इंदिरा गांधी और आपातकाल समर्थकों का पक्ष
लोकतंत्र का काला अध्याय: आपातकाल (1975–1977)
किसी ऐतिहासिक निर्णय का मूल्यांकन केवल विजयी पक्ष की भाषा से नहीं किया जा सकता। इंदिरा गांधी, उनके सहयोगियों और आपातकाल के समर्थकों ने अपने निर्णय के समर्थन में अनेक तर्क दिए। इन तर्कों को समझना उनका अनुमोदन नहीं, बल्कि इतिहास को उसके वास्तविक विवाद सहित देखना है।
तर्क 1: देश अराजकता की ओर जा रहा था
सरकार ने गुजरात और बिहार आंदोलनों, रेल हड़ताल, औद्योगिक असंतोष, छात्र हिंसा, सरकारी कार्यालयों के घेराव और जेपी की पुलिस-सैनिकों से अपील को एक संयुक्त आंतरिक खतरे के रूप में प्रस्तुत किया। उसका कहना था कि विपक्ष चुनावी पराजय स्वीकार कर संवैधानिक मार्ग पर चलने के बजाय निर्वाचित सरकार को सड़क से हटाना चाहता था। यदि प्रशासन आदेश मानना बंद कर दे और रेल जैसी आवश्यक सेवा रुक जाए तो राज्य पंगु हो सकता है।
इस तर्क में वास्तविक चिंता थी। 1970 के दशक का भारत महंगाई, बेरोजगारी, राजनीतिक हिंसा, नक्सलवाद और क्षेत्रीय तनाव से जूझ रहा था। जेपी आंदोलन की सभी कार्रवाइयां संस्थागत रूप से स्पष्ट या अहिंसक नहीं थीं। पुलिस और सेना से आदेश की वैधता स्वयं परखने की सार्वजनिक अपील जोखिमपूर्ण थी। किसी भी निर्वाचित सरकार को कानून-व्यवस्था बचाने का अधिकार और दायित्व है।
लेकिन खतरे की उपस्थिति से अपनाए गए प्रत्येक साधन की वैधता सिद्ध नहीं होती। सरकार हिंसा करने वालों पर मुकदमा चला सकती थी, निषिद्ध क्षेत्र घोषित कर सकती थी, अदालत से आदेश ले सकती थी, विपक्ष से वार्ता कर सकती थी या समयपूर्व चुनाव करा सकती थी। पूरे विपक्ष को बंदी बनाना, प्रेस की पूर्व-जांच और जीवन-स्वतंत्रता के न्यायिक उपचार का निलंबन खतरे के अनुपात से बहुत आगे था।
तर्क 2: आपातकाल संविधान में था
समर्थक कहते हैं कि अनुच्छेद 352 संविधान निर्माताओं ने बनाया था; राष्ट्रपति ने उद्घोषणा की, संसद ने स्वीकृति दी और सर्वोच्च न्यायालय ने आपातकालीन व्यवस्था के कुछ प्रभाव स्वीकार किए। इसलिए इसे सीधा “असंवैधानिक तख्तापलट” कहना तकनीकी रूप से सही नहीं।
यह तर्क वैधानिक रूप पर सही है। 1975 में सेना ने संविधान हटाकर सत्ता नहीं ली थी। लेकिन संविधान का उपयोग संविधानवाद के विरुद्ध भी हो सकता है। संविधानवाद का अर्थ केवल किसी अनुच्छेद की भाषा नहीं; सीमित सरकार, स्वतंत्र न्यायपालिका, निष्पक्ष चुनाव, नागरिक स्वतंत्रता और उत्तरदायी संस्थाएं भी हैं। बाद में 38वें, 39वें और 42वें संशोधनों से न्यायिक नियंत्रण घटाने का प्रयास बताता है कि मौजूदा वैधानिकता को सत्ता-सुरक्षा के लिए पुनर्गठित किया गया।
तर्क 3: प्रधानमंत्री का चुनाव मामला अंतिम नहीं था
इंदिरा गांधी के समर्थक सही रूप से बताते हैं कि इलाहाबाद हाईकोर्ट ने उन्हें व्यापक चुनावी धोखाधड़ी या रिश्वत का दोषी नहीं माना था। केवल दो तकनीकी किस्म के सरकारी सहायता संबंधी आरोप सिद्ध हुए और सर्वोच्च न्यायालय में अपील लंबित थी। उन्हें अंतरिम रूप से प्रधानमंत्री बने रहने दिया गया। बाद में कानून में बदलाव और सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय से उनका चुनाव बहाल हुआ। इसलिए यह कहना कि 25 जून को वे कानूनी रूप से प्रधानमंत्री नहीं थीं, गलत है।
