समाज पर प्रभाव: भय, व्यवस्था और असमान अनुभव
लोकतंत्र का काला अध्याय: आपातकाल (1975–1977)
आपातकाल का अनुभव हर भारतीय के लिए एक जैसा नहीं था। दिल्ली के उस परिवार के लिए, जिसका घर बुलडोजर से गिरा और सदस्य नसबंदी शिविर ले जाए गए, यह प्रत्यक्ष राज्य-दमन था। किसी छोटे शहर के व्यापारी के लिए यह कर अधिकारियों और लाइसेंस जांच का भय हो सकता था। सरकारी कर्मचारी को समयपालन और लक्ष्य का दबाव महसूस हुआ। ग्रामीण महिला के लिए पति की गिरफ्तारी या नसबंदी के बाद आय का संकट मुख्य अनुभव हो सकता था। वहीं कुछ मध्यवर्गीय नागरिकों ने कम हड़ताल, साफ सड़क, नियंत्रित कीमत और प्रशासनिक तत्परता को राहत के रूप में देखा।
इतिहास का संतुलित लेखन इन परस्पर विरोधी स्मृतियों को दर्ज करता है, लेकिन राज्य की जवाबदेही का मानक पीड़ित के अधिकार से तय होना चाहिए। यदि कुछ लोगों को व्यवस्था बेहतर लगी, तो इससे बिना मुकदमे बंदी या बलपूर्वक चिकित्सा प्रक्रिया वैध नहीं हो जाती। लोकतंत्र की परीक्षा बहुसंख्यक सुविधा से ही नहीं, सबसे कमजोर नागरिक की स्वतंत्रता से होती है।
गरीब और असंगठित वर्ग
गरीब नागरिक के पास वकील, राजनीतिक संपर्क, निजी अस्पताल या वैकल्पिक आवास नहीं था। वह राशन, नगर पालिका, स्थानीय पुलिस, तहसील और सरकारी अस्पताल पर निर्भर था। इस कारण परिवार नियोजन और विध्वंस के लक्ष्य उस पर आसानी से लागू किए जा सके। आपातकाल की “दक्षता” ने प्रशासन की उस असमानता को उजागर किया जिसमें नियम का कठोरतम रूप कमजोर पर और रियायत का लाभ प्रभावशाली को मिलता है।
दलित, पिछड़े और भूमिहीन
20 सूत्री कार्यक्रम में बंधुआ मजदूरी उन्मूलन, भूमिहीनों को जमीन और ग्रामीण ऋण राहत के प्रावधान इन वर्गों के लिए लाभकारी हो सकते थे। लेकिन स्थानीय जमींदार, पुलिस और प्रशासन की शक्ति-संरचना रातोंरात नहीं बदली। कई स्थानों पर वही गरीब परिवार नसबंदी लक्ष्य और पुलिस कार्रवाई के प्रति सबसे असुरक्षित रहे। इसलिए आपातकाल का सामाजिक परिणाम एकरेखीय नहीं था—कल्याण और दमन कभी-कभी एक ही सरकारी मशीन से निकले।
मुस्लिम समुदाय
पुरानी दिल्ली के विध्वंस और नसबंदी ने मुस्लिम समुदाय में विशेष अविश्वास पैदा किया। उत्तर भारत में परिवार नियोजन की अफवाहें और पुलिस दबाव कांग्रेस के पारंपरिक मुस्लिम समर्थन को कमजोर करने वाले कारक बने। 1977 के चुनाव में यह प्रतिक्रिया स्पष्ट दिखाई दी। हालांकि पूरे देश के मुस्लिम मत को एक कारण से समझना गलत होगा; स्थानीय गठबंधन, उम्मीदवार और राज्य की स्थिति भी महत्वपूर्ण थी।
महिलाएं
आपातकाल के मुख्य आख्यान पुरुष राजनीतिक नेताओं और पुरुष नसबंदी पर केंद्रित हैं। महिलाओं ने बंदी परिवारों की आर्थिक जिम्मेदारी उठाई, जेल मुलाकात के लिए यात्रा की, भूमिगत संदेश पहुंचाए और बेदखली के विरुद्ध प्रतिरोध किया। नसबंदी के बाद पुरुष की बीमारी या मृत्यु का पारिवारिक बोझ भी महिलाओं पर पड़ा। दूसरी ओर दहेज-विरोध और महिला कल्याण की भाषा सरकारी कार्यक्रम में मौजूद थी, लेकिन स्वतंत्र महिला संगठनों की आलोचनात्मक आवाज के लिए लोकतांत्रिक स्थान सीमित था।
विश्वविद्यालय और विद्यार्थी
बिहार तथा गुजरात आंदोलनों में छात्रों की बड़ी भूमिका के कारण विश्वविद्यालय सुरक्षा एजेंसियों की निगरानी में आए। छात्र नेताओं की गिरफ्तारी, संगठन पर नियंत्रण और परिसर राजनीति में हस्तक्षेप हुआ। कुछ कुलपतियों और शिक्षकों ने सरकारी अनुशासन का समर्थन किया, कुछ ने बंदियों या प्रतिरोध की सहायता की। शिक्षा संस्थानों ने दिखाया कि राजनीतिक स्वतंत्रता के बिना अकादमिक स्वतंत्रता भी सुरक्षित नहीं रहती।
श्रमिक और ट्रेड यूनियन
हड़तालों पर नियंत्रण और नेताओं की गिरफ्तारी से औद्योगिक उत्पादन में अल्पकालीन स्थिरता आ सकती थी। किंतु सामूहिक सौदेबाजी कमजोर हुई। बोनस पर प्रभाव, वेतन विवाद और सेवा-शर्तों पर विरोध का रास्ता संकुचित हुआ। उद्योगपति व्यवस्था से संतुष्ट हो सकते थे, पर श्रम-अधिकार की कीमत पर मिली शांति स्थायी औद्योगिक न्याय नहीं थी।