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दस्तावेज़ · तथ्य · विश्लेषण
OCN Research Dossier–011 · अध्याय 03

पलायन के बाद का आतंक

संग्रामपोरा, वंधामा, नादिमार्ग और घाटी में बचे पंडित

Omkar Chaudhary / OCN Research Deskप्रथम संस्करण · 1 अगस्त 2026

संग्रामपोरा, वंधामा, नादिमार्ग और घाटी में बचे पंडित

3.1 प्रस्तावना

1990 में कश्मीरी पंडितों के बड़े पैमाने पर पलायन के बाद यह धारणा बनी कि आतंकियों का उद्देश्य पूरा हो चुका है और घाटी में रह गए गिने-चुने पंडित परिवार संभवतः सुरक्षित रहेंगे। कुछ परिवारों ने अपने मुस्लिम पड़ोसियों पर विश्वास, पुश्तैनी घर और भूमि से लगाव, आर्थिक विवशता, सरकारी नौकरी अथवा कुछ महीनों में सामान्य स्थिति लौट आने की आशा में घाटी नहीं छोड़ी।

लेकिन 1997 का संग्रामपोरा, 1998 का वंधामा और 2003 का नादिमार्ग नरसंहार इस धारणा को तोड़ देते हैं। इन घटनाओं में किसी प्रभावशाली नेता या सरकारी कर्मचारी के बजाय गांवों में रह रहे सामान्य पंडित परिवारों को सामूहिक रूप से निशाना बनाया गया।

इन तीन हमलों में प्रचलित और पुलिस-आधारित आंकड़ों के अनुसार कुल 54 कश्मीरी पंडित मारे गए—

संग्रामपोरा के संबंध में कुछ बाद की स्मृति-सूचियों में आठ नाम दिए गए हैं। अधिकांश समकालीन और पुलिस-आधारित अभिलेख सात मृतकों का उल्लेख करते हैं। अंतिम नामवार डेटाबेस में FIR, मृत्यु प्रमाणपत्र और पुलिस रिकॉर्ड के आधार पर इस अंतर का समाधान आवश्यक होगा।

इन घटनाओं ने केवल 54 लोगों की जान नहीं ली। प्रत्येक हत्याकांड के बाद आसपास के पंडित परिवारों का नया पलायन हुआ और विस्थापित समुदाय की वापसी की संभावना कमजोर हुई।

3.2 पलायन के बाद घाटी में कौन लोग रह गए?

1990 में सभी कश्मीरी पंडितों ने घाटी नहीं छोड़ी थी। जो परिवार रह गए, उनके कारण अलग-अलग थे।

पुश्तैनी भूमि से लगाव

ग्रामीण पंडित परिवारों के पास खेत, बाग, मकान और मंदिरों से जुड़ी जिम्मेदारियां थीं। इनमें से कई परिवार पीढ़ियों से एक ही गांव में रहते थे। उनके लिए विस्थापन केवल घर बदलना नहीं, जीवन-व्यवस्था का पूर्ण अंत था।

मुस्लिम पड़ोसियों पर भरोसा

कई गांवों में पंडित और मुस्लिम परिवारों के बीच पुराने सामाजिक संबंध थे। पंडित परिवारों को विश्वास था कि उनके पड़ोसी उन्हें नुकसान नहीं होने देंगे। अनेक मुस्लिम परिवारों ने वास्तव में उनकी रक्षा की, संपत्ति संभाली और संकट में सहायता भी की।

लेकिन पड़ोसियों की सद्भावना हथियारबंद आतंकियों के सामने हमेशा पर्याप्त सुरक्षा नहीं बन सकी।

आर्थिक विवशता

सभी परिवारों के पास जम्मू अथवा दिल्ली जाकर रहने के संसाधन नहीं थे। शहरों में नौकरी करने वाले शिक्षित परिवार अपेक्षाकृत जल्दी बाहर निकल सके, लेकिन खेती, स्थानीय दुकान अथवा दैनिक आय पर निर्भर ग्रामीण परिवारों के लिए पलायन कठिन था।

