
| कुल | 67,40,500 | 1,07,56,964 |
अर्थात दो वर्षों में कुल लक्ष्य से लगभग 59–60 प्रतिशत अधिक प्रक्रियाएं दर्ज हुईं। सबसे बड़ा उछाल 1976–77 में आया, जब 81 लाख से अधिक नसबंदियां हुईं। सरकारी उत्तर में परिवार नियोजन प्रक्रियाओं से जुड़ी 1,774 मौतों का उल्लेख भी शाह आयोग के आधार पर किया गया। यह मृत्यु-संख्या उन सभी लोगों की नहीं है जिनकी प्रक्रिया दबाव में हुई; यह दर्ज चिकित्सकीय मौतों की अलग श्रेणी है।
क्या सभी 1.07 करोड़ नसबंदियां जबरन थीं?
नहीं। कुल संख्या को पूर्णतः “जबरन नसबंदी” कहना शोध की दृष्टि से अनुचित होगा। प्रोत्साहन राशि, परिवार का निर्णय या स्वैच्छिक स्वास्थ्य कार्यक्रम के कारण भी प्रक्रियाएं हुईं। पर “स्वैच्छिक” की प्रशासनिक परिभाषा पर गंभीर प्रश्न है। यदि व्यक्ति को राशन कार्ड रोकने, सरकारी वेतन न देने, दुकान का लाइसेंस रद्द करने, जमीन या आवास से वंचित करने, पुलिस द्वारा पकड़ने या किसी लाभ के लिए नसबंदी प्रमाणपत्र अनिवार्य करने का भय हो, तो हस्ताक्षरित सहमति वास्तविक स्वतंत्र चुनाव नहीं रहती।
शाह आयोग और बाद के शोध में पुलिस द्वारा लोगों को पकड़कर शिविर पहुंचाने, बसों और बाजारों से पुरुषों को ले जाने, उम्र या पारिवारिक स्थिति की उपेक्षा, पहले से नसबंदी करा चुके व्यक्ति पर दोबारा प्रक्रिया, अविवाहित और वृद्ध पुरुषों तक को लक्ष्य बनाने तथा खराब चिकित्सकीय व्यवस्था की शिकायतें दर्ज हैं। सभी राज्यों में दबाव समान नहीं था; उत्तर भारत के कुछ राज्यों और दिल्ली-हरियाणा क्षेत्र में अभियान विशेष रूप से कठोर माना गया।
प्रोत्साहन और दंड का जाल
नसबंदी स्वीकार करने वालों को नकद राशि, भोजन, कपड़ा, रेडियो, छुट्टी या अन्य लाभ दिए जा सकते थे। स्वयं प्रोत्साहन अलोकतांत्रिक नहीं है, यदि जानकारी और स्वतंत्र सहमति हो। समस्या तब उत्पन्न हुई जब प्रोत्साहन के साथ दंडात्मक “डिसइन्सेंटिव” जुड़े। कहीं दो से अधिक बच्चों वाले कर्मचारियों की सुविधाओं पर प्रश्न उठा; कहीं ड्राइविंग लाइसेंस, राशन, ऋण, भूमि-पट्टा या आवास के लिए प्रमाणपत्र मांगा गया; कहीं अध्यापकों और अधिकारियों से निश्चित संख्या में लोगों को शिविर लाने की अपेक्षा की गई।
इससे स्वास्थ्य नीति संख्या-संग्रह अभियान बन गई। चिकित्सक पर तेजी से ऑपरेशन करने का दबाव था, संक्रमण-नियंत्रण और बाद की देखभाल कमजोर पड़ी और गरीब व्यक्ति शिकायत करने से डरता था। संख्या जितनी ऊंची, अधिकारी उतना सफल—इस सरल समीकरण ने चिकित्सा नैतिकता को प्रशासनिक लक्ष्य के अधीन कर दिया।
मुस्लिम समुदाय और सामाजिक भय
पुरानी दिल्ली, हरियाणा के मेव बहुल क्षेत्रों और अन्य मुस्लिम बस्तियों में नसबंदी अभियान ने विशेष भय पैदा किया। परिवार और समुदाय को लगा कि जनसंख्या नियंत्रण उनके विरुद्ध लक्षित है। तुर्कमान गेट के आसपास नसबंदी शिविर और विध्वंस अभियान का साथ-साथ चलना इस अविश्वास को गहरा करता है। ऐतिहासिक अध्ययन बताते हैं कि जब राज्य जनसंख्या नीति को पुलिस शक्ति से लागू करता है तो स्वास्थ्य कार्यक्रम पीढ़ियों तक अविश्वास पैदा कर सकता है।
महिलाओं और पुरुषों पर अलग प्रभाव
1976–77 के अभियान में पुरुष नसबंदी का हिस्सा असामान्य रूप से बड़ा था, क्योंकि वैसेक्टॉमी तकनीकी रूप से सरल और तेजी से की जा सकती थी। आपातकाल के बाद पुरुष नसबंदी के प्रति भय और राजनीतिक प्रतिक्रिया इतनी प्रबल हुई कि परिवार नियोजन का भार धीरे-धीरे महिला नसबंदी पर अधिक स्थानांतरित हो गया। इस प्रकार पुरुषों पर हुई दमनकारी नीति का दीर्घकालीन परिणाम महिलाओं के स्वास्थ्य पर अनुपातहीन बोझ के रूप में भी सामने आया।
नसबंदी के अनुभव ने भारत की नीति-भाषा बदली। “फैमिली प्लानिंग” के स्थान पर “फैमिली वेलफेयर” और स्वैच्छिकता पर अधिक बल दिया गया। चुनावी राजनीति में “नसबंदी” कांग्रेस-विरोधी आक्रोश का शक्तिशाली प्रतीक बनी।