राहुल भट, रजनी बाला और विजय कुमार: 2022
सरकारी कार्यालय, स्कूल और बैंक को हत्या-स्थल बनाने वाली तीन प्रतिनिधि घटनाएं
सरकारी कार्यालय, स्कूल और बैंक को हत्या-स्थल बनाने वाली तीन प्रतिनिधि घटनाएं
वर्ष 2022 में जम्मू-कश्मीर की लक्षित हत्याओं ने एक चिंताजनक मोड़ लिया। आतंकवादियों ने लोगों को उनके घर या सड़क पर ही नहीं, बल्कि सरकारी कार्यालय, विद्यालय और बैंक जैसे कार्यस्थलों के भीतर अथवा प्रवेश द्वार पर निशाना बनाया।
12 मई से 2 जून 2022 के बीच तीन सप्ताह में हुई तीन हत्याएं इस रणनीति की प्रतिनिधि घटनाएं बन गईं:
कश्मीरी पंडित कर्मचारी राहुल भट की तहसील कार्यालय के भीतर हत्या।
सांबा निवासी शिक्षिका रजनी बाला की विद्यालय परिसर में हत्या।
राजस्थान निवासी बैंक प्रबंधक विजय कुमार की बैंक शाखा के भीतर हत्या।
इन तीनों की नियुक्ति और सामाजिक पृष्ठभूमि अलग थी। राहुल भट प्रधानमंत्री पुनर्वास पैकेज के अंतर्गत नियुक्त कश्मीरी पंडित कर्मचारी थे। रजनी बाला जम्मू क्षेत्र के सांबा जिले की नियमित सरकारी शिक्षिका थीं। विजय कुमार राजस्थान से आए बैंक अधिकारी थे। लेकिन आतंकवादी रणनीति में तीनों को “अल्पसंख्यक”, “बाहरी” अथवा सरकारी व्यवस्था का प्रतिनिधि मानकर एक ही कमजोर लक्ष्य-वर्ग में रख दिया गया।
घटनाओं का संक्षिप्त विवरण
तीनों हमलों में पिस्तौल का उपयोग किया गया और हमलावरों ने नजदीक से गोली चलाई। हमले कुछ ही क्षणों में पूरे हुए और शूटर घटनास्थल से भाग निकले।
1. राहुल भट की हत्या—पुनर्वास नीति पर सीधा प्रहार
कौन थे राहुल भट?
लगभग 35-36 वर्षीय राहुल भट मूल रूप से बडगाम के संग्रामपोरा क्षेत्र से संबंधित कश्मीरी पंडित परिवार के सदस्य थे। उनका परिवार 1990 के दशक के आतंकवाद के दौरान विस्थापित हुआ था।
वह प्रधानमंत्री के विशेष रोजगार एवं पुनर्वास पैकेज के अंतर्गत 2010 में जम्मू-कश्मीर के राजस्व विभाग में नियुक्त हुए थे। शुरुआत में उनकी नियुक्ति चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी के रूप में हुई और बाद में उन्हें कनिष्ठ सहायक बनाया गया। वर्ष 2021 में उनका स्थानांतरण बडगाम से चाडूरा तहसील कार्यालय कर दिया गया।
राहुल अपनी पत्नी मीनाक्षी और लगभग सात वर्षीय बेटी के साथ बडगाम की शेखपोरा प्रवासी कॉलोनी में रहते थे। यह कॉलोनी घाटी में वापस आकर काम करने वाले कश्मीरी पंडित कर्मचारियों के लिए विकसित की गई सुरक्षित बस्तियों में से एक थी।
12 मई 2022: कार्यालय में घुसकर हत्या
12 मई की दोपहर दो आतंकवादी चाडूरा तहसील कार्यालय में दाखिल हुए। वे राहुल भट के कक्ष तक पहुंचे और पिस्तौल से नजदीक से गोली मार दी। गंभीर रूप से घायल राहुल को श्रीनगर के एसएमएचएस अस्पताल ले जाया गया, लेकिन उन्हें बचाया नहीं जा सका।
प्रारंभिक पुलिस जांच में दो आतंकवादियों के हमले में शामिल होने की बात कही गई। यह हत्या दिनदहाड़े एक सरकारी कार्यालय के अंदर हुई थी। घटनास्थल के पास पुलिस थाना होने के बावजूद हमलावर भागने में सफल रहे।
राहुल के पिता ने प्रश्न उठाया कि कार्यालय में गोलियां चलने के बाद भी तत्काल प्रतिक्रिया क्यों नहीं हुई। उन्होंने हत्या की परिस्थितियों, सुरक्षा व्यवस्था और संभावित स्थानीय सहायता की निष्पक्ष जांच की मांग की। इंडियन एक्सप्रेस, एनडीटीवी
क्या राहुल की पहचान पहले से कराई गई थी?
हमलावर सीधे राहुल के कक्ष तक पहुंचे। इससे यह आशंका पैदा हुई कि उन्हें कार्यालय की आंतरिक व्यवस्था, राहुल की सीट और उस दिन उनकी उपस्थिति की जानकारी पहले से दी गई थी।
राहुल की पत्नी ने भी प्रश्न उठाया कि हमलावरों को कैसे पता चला कि वह किस कक्ष में बैठते हैं। उन्होंने संभावित अंदरूनी जानकारी या स्थानीय मुखबिरी की जांच की मांग की।
यह आशंका परिस्थितिजन्य रूप से महत्वपूर्ण है, लेकिन सार्वजनिक रूप से उपलब्ध रिकॉर्ड में किसी सहकर्मी अथवा कार्यालय कर्मचारी की भूमिका अंतिम न्यायिक निर्णय से स्थापित नहीं हुई। इसलिए संदेह और प्रमाणित अपराध के बीच अंतर बनाए रखना आवश्यक है।
स्थानांतरण की मांग
राहुल के परिवार और सहकर्मियों के अनुसार उन्होंने चाडूरा से अपेक्षाकृत सुरक्षित स्थान पर स्थानांतरण की मांग की थी। राहुल पहले बडगाम तहसील कार्यालय में कार्यरत थे, लेकिन 2021 में उन्हें चाडूरा भेजा गया।
चाडूरा का क्षेत्र लंबे समय से आतंकवादी गतिविधियों और हिंसा के दृष्टिकोण से संवेदनशील माना जाता था। परिवार का आरोप था कि स्थानांतरण संबंधी अनुरोधों पर समय रहते कार्रवाई नहीं की गई। प्रशासन की ओर से इन सभी आरोपों की पूर्ण सार्वजनिक जांच रिपोर्ट सामने नहीं आई।
किस संगठन ने जिम्मेदारी ली?
“कश्मीर टाइगर्स” नामक छद्म आतंकवादी संगठन ने कथित रूप से राहुल भट की हत्या की जिम्मेदारी ली। संगठन ने भ्रष्टाचार और सरकारी कामकाज से जुड़े आरोप लगाकर हत्या को उचित ठहराने की कोशिश की।
राहुल के पूर्व अधिकारियों और उनके संपर्क में आए स्थानीय लोगों ने इन आरोपों को खारिज किया। उन्हें मेहनती, व्यवहारकुशल और लोगों की सहायता करने वाला कर्मचारी बताया गया। आतंकवादी संगठन द्वारा हत्या के बाद लगाया गया आरोप किसी स्वतंत्र जांच या न्यायिक निष्कर्ष का विकल्प नहीं हो सकता।
पुलिस ने बाद की जांच में हत्या को लश्कर-ए-तैयबा और उसके छद्म संगठन TRF से जुड़े मॉड्यूल से जोड़ा। अगस्त 2022 में बडगाम के वाटरहेल क्षेत्र में हुई मुठभेड़ में लतीफ राथर सहित तीन आतंकवादी मारे गए। जम्मू-कश्मीर पुलिस ने कहा कि लतीफ राथर राहुल भट और कलाकार अमरीन भट की हत्याओं में शामिल था। एनडीटीवी
यह पुलिस का अभियानोत्तर निष्कर्ष था। लतीफ मुठभेड़ में मारा गया, इसलिए उसकी भूमिका का सामान्य आपराधिक मुकदमे के माध्यम से न्यायिक परीक्षण नहीं हो सका।
हत्या के बाद विरोध
राहुल भट की हत्या ने प्रधानमंत्री पैकेज के अंतर्गत घाटी में काम कर रहे कश्मीरी पंडित कर्मचारियों को सड़कों पर ला दिया। शेखपोरा, वेस्सू, मट्टन, बारामूला और अन्य स्थानों की प्रवासी कॉलोनियों में प्रदर्शन हुए।
प्रदर्शनकारियों की प्रमुख मांगें थीं:
सभी अल्पसंख्यक कर्मचारियों को सुरक्षित स्थानों पर भेजा जाए।
घाटी से बाहर अस्थायी स्थानांतरण की अनुमति दी जाए।
आवास और कार्यस्थल दोनों की सुरक्षा सुनिश्चित हो।
राहुल भट की हत्या की स्वतंत्र जांच हो।
कर्मचारियों को जबरन संवेदनशील कार्यालयों में उपस्थित न कराया जाए।
कुछ प्रदर्शनकारियों ने सामूहिक इस्तीफे प्रस्तुत करने अथवा देने की घोषणा की। शेखपोरा में प्रदर्शनकारियों ने श्रीनगर हवाई अड्डे की ओर मार्च करने का प्रयास किया, जिसे पुलिस ने रोका। इस दौरान आंसू गैस के इस्तेमाल की खबरें सामने आईं। इससे सरकार और उसी पुनर्वास योजना के कर्मचारियों के बीच विश्वास का संकट और गहरा गया।
राहुल की हत्या इस दृष्टि से ऐतिहासिक थी कि वह प्रधानमंत्री पैकेज के अंतर्गत लौटे लगभग 3,800-4,000 कश्मीरी पंडित कर्मचारियों में आतंकवादी गोली का शिकार बनने वाले पहले कर्मचारी बताए गए। इससे पूरी पुनर्वास नीति की व्यावहारिक सुरक्षा पर प्रश्नचिह्न लग गया। द प्रोब
2. रजनी बाला की हत्या—स्थानांतरण आदेश आया, लेकिन बहुत देर से
कौन थीं रजनी बाला?
36 वर्षीय रजनी बाला जम्मू क्षेत्र के सांबा जिले की रहने वाली हिंदू शिक्षिका थीं। वह कश्मीरी पंडित प्रवासी नहीं थीं और उनकी नियुक्ति प्रधानमंत्री के कश्मीरी पंडित पुनर्वास पैकेज के अंतर्गत नहीं हुई थी।
रजनी और उनके पति राज कुमार दोनों सरकारी शिक्षक थे। दोनों वर्ष 2009 से कुलगाम जिले के अलग-अलग विद्यालयों में सेवाएं दे रहे थे। लंबे समय तक कश्मीर में काम करने के कारण वे स्थानीय विद्यार्थियों और सहकर्मियों से परिचित थे।
रजनी गोपालपोरा स्थित गवर्नमेंट हाई स्कूल में कार्यरत थीं।
31 मई 2022: स्कूल पहुंचते ही हमला
31 मई की सुबह रजनी के पति राज कुमार उन्हें स्कूल के पास छोड़कर गए। कुछ ही मिनटों बाद आतंकवादी ने विद्यालय परिसर अथवा प्रवेश क्षेत्र में उन्हें नजदीक से गोली मार दी। गोली उनके सिर में लगी। उन्हें अस्पताल ले जाया गया, जहां उनकी मृत्यु हो गई।
राहुल भट की तरह रजनी बाला की हत्या भी कार्यस्थल पर हुई। इसने यह संदेश दिया कि सरकारी परिसर में पहुंच जाने के बाद भी अल्पसंख्यक कर्मचारी सुरक्षित नहीं थे।
हत्या से एक रात पहले मिला था स्थानांतरण
इस मामले का सबसे पीड़ादायक पहलू यह था कि रजनी बाला और उनके पति का सुरक्षित माने जाने वाले क्षेत्र में स्थानांतरण आदेश हत्या से एक रात पहले जारी हुआ था। 31 मई को गोपालपोरा स्कूल में रजनी का अंतिम कार्यदिवस होना था।
राज कुमार के अनुसार उन्होंने लक्षित हत्याओं से पैदा हुई असुरक्षा का हवाला देते हुए कई बार शिक्षा विभाग से स्थानांतरण का अनुरोध किया था। उन्होंने मुख्य शिक्षा अधिकारी और अन्य अधिकारियों से संपर्क किया। लेकिन निर्णय में देरी हुई।
रजनी ने अपने आवेदन में स्पष्ट रूप से भय और असुरक्षा का उल्लेख किया था। पति ने आरोप लगाया कि यदि स्थानांतरण पहले कर दिया गया होता तो शायद उनकी जान बच सकती थी। कुलगाम के शिक्षा अधिकारी ने कुछ आरोपों से असहमति जताते हुए कहा कि छुट्टी से इनकार नहीं किया गया था। इस कारण प्रशासनिक जवाबदेही पर दोनों पक्षों के दावे दर्ज करना आवश्यक है। न्यू इंडियन एक्सप्रेस, द प्रिंट
क्या हमलावरों को उनके अंतिम दिन की जानकारी थी?
रजनी को जिस दिन स्थानांतरण आदेश के बाद पुराने स्कूल से कार्यमुक्त होना था, उसी दिन उनकी हत्या हुई। इससे प्रश्न उठा कि क्या हमलावरों को उनके स्थानांतरण और अंतिम उपस्थिति की सूचना थी।
यह संयोग भी हो सकता था और पहले से की गई निगरानी का परिणाम भी। लेकिन सार्वजनिक जांच रिकॉर्ड में यह निर्णायक रूप से स्थापित नहीं है कि स्थानांतरण आदेश की जानकारी आतंकवादी मॉड्यूल तक पहुंचाई गई थी।
फिर भी हमलावर का सही समय पर स्कूल पहुंचना लक्ष्य की निगरानी और स्थानीय जानकारी की संभावना को मजबूत करता है।
जांच और पुलिस का दावा
16 जून 2022 को कुलगाम के मिशीपोरा क्षेत्र में सुरक्षाबलों के साथ मुठभेड़ में दो आतंकवादी मारे गए। जम्मू-कश्मीर पुलिस के महानिरीक्षक ने कहा कि दोनों रजनी बाला की हत्या में शामिल थे।
इसके बाद नवंबर 2022 में पुलिस की स्पेशल इन्वेस्टिगेशन यूनिट ने इस हत्या और कुलगाम की अन्य आतंकवादी घटनाओं से संबंधित कई स्थानों पर छापे मारे। इससे पता चलता है कि शूटरों की मृत्यु के बाद भी हथियार, सहयोगियों और साजिश के व्यापक नेटवर्क की जांच जारी थी। एनडीटीवी
मुठभेड़ में संदिग्ध शूटरों का मारा जाना तात्कालिक सुरक्षा सफलता थी, लेकिन इससे संभावित मददगारों, हथियार उपलब्ध कराने वालों और लक्ष्य की सूचना देने वालों का प्रश्न स्वतः समाप्त नहीं होता।
सामाजिक प्रभाव
रजनी की हत्या ने जम्मू क्षेत्र से कश्मीर में तैनात अनुसूचित जाति, हिंदू और अन्य अल्पसंख्यक कर्मचारियों में भी भय पैदा कर दिया। इससे पहले सुरक्षा विमर्श मुख्यतः प्रधानमंत्री पैकेज वाले कश्मीरी पंडित कर्मचारियों पर केंद्रित था। रजनी के मामले ने दिखाया कि खतरा केवल पुनर्वास पैकेज तक सीमित नहीं था।
उनके पति को बाद में जम्मू क्षेत्र में स्थानांतरित किया गया। लेकिन यह निर्णय उस प्रशासनिक प्रश्न को अनुत्तरित छोड़ गया कि सुरक्षा का आकलन हत्या से पहले प्रभावी क्यों नहीं हो सका।
3. विजय कुमार की हत्या—बैंक के सीसीटीवी में दर्ज हमला
कौन थे विजय कुमार?