परिस्थितियां सामान्य होने की आशा

बहुत से लोगों को लगता था कि आतंकवाद कुछ महीनों अथवा एक-दो वर्ष में नियंत्रित हो जाएगा। इस उम्मीद ने कुछ परिवारों को घाटी में रोके रखा।

सरकारी सुरक्षा पर विश्वास

कुछ गांवों में पुलिस चौकी, सुरक्षा पिकेट अथवा Village Defence व्यवस्था उपलब्ध कराई गई। परिवारों ने माना कि प्रशासन उनकी रक्षा करेगा। नादिमार्ग की घटना ने इस विश्वास को सबसे गंभीर झटका दिया।

3.3 आतंक की रणनीति में बदलाव

1989–90 की शुरुआती हत्याओं में न्यायाधीश, राजनीतिक नेता, अधिकारी, अधिवक्ता और प्रसारणकर्मी प्रमुख लक्ष्य थे। 1997 के बाद रणनीति बदलती दिखाई दी।

अब उद्देश्य था—

घाटी में बची अल्पसंख्यक बस्तियों को खाली कराना।

विस्थापित पंडितों की प्रस्तावित वापसी रोकना।

सरकार के “सामान्य स्थिति” के दावे को चुनौती देना।

एक ही हमले में अधिक लोगों को मारकर राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय ध्यान आकर्षित करना।

हिंदू-मुस्लिम तनाव बढ़ाना।

सुरक्षा बलों को व्यापक जवाबी कार्रवाई के लिए उकसाना।

आतंकियों की घटती राजनीतिक पकड़ की भरपाई भय से करना।

इन हमलों में कुछ समान परिचालन विशेषताएं थीं—

रात का समय।

दूरस्थ अथवा अर्ध-ग्रामीण बस्ती।

अल्पसंख्यक परिवारों के घरों की पूर्व जानकारी।

सैन्य या पुलिस वर्दी का इस्तेमाल।

परिवारों को एकत्र करके गोलीबारी।

महिलाओं और बच्चों को भी न छोड़ना।

हमले के बाद जंगल अथवा ग्रामीण मार्ग से भागना।

स्थानीय सुरक्षा व्यवस्था को निष्क्रिय करना या उसकी अनुपस्थिति का लाभ उठाना।

3.4 संग्रामपोरा नरसंहार—21 मार्च 1997

स्थान और पृष्ठभूमि

संग्रामपोरा बडगाम जिले के बीरवाह क्षेत्र का गांव है। 1990 के पलायन के बाद भी कुछ कश्मीरी पंडित परिवार यहां रहते थे। वे मुख्यतः स्थानीय कृषि, सरकारी सेवा और गांव के पुराने सामाजिक संबंधों से जुड़े थे।

घटना नवरेह अथवा नवरोज से जुड़ी अवधि में हुई। 21 मार्च 1997 की रात हथियारबंद लोग गांव में पहुंचे। उपलब्ध विवरणों के अनुसार हमलावरों के पास कुछ पंडित पुरुषों के नामों की जानकारी थी। उन्हें घरों से बाहर बुलाया गया अथवा एक स्थान पर एकत्र किया गया और गोली मार दी गई।

अधिकांश पुलिस एवं समकालीन समाचार अभिलेखों में सात कश्मीरी पंडितों की मृत्यु दर्ज है। कुछ लोग घायल भी हुए, लेकिन घायलों की एक समान प्रमाणित संख्या उपलब्ध नहीं है।