पर आलोचना का केंद्र यह नहीं कि वे उसी क्षण पद पर रहने से पूर्णतः अयोग्य थीं। प्रश्न यह है कि व्यक्तिगत निर्वाचन संकट के तुरंत बाद राष्ट्रीय आपातकाल क्यों घोषित हुआ और फिर संविधान को इस तरह क्यों बदला गया कि प्रधानमंत्री का चुनाव विशेष सुरक्षा पा सके। तकनीकी चुनाव दोष की गंभीरता सीमित हो सकती है, पर उसके बाद सत्ता की प्रतिक्रिया अत्यंत व्यापक थी।
तर्क 4: अर्थव्यवस्था और अनुशासन में सुधार हुआ
सरकार ने कीमतों में कमी, जमाखोरी-विरोध, उत्पादन वृद्धि, हड़ताल में गिरावट, समयपालन, बंधुआ मजदूरी उन्मूलन और 20 सूत्री कार्यक्रम की उपलब्धियां गिनाईं। कुछ आंकड़े वास्तव में सुधार दिखाते हैं। 1975–76 में बेहतर मानसून, वैश्विक परिस्थितियों और कठोर आर्थिक उपायों के संयुक्त प्रभाव से महंगाई घटी।
पर कारण और सहसंबंध अलग हैं। हर सुधार का श्रेय आपातकाल को नहीं दिया जा सकता। बेहतर कृषि उत्पादन मौसम से जुड़ा था; वैश्विक तेल स्थिति बदल रही थी; और कीमतें पहले के अत्यंत ऊंचे आधार से नीचे आईं। सबसे महत्वपूर्ण, आर्थिक परिणाम नागरिक अधिकार निलंबित करने का नैतिक प्रतिफल नहीं हो सकते। यदि एक सरकार कीमत कम करने के बदले प्रेस स्वतंत्रता मांगे तो लोकतंत्र ऐसा सौदा स्वीकार नहीं कर सकता।
तर्क 5: इंदिरा गांधी ने स्वयं चुनाव कराया और सत्ता छोड़ी
यह आपातकाल समर्थक पक्ष का सबसे मजबूत लोकतांत्रिक तथ्य है। इंदिरा गांधी चुनाव टाल सकती थीं, लेकिन उन्होंने जनवरी 1977 में चुनाव घोषित किए। पराजय के बाद परिणाम स्वीकार किया और शांतिपूर्ण सत्ता हस्तांतरण हुआ। कई तानाशाही व्यवस्थाओं के विपरीत उन्होंने सेना या पुलिस से परिणाम उलटने की कोशिश नहीं की।
इसका श्रेय उन्हें मिलना चाहिए। यह भी बताता है कि उनकी राजनीति में सत्तावादी और लोकतांत्रिक दोनों प्रवृत्तियां थीं। पर चुनाव कराने का बाद का सही निर्णय पहले की गिरफ्तारियों, सेंसरशिप और जबरदस्ती को मिटाता नहीं। जैसे अपराध स्वीकार करने से सुधार का संकेत मिलता है पर पीड़ित का अनुभव समाप्त नहीं होता, वैसे ही सत्ता लौटाने से सत्ता-दुरुपयोग का इतिहास अप्रासंगिक नहीं होता।
तर्क 6: अतिरेक स्थानीय अधिकारियों ने किए
इंदिरा गांधी ने बाद में कई अतिरेक स्वीकार किए और संकेत दिया कि स्थानीय अधिकारियों या उत्साही कार्यकर्ताओं ने नीति से आगे जाकर गलतियां कीं। बड़े प्रशासन में शीर्ष नेतृत्व प्रत्येक गिरफ्तारी या नसबंदी का आदेश नहीं देता; इसलिए व्यक्तिगत जिम्मेदारी की सीमा पर विचार आवश्यक है।
फिर भी कमान की जिम्मेदारी का सिद्धांत लागू होता है। जब राजनीतिक वातावरण लक्ष्य, भय और दंड को प्रोत्साहित करे; स्वतंत्र प्रेस शिकायत न छाप सके; अदालत बंदी की मदद न करे; और संजय गांधी का प्रभाव शीर्ष संरक्षण से चले—तब अतिरेक केवल स्थानीय दुर्घटना नहीं रहता। नेतृत्व को उस व्यवस्था की जिम्मेदारी लेनी होती है जिसे उसने बनाया, जारी रखा और स्वतंत्र जांच से वंचित किया।