विजय कुमार राजस्थान के हनुमानगढ़ जिले के निवासी युवा बैंक अधिकारी थे। वह कुलगाम जिले के आरेह मोहनपोरा में स्थित इलाकाई देहाती बैंक—Ellaqie Dehati Bank—की शाखा में प्रबंधक के रूप में कार्यरत थे।
उनकी इस शाखा में नियुक्ति हाल ही में हुई थी। परिवार के अनुसार विजय अन्य बैंकिंग परीक्षाओं की तैयारी कर रहे थे, ताकि भविष्य में राजस्थान अथवा किसी अन्य अपेक्षाकृत सुविधाजनक स्थान पर नियुक्ति पा सकें।
परिवार चाहता था कि वह कश्मीर से लौट आएं, लेकिन उनका स्थानांतरण नहीं हुआ था।
2 जून 2022: बैंक में घुसकर गोली
2 जून की सुबह एक पिस्तौलधारी आतंकवादी बैंक शाखा में दाखिल हुआ। सीसीटीवी फुटेज में हमलावर पहले शाखा के अंदर आकर स्थिति और लक्ष्य को देखता दिखाई दिया। वह कुछ देर के लिए बाहर गया और फिर पिस्तौल लेकर वापस आया।
विजय कुमार उस समय बैंक के भीतर थे। हमलावर ने नजदीक से उन पर गोली चलाई और भाग गया। गंभीर रूप से घायल विजय को अस्पताल ले जाया गया, लेकिन उनकी मृत्यु हो गई।
रजनी बाला की हत्या के केवल 48 घंटे के भीतर विजय कुमार को निशाना बनाया गया था। इससे कुलगाम में हिंदू और बाहरी कर्मचारियों की सुरक्षा को लेकर भय कई गुना बढ़ गया। टाइम्स ऑफ इंडिया
सीसीटीवी से क्या पता चला?
सीसीटीवी फुटेज ने हमले की पूर्वनियोजित प्रकृति को उजागर किया:
हमलावर ने पहले बैंक में प्रवेश करके लक्ष्य की मौजूदगी देखी।
वह बाहर लौटा और फिर हथियार के साथ अंदर आया।
उसने विजय कुमार को पहचानकर नजदीक से गोली मारी।
हमलावर का उद्देश्य लूटपाट नहीं था।
बैंक के अन्य कर्मचारियों अथवा नकदी को निशाना नहीं बनाया गया।
इससे स्पष्ट हुआ कि यह सामान्य आपराधिक घटना नहीं, बल्कि व्यक्ति-विशेष की लक्षित हत्या थी।
जिम्मेदारी और संगठनगत संबंध
“कश्मीर फ्रीडम फाइटर्स” नामक छद्म संगठन ने कथित रूप से विजय कुमार की हत्या की जिम्मेदारी ली। दूसरी ओर पुलिस जांच ने इस हमले को लश्कर-ए-तैयबा से जुड़े आतंकवादी मॉड्यूल से जोड़ा।
15 जून 2022 को शोपियां के कांजीउलर क्षेत्र में मुठभेड़ के दौरान जन मोहम्मद लोन और तुफैल गनई नामक दो लश्कर आतंकवादी मारे गए। पुलिस ने कहा कि जन मोहम्मद लोन विजय कुमार की हत्या में शामिल था। एनडीटीवी
यहां भी ऑनलाइन जिम्मेदारी का दावा और पुलिस की जांच दो अलग नामों की ओर संकेत करती है। संभव है कि “कश्मीर फ्रीडम फाइटर्स” पुराने आतंकवादी संगठन द्वारा इस्तेमाल किया गया प्रचारात्मक नाम रहा हो। हालांकि किसी न्यायालय में पूरे कमांड और साजिश नेटवर्क की अंतिम पुष्टि सार्वजनिक रूप से उपलब्ध नहीं है।
तीन हत्याएं—एक समान आतंकवादी रणनीति
तीनों मामले अलग-अलग जिलों और विभागों से संबंधित थे, लेकिन इनमें कई समानताएं थीं।
1. कार्यस्थल को हत्या-स्थल बनाना
राहुल भट सरकारी कार्यालय के भीतर मारे गए। रजनी बाला को स्कूल परिसर में गोली मारी गई। विजय कुमार की हत्या बैंक के अंदर हुई।