पीड़ितों के नामों में अंतर

बाद की विभिन्न स्मृति-सूचियों में निम्न नाम मिलते हैं—

संजय भट

विजय भट

प्यारे लाल

त्रिलोकीनाथ भट

भूषण लाल

अवतार कृष्ण पंडित

अशोक कुमार पंडित

दिलीप भट

समस्या यह है कि अधिकांश पुराने समाचार और पुलिस-आधारित विवरण सात मृतकों का उल्लेख करते हैं, जबकि कुछ बाद की सूचियां आठ नाम देती हैं। संभव है कि किसी घायल व्यक्ति की बाद में मृत्यु हुई हो, नाम दोहराया गया हो अथवा घटना की सीमा में किसी अन्य हत्या को भी जोड़ दिया गया हो। जब तक मूल FIR और मृत्यु-अभिलेख उपलब्ध न हों, सात को प्रमाणित न्यूनतम और आठ को सत्यापनाधीन संख्या माना जाना चाहिए।

हमलावर कौन थे?

हमला आतंकियों द्वारा किया गया माना गया, लेकिन जांच निर्णायक निष्कर्ष तक नहीं पहुंची। कुछ बाद की रिपोर्टों ने हिजबुल मुजाहिदीन की भूमिका बताई, परंतु उपलब्ध पुलिस रिकॉर्ड में अपराधियों की अंतिम न्यायिक पहचान स्थापित नहीं हो सकी।

पुलिस ने अंततः मामले को untraced के रूप में बंद कर दिया। इसका अर्थ अपराध का न होना नहीं, बल्कि जांच एजेंसी द्वारा अभियोजन योग्य आरोपियों की पहचान और पर्याप्त साक्ष्य जुटाने में विफलता है।

स्थानीय प्रतिक्रिया

हमले के बाद आसपास के मुस्लिम ग्रामीणों ने हत्याओं का विरोध किया। कुछ स्थानीय लोगों ने अंतिम संस्कार और पीड़ित परिवारों की सहायता में भाग लिया। क्षेत्र में आंशिक बंद भी देखा गया।

यह प्रतिक्रिया दो समानांतर वास्तविकताओं को सामने रखती है—

आतंकियों को लक्ष्य, घर और स्थानीय भूगोल की जानकारी थी।

व्यापक स्थानीय समाज का एक हिस्सा हत्या के विरोध में खड़ा हुआ।

इसलिए किसी संभावित स्थानीय आतंकी सहयोग और पूरे गांव अथवा समुदाय की भूमिका को एक नहीं माना जा सकता।

रणनीतिक प्रभाव

संग्रामपोरा की हत्या का सबसे बड़ा प्रभाव आसपास के पंडित परिवारों पर पड़ा। जो लोग सात वर्ष तक आतंकवाद के बीच टिके रहे थे, उन्हें लगा कि अब उनका गांव और पुराने सामाजिक संबंध भी सुरक्षा की गारंटी नहीं रहे।

यह घटना 1990 के बाद घाटी में बची पंडित आबादी पर पहला बड़ा सामूहिक हमला थी। इसने आने वाले वंधामा और नादिमार्ग हत्याकांडों की आशंका को वास्तविक बना दिया।

3.5 वंधामा नरसंहार—25 जनवरी 1998

गांव और समय का चयन

वंधामा मध्य कश्मीर के गांदरबल जिले में स्थित गांव है। हमला 25 जनवरी 1998 की रात, गणतंत्र दिवस से ठीक पहले हुआ। इस समय का चयन राजनीतिक और प्रचार की दृष्टि से महत्वपूर्ण था। अगले दिन राष्ट्रीय उत्सव होने के कारण घटना का संदेश पूरे देश तक पहुंचना निश्चित था।

हमला रमजान की एक महत्वपूर्ण धार्मिक रात के आसपास हुआ, जब गांवों में लोगों के देर तक जागने और आवाजाही की संभावना रहती थी।