इससे आतंकवादी यह संदेश देना चाहते थे कि सरकारी कार्यालय, विद्यालय और बैंक भी सुरक्षित स्थान नहीं हैं।
2. पहचान और दिनचर्या की जानकारी
तीनों पीड़ितों की उपस्थिति और कार्यस्थल पहले से ज्ञात थे। हमलावरों को यह मालूम था कि किस समय और किस स्थान पर लक्ष्य मिलेगा।
इस प्रकार की जानकारी निम्न माध्यमों से मिल सकती थी:
पहले से की गई निगरानी।
सोशल मीडिया अथवा सार्वजनिक कार्यालय रिकॉर्ड।
स्थानीय मुखबिरी।
ओवर ग्राउंड वर्कर नेटवर्क।
कार्यस्थल के आसपास सक्रिय सहायक।
पीड़ित की नियमित यात्रा और समय-सारणी।
लेकिन तीनों मामलों में प्रत्येक संभावित स्थानीय सहयोगी की भूमिका न्यायिक रूप से स्थापित नहीं हुई।
3. पिस्तौल और एकल अथवा छोटा हमला-दस्ता
इन हत्याओं में भारी हथियार या बड़ा आतंकवादी दस्ता इस्तेमाल नहीं हुआ। पिस्तौलधारी व्यक्ति कुछ ही सेकंड में हमला करके निकल गया।
इस पद्धति के लाभ आतंकवादियों के लिए स्पष्ट थे:
हथियार आसानी से छिपाया जा सकता था।
कार्यस्थल में सामान्य व्यक्ति की तरह प्रवेश किया जा सकता था।
गोली चलाने से पहले लक्ष्य की पुष्टि की जा सकती थी।
हमले के बाद भीड़ या संकरी गलियों में भागना आसान था।
बड़ी आतंकवादी तैयारी के बिना व्यापक भय पैदा किया जा सकता था।
4. छद्म संगठन और जिम्मेदारी के दावे
राहुल भट की हत्या के लिए कश्मीर टाइगर्स और विजय कुमार की हत्या के लिए कश्मीर फ्रीडम फाइटर्स जैसे नाम सामने आए। पुलिस ने जांच में इन घटनाओं को लश्कर-ए-तैयबा और TRF के नेटवर्क से जोड़ा।
नए नामों का उपयोग आतंकवादी संगठनों को कई लाभ देता था:
लश्कर या जैश जैसे पाकिस्तान-आधारित संगठनों से दूरी दिखाना।
आतंकवाद को स्थानीय “प्रतिरोध” के रूप में प्रस्तुत करना।
अलग-अलग छोटे संगठनों की मौजूदगी का भ्रम पैदा करना।
अंतरराष्ट्रीय प्रतिबंधों और डिजिटल निगरानी से बचना।
जांच एजेंसियों को कमांड संरचना को लेकर भ्रमित करना।
सुरक्षा और प्रशासनिक विफलताएं
इन मामलों में चार प्रमुख प्रश्न सामने आए।
क्या खतरे का आकलन समय पर हुआ?
राहुल भट के परिवार ने उनके स्थानांतरण की मांग किए जाने का दावा किया। रजनी बाला ने अपने आवेदन में भय और असुरक्षा का उल्लेख किया था। उन्हें स्थानांतरण आदेश हत्या से एक रात पहले मिला।
इससे प्रतीत होता है कि प्रशासन कर्मचारियों की व्यक्तिगत सुरक्षा आशंकाओं को त्वरित खतरा-मूल्यांकन से नहीं जोड़ पाया।
संवेदनशील कर्मचारियों की सूची किसके पास थी?
प्रधानमंत्री पैकेज कर्मचारियों, अल्पसंख्यक शिक्षकों और बाहरी बैंक अधिकारियों की नियुक्ति तथा कार्यस्थल की जानकारी प्रशासनिक रिकॉर्ड में उपलब्ध थी। प्रश्न यह था कि इस जानकारी की सुरक्षा कैसे की जा रही थी।
इन मामलों ने संवेदनशील कर्मचारियों की पोस्टिंग सूची, उपस्थिति रिकॉर्ड और स्थानांतरण आदेशों की गोपनीयता पर पुनर्विचार की आवश्यकता पैदा की।
कार्यस्थलों पर सुरक्षा क्यों नहीं थी?
हर सरकारी कार्यालय, स्कूल और बैंक में स्थायी सशस्त्र सुरक्षा देना संभव नहीं था। फिर भी खतरे की उच्च श्रेणी वाले क्षेत्रों में निम्न व्यवस्थाएं की जा सकती थीं:
प्रवेश नियंत्रण।
सक्रिय सीसीटीवी निगरानी।
आपातकालीन पुलिस संपर्क।
कर्मचारियों के आगमन-प्रस्थान का सुरक्षित प्रबंध।
संवेदनशील पोस्टिंग की नियमित समीक्षा।
स्थानीय पुलिस और विभागीय अधिकारियों के बीच समन्वय।
राहुल भट की हत्या के समय पास में पुलिस थाना होना और फिर भी हमलावरों का बच निकलना विशेष रूप से गंभीर प्रश्न बना।
कार्रवाई हत्या के बाद हुई
राहुल की हत्या के बाद एसआईटी गठित हुई। रजनी की हत्या के बाद शिक्षकों के स्थानांतरण तेज किए गए। विजय कुमार की हत्या के बाद बैंक कर्मचारियों की सुरक्षा की समीक्षा हुई।
लगभग 177 कश्मीरी पंडित शिक्षकों को अपेक्षाकृत सुरक्षित क्षेत्रों में स्थानांतरित किए जाने की खबर सामने आई। लेकिन आलोचना यह रही कि यह कदम खतरे की चेतावनी मिलने पर पहले क्यों नहीं उठाया गया।
कश्मीरी पंडित पुनर्वास नीति पर प्रभाव
राहुल भट की हत्या ने प्रधानमंत्री पैकेज की मूल अवधारणा को चुनौती दी। योजना का उद्देश्य कश्मीरी पंडितों को सरकारी नौकरियों और सुरक्षित आवास के माध्यम से घाटी में वापस बसाना था।
लेकिन कई कर्मचारियों की वास्तविक स्थिति यह थी:
सुरक्षित कॉलोनी से दूर संवेदनशील कार्यालयों में तैनाती।
निजी अथवा असुरक्षित आवास में रहना।
स्थानांतरण पर प्रशासनिक प्रतिबंध।
घाटी से बाहर पोस्टिंग की अनुमति न मिलना।
कार्यस्थल तक असुरक्षित यात्रा।
व्यक्तिगत सुरक्षा की अनुपलब्धता।
राहुल की हत्या के बाद सैकड़ों कर्मचारियों ने विरोध किया और सामूहिक इस्तीफे अथवा घाटी से पलायन की चेतावनी दी। रजनी बाला और विजय कुमार की हत्याओं ने यह भय और गहरा कर दिया।
रिपोर्टों के अनुसार जून 2022 के प्रारंभ तक लगभग 150 हिंदू कर्मचारी घाटी छोड़ चुके थे। करीब 3,800 कश्मीरी पंडित कर्मचारियों की वापसी पर आधारित योजना एक बार फिर असुरक्षा की बहस के केंद्र में आ गई। अल जजीरा
क्या यह केवल हिंदुओं को निशाना बनाने की रणनीति थी?
इन तीनों मामलों में पीड़ित हिंदू थे और उनका चयन धार्मिक अथवा क्षेत्रीय पहचान से जुड़ा दिखाई देता है। लेकिन 2022 की पूरी लक्षित हिंसा में स्थानीय मुस्लिम नागरिक, निर्वाचित प्रतिनिधि, पुलिसकर्मी और प्रवासी मुस्लिम श्रमिक भी मारे गए।
अतः तीन स्तरों पर अंतर करना आवश्यक है:
राहुल, रजनी और विजय की हत्याओं में हिंदू तथा अल्पसंख्यक पहचान स्पष्ट कारक थी।
व्यापक आतंकवादी अभियान में सरकार से जुड़े स्थानीय मुस्लिम भी निशाना बने।
प्रवासी श्रमिकों के मामलों में धार्मिक पहचान के साथ “बाहरी” होने की पहचान भी निर्णायक थी।
इन तीन हत्याओं को सांप्रदायिक लक्ष्य चयन से अलग नहीं किया जा सकता, लेकिन पूरे कश्मीर आतंकवाद को केवल एक श्रेणी में सीमित करना भी अधूरा विश्लेषण होगा।
स्थापित तथ्य, पुलिस के दावे और अनसुलझे प्रश्न
स्थापित तथ्य
राहुल भट की 12 मई को चाडूरा तहसील कार्यालय में हत्या हुई।
वह प्रधानमंत्री पैकेज के अंतर्गत नियुक्त कश्मीरी पंडित कर्मचारी थे।
रजनी बाला की 31 मई को गोपालपोरा स्कूल में हत्या हुई।
उन्हें सुरक्षित स्थान पर भेजने का आदेश हत्या से एक रात पहले जारी हुआ था।
विजय कुमार की 2 जून को बैंक शाखा के अंदर हत्या हुई।
उनका हमला सीसीटीवी में दर्ज हुआ।
तीनों मामलों में छोटे हथियार और नजदीक से गोलीबारी की पद्धति अपनाई गई।
हत्याओं के बाद अल्पसंख्यक कर्मचारियों ने स्थानांतरण और सुरक्षा की मांग को लेकर व्यापक विरोध किया।
पुलिस और सुरक्षा एजेंसियों के दावे
राहुल भट की हत्या में लश्कर/TRF का लतीफ राथर शामिल था।
रजनी बाला की हत्या में शामिल दो आतंकवादी 16 जून को कुलगाम में मारे गए।
विजय कुमार की हत्या में लश्कर का जन मोहम्मद लोन शामिल था।
लोन 15 जून को शोपियां में मारा गया।
छद्म नामों से काम कर रहे संगठन पुराने पाकिस्तान-समर्थित आतंकवादी ढांचे से जुड़े थे।
अनसुलझे प्रश्न
- हमलावरों को पीड़ितों की सटीक सीट, समय और उपस्थिति की सूचना किसने दी?
- स्थानांतरण की मांगों पर समय रहते कार्रवाई क्यों नहीं हुई?
- क्या संवेदनशील कर्मचारियों की सूची आतंकवादी नेटवर्क तक पहुंची थी?
- शूटरों के अतिरिक्त हथियार और सूचना उपलब्ध कराने वालों पर क्या अंतिम कार्रवाई हुई?
- गठित एसआईटी की पूर्ण रिपोर्ट सार्वजनिक क्यों नहीं की गई?
- मुठभेड़ों में संदिग्धों के मारे जाने के बाद आपराधिक साजिश का न्यायिक परीक्षण किस स्तर तक पहुंचा?
- पुनर्वास योजना में नौकरी देने के साथ सुरक्षित कार्यस्थल की गारंटी क्यों नहीं जुड़ी थी?
निष्कर्ष
राहुल भट, रजनी बाला और विजय कुमार की हत्याएं केवल तीन व्यक्तियों की हत्या नहीं थीं। ये तीन अलग सरकारी और आर्थिक संस्थानों—राजस्व कार्यालय, शिक्षा व्यवस्था और बैंकिंग तंत्र—पर मनोवैज्ञानिक हमले थे।
राहुल भट को मारकर कश्मीरी पंडितों की वापसी और पुनर्वास नीति को चुनौती दी गई। रजनी बाला की हत्या ने जम्मू से कश्मीर में तैनात हिंदू कर्मचारियों को संदेश दिया कि लंबे समय से स्थानीय समाज में काम करने के बाद भी वे सुरक्षित नहीं हैं। विजय कुमार की हत्या ने देश के दूसरे राज्यों से कश्मीर में काम करने वाले अधिकारियों और बैंक कर्मचारियों में भय पैदा किया।
इन घटनाओं में आतंकवादी रणनीति की सफलता मृतकों की संख्या में नहीं, बल्कि उससे पैदा हुए व्यापक प्रभाव में मापी जानी चाहिए। तीन हत्याओं के बाद हजारों कर्मचारियों ने कार्यालय जाना बंद किया, सैकड़ों ने घाटी छोड़ने पर विचार किया और सरकार को बड़े पैमाने पर स्थानांतरण तथा सुरक्षा समीक्षा करनी पड़ी।
यही लक्षित आतंकवाद का मूल उद्देश्य था—बहुत कम शूटर, छोटे हथियार और कुछ मिनटों की वारदात के माध्यम से पूरे प्रशासनिक तंत्र तथा समुदाय के व्यवहार को प्रभावित करना।
इन मामलों से सबसे बड़ी सीख यह है कि पुनर्वास केवल नियुक्ति पत्र और आवास निर्माण से पूरा नहीं होता। वास्तविक पुनर्वास के लिए सुरक्षित कार्यस्थल, संवेदनशील पोस्टिंग की निरंतर समीक्षा, गोपनीय कर्मचारी डेटा, प्रभावी स्थानीय खुफिया तंत्र और खतरे की शिकायत पर तत्काल कार्रवाई आवश्यक है। अन्यथा सरकारी नौकरी स्वयं कर्मचारी की पहचान उजागर करने और उसे आतंकवादी निशाना बनाने का माध्यम बन सकती है।