हमले का पुनर्निर्माण

जीवित बचे विनोद कुमार धर के विवरण सहित विभिन्न समकालीन रिपोर्टों के अनुसार—

हथियारबंद लोग भारतीय सेना जैसी वर्दी में आए।

उन्होंने स्वयं को सुरक्षा बलों से संबंधित बताया अथवा ऐसा आभास पैदा किया।

कुछ घरों में बातचीत की और चाय भी पी।

इस दौरान गांव के पंडित परिवारों को चिह्नित और एकत्र किया गया।

उसके बाद AK-47 जैसे स्वचालित हथियारों से गोलीबारी की गई।

कुल 23 कश्मीरी पंडित मारे गए।

मृतकों में नौ महिलाएं और चार बच्चे बताए गए।

विनोद कुमार धर उस समय किशोर थे और अपने परिवार के अकेले जीवित बचे सदस्य बने। वंधामा के जीवित बचे परिवार का विवरण

वर्दी का इस्तेमाल क्यों?

सैन्य वर्दी का उपयोग आतंकियों की एक सोची-समझी रणनीति था—

ग्रामीणों का तत्काल विश्वास हासिल करना।

घरों के दरवाजे खुलवाना।

सुरक्षा जांच का भ्रम पैदा करना।

ग्रामीणों को बिना प्रतिरोध एकत्र करना।

वास्तविक सुरक्षा बलों पर संदेह उत्पन्न करना।

घटना के बाद जिम्मेदारी को लेकर भ्रम पैदा करना।

इस प्रकार की रणनीति बाद में नादिमार्ग में भी सामने आई।

जिम्मेदारी का प्रश्न

अमेरिकी विदेश विभाग की समकालीन प्रतिक्रिया में हमलावरों को अज्ञात आतंकवादी कहा गया था और 23 पंडितों की हत्या की निंदा की गई। अमेरिकी विदेश विभाग का अभिलेख

बाद की भारतीय सुरक्षा रिपोर्टों और समाचार विश्लेषणों में दो प्रमुख संभावनाएं सामने आईं—

लश्कर-ए-तैयबा से जुड़ा मॉड्यूल।

हिजबुल मुजाहिदीन कमांडर अब्दुल हमीद भट उर्फ हामिद गाडा का समूह।

हामिद गाडा मार्च 2000 में सुरक्षा बलों के साथ मुठभेड़ में मारा गया। सुरक्षा एजेंसियों ने उसे वंधामा सहित कई नागरिक हत्याओं से जोड़ा, लेकिन वंधामा मामले में कोई पूर्ण आपराधिक मुकदमा और अंतिम दोषसिद्धि सामने नहीं आई।

जांच पर प्रश्न

कश्मीरी पंडित संगठनों का आरोप रहा कि—

घटना की वैज्ञानिक जांच नहीं हुई।

हमलावरों की पहचान निर्णायक रूप से स्थापित नहीं की गई।

संदिग्धों के मुठभेड़ में मारे जाने को मामले का समाधान मान लिया गया।

स्थानीय सहायता और रेकी की जांच अधूरी रही।

मृतकों के परिवारों को न्यायिक प्रगति की जानकारी नहीं दी गई।

2017 तक उपलब्ध अभिलेखों में कोई व्यक्ति इस अपराध के लिए दंडित नहीं हुआ था। वंधामा जांच पर पीड़ित पक्ष की आपत्ति

राजनीतिक प्रभाव

तत्कालीन प्रधानमंत्री इंद्र कुमार गुजराल, राज्यपाल के.वी. कृष्ण राव और मुख्यमंत्री फारूक अब्दुल्ला सहित वरिष्ठ नेताओं ने गांव का दौरा किया। दिल्ली और जम्मू के विस्थापित शिविरों में विरोध प्रदर्शन हुए।

सबसे गंभीर प्रभाव वापसी नीति पर पड़ा। सरकार घाटी में पंडितों की वापसी की संभावना पर चर्चा कर रही थी। वंधामा ने संदेश दिया कि गांव लौटने वाले अथवा अभी तक गांव में रह रहे परिवार सामूहिक रूप से निशाना बनाए जा सकते हैं। समकालीन विश्लेषण ने इसे वापसी की उम्मीद को ध्वस्त करने वाला हमला माना था। इंडिया टुडे का फरवरी 1998 का अभिलेख

3.6 नादिमार्ग नरसंहार—23 मार्च 2003

स्थान और पंडित परिवार

नादिमार्ग उस समय पुलवामा जिले के शोपियां उपक्षेत्र में था। बाद में शोपियां अलग जिला बना। यह गांव सेब के बागों और कृषि क्षेत्र के बीच स्थित है।

आतंकवाद से पहले यहां लगभग 40 पंडित परिवार रहते थे। 1990 के बाद अधिकांश चले गए, लेकिन 11 परिवारों के 52 सदस्य गांव में बने रहे। वे अपने मुस्लिम पड़ोसियों के साथ वर्षों से रह रहे थे और उन्हें विश्वास था कि अब परिस्थितियां अपेक्षाकृत बेहतर हो रही हैं।

हमला

23 मार्च 2003 को लगभग रात 11 बजे सैन्य वर्दी पहने आठ से दस हथियारबंद व्यक्ति गांव में पहुंचे।

उपलब्ध प्रत्यक्षदर्शी और पुलिस विवरण के अनुसार—

हमलावरों ने पहले पंडित बस्ती को घेरा।

गांव की सुरक्षा में लगाए गए पुलिसकर्मियों को निष्क्रिय अथवा निहत्था किया गया।

पंडित परिवारों को घरों से बाहर निकाला गया।

उन्हें एक स्थान पर पंक्ति में खड़ा किया गया।

निकट दूरी से स्वचालित हथियारों से गोलीबारी की गई।

कुल 24 लोग मारे गए।

मृतकों में—

11 पुरुष

11 महिलाएं

दो बच्चे

शामिल थे। जीवित बचे चुन्नी लाल के पैर में गोली लगी थी। 28 अन्य बचे लोगों को हमले के बाद जम्मू स्थानांतरित कर दिया गया। नादिमार्ग की समकालीन रिपोर्ट

सुरक्षा पिकेट की विफलता

नादिमार्ग में अल्पसंख्यक परिवारों की सुरक्षा के लिए पुलिसकर्मी तैनात थे। फिर भी हमला लगभग निर्बाध रूप से हुआ।

प्रारंभिक पुलिस पक्ष था कि आतंकियों ने सुरक्षाकर्मियों को निहत्था कर उनके हथियार छीन लिए। जांच में सात पुलिसकर्मियों पर अपने कर्तव्य का पालन न करने से संबंधित आरोप लगाए गए।

यह मामला कई प्रश्न उठाता है—

क्या सुरक्षा पिकेट पर पर्याप्त कर्मी और हथियार थे?

क्या हमलावरों को तैनाती और ड्यूटी की जानकारी थी?

पुलिसकर्मी बिना प्रभावी प्रतिरोध के कैसे निष्क्रिय हुए?

क्या आतंकियों ने पुलिस वर्दी और स्थानीय बोली का इस्तेमाल किया?

गांव तक पहुंचने और भागने के मार्ग की पहले से रेकी हुई थी?

स्थानीय स्तर पर किसी व्यक्ति ने जानकारी उपलब्ध कराई थी?

इनमें से सभी प्रश्नों का अंतिम न्यायिक समाधान नहीं हुआ।

3.7 नादिमार्ग का आरोपी नेटवर्क

पुलिस जांच में पाकिस्तानी आतंकी जिया मुस्तफा को हमले का प्रमुख आरोपी बताया गया। उसे घटना के करीब एक महीने बाद गिरफ्तार किया गया था। पुलिस का आरोप था कि वह लश्कर-ए-तैयबा से जुड़ा था और अन्य आतंकियों के साथ हमले में शामिल था।

जांच के बाद—

जिया मुस्तफा सहित आतंकियों के विरुद्ध आरोप लगाए गए।

सात पुलिसकर्मी भी कर्तव्य में विफलता के आरोप में मुकदमे का हिस्सा बने।

मामला पहले पुलवामा और बाद में शोपियां की अदालत में चला।

अभियोजन ने कुल अनेक गवाहों को सूचीबद्ध किया।

13 गवाहों के बयान दर्ज हुए।

25 महत्वपूर्ण गवाह सुरक्षा भय के कारण शोपियां आकर बयान देने को तैयार नहीं हुए।

यहीं से मुकदमा लगभग ठहर गया।

3.8 नादिमार्ग मुकदमे का बंद होना और पुनः खुलना

नादिमार्ग मामले की न्यायिक यात्रा स्वयं इस शोध का महत्वपूर्ण हिस्सा है। गवाहों के विस्थापन, सुरक्षा संबंधी भय और लंबी प्रक्रियात्मक देरी के कारण अभियोजन आगे नहीं बढ़ सका। नीचे मुकदमे के बंद होने और बाद में उच्च न्यायालय के हस्तक्षेप से दोबारा खुलने का क्रम दिया गया है।

2011 में अभियोजन साक्ष्य बंद

अधिकांश प्रत्यक्षदर्शी जम्मू के पुरखू, मुठी और मिश्रीवाला शिविरों में रह रहे थे। अभियोजन ने मांग की कि उनके बयान commission अथवा किसी वैकल्पिक माध्यम से दर्ज किए जाएं।

9 फरवरी 2011 को शोपियां के सत्र न्यायालय ने यह मांग अस्वीकार कर अभियोजन साक्ष्य बंद कर दिया। इसका अर्थ यह था कि प्रमुख विस्थापित गवाहों की गवाही के बिना मुकदमा आगे बढ़ेगा अथवा निष्प्रभावी हो जाएगा।

2022 में उच्च न्यायालय का हस्तक्षेप

विस्थापित और भयभीत गवाहों की कठिनाई को समझना आवश्यक था।

आपराधिक मुकदमे का उद्देश्य केवल प्रक्रिया पूरी करना नहीं, सत्य तक पहुंचना है।

गवाहों का बयान commission अथवा वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग से लिया जा सकता है।

पुराने मामले की आयु अपने आप साक्ष्य रोकने का कारण नहीं हो सकती।

निचली अदालत को सभी आवश्यक गवाहों की गवाही सुनिश्चित करनी चाहिए।

जिया मुस्तफा की मृत्यु

मुकदमा पुनः खुलने से पहले मुख्य आरोपी जिया मुस्तफा की 24 अक्टूबर 2021 को पुंछ के जंगल में एक अभियान के दौरान मृत्यु हो गई। सुरक्षा बल उसे एक आतंकी ठिकाने की पहचान कराने ले गए थे। पुलिस के अनुसार छिपे आतंकियों की गोलीबारी में वह मारा गया।

3.9 तीनों घटनाओं में समान पैटर्न

इन हमलों का संयुक्त संदेश था: घाटी में पंडितों की छोटी, शांत और राजनीतिक रूप से निष्क्रिय बस्ती भी सुरक्षित नहीं है।

3.10 घाटी में बचे पंडितों की संख्या

जम्मू-कश्मीर सरकार के 2010 के आंकड़ों के अनुसार घाटी में—

808 गैर-प्रवासी पंडित परिवार

कुल लगभग 3,445 व्यक्ति

रह रहे थे।

कश्मीरी पंडित संघर्ष समिति—KPSS ने भी 2008 के आसपास 808 परिवारों का सर्वेक्षण किया था। मार्च 2025 में संगठन ने दावा किया कि गैर-प्रवासी पंडित परिवारों की संख्या घटकर 650 से कम रह गई है। KPSS का नवीनतम उपलब्ध दावा

दूसरी ओर कुछ नवीन अध्ययनों में घाटी में रहने वाले पंडितों की संख्या लगभग 6,500 बताई गई है। इस अंतर का कारण है कि अलग-अलग गणनाओं में निम्न समूहों को जोड़ा या अलग किया जाता है—

1990 में कभी पलायन न करने वाले मूल निवासी।

कुछ समय बाहर रहने के बाद लौटे परिवार।

प्रधानमंत्री रोजगार पैकेज के अंतर्गत घाटी में नियुक्त कर्मचारी।

सुरक्षा कॉलोनियों अथवा transit accommodation में रहने वाले कर्मचारी।

परिवार घाटी में, लेकिन सदस्य नौकरी या शिक्षा के लिए बाहर।

मिश्रित परिवार अथवा अन्य कश्मीरी हिंदू समुदाय।

इस शोध में “गैर-प्रवासी पंडित”, “लौटा हुआ प्रवासी” और “PM Package कर्मचारी”—तीनों अलग श्रेणियां होंगी।

3.11 घाटी में बचे परिवारों की वास्तविक चुनौतियां

आर्थिक और रोजगार संबंधी कठिनाई

गैर-प्रवासी परिवारों का आरोप रहा है कि राहत और पुनर्वास नीतियों का अधिकांश भाग घाटी छोड़ चुके पंजीकृत प्रवासियों पर केंद्रित रहा। जो लोग घाटी में टिके रहे, उन्हें कई योजनाओं में समान लाभ नहीं मिला।

सुरक्षा का असमान ढांचा

कुछ प्रमुख परिवारों और मंदिरों को सुरक्षा मिली, लेकिन सभी गांवों तथा कामकाजी व्यक्तियों को व्यक्तिगत सुरक्षा देना संभव नहीं था। सुरक्षा पिकेट भी हमेशा प्रभावी सिद्ध नहीं हुए—नादिमार्ग इसका सबसे गंभीर उदाहरण है।

विवाह और जनसांख्यिकीय संकट

समुदाय की संख्या बहुत कम होने के कारण युवाओं के विवाह, शिक्षा और रोजगार के अवसर सीमित हुए। विवाह के बाद अनेक महिलाएं और परिवार घाटी से बाहर चले गए। इससे गैर-प्रवासी आबादी लगातार घटती गई।

धार्मिक और सांस्कृतिक संस्थाओं का संरक्षण

कई मंदिर, श्मशान भूमि, सामुदायिक भवन और त्यौहार बहुत कम परिवारों के भरोसे रह गए। समुदाय के घटने से नियमित पूजा, संपत्ति प्रबंधन और सांस्कृतिक परंपराओं की निरंतरता कठिन हुई।

राजनीतिक प्रतिनिधित्व

कम संख्या और अलग भौगोलिक बिखराव के कारण गैर-प्रवासी पंडितों की राजनीतिक आवाज सीमित रही। विस्थापित समुदाय और घाटी में रह गए परिवारों की आवश्यकताएं भी हमेशा समान नहीं रहीं।

दोहरी असुरक्षा

घाटी में रह गए पंडितों को कई बार दो विपरीत संदेहों का सामना करना पड़ा—

आतंकियों की दृष्टि में भारत समर्थक अथवा सुरक्षा एजेंसियों का सहयोगी होने का संदेह।

विस्थापित समुदाय के कुछ हिस्सों की दृष्टि में घाटी में बने रहने के कारण अलग अनुभव।

वास्तव में उनका निर्णय प्रायः राजनीतिक नहीं, बल्कि भूमि, आजीविका, संबंध और परिस्थितियों से जुड़ा था।

3.12 क्या स्थानीय मुसलमानों ने सहायता की?

संग्रामपोरा, वंधामा और नादिमार्ग के बाद अनेक स्थानीय मुसलमानों ने हत्याओं की निंदा की, अंतिम संस्कार में हिस्सा लिया और जीवित बचे परिवारों की सहायता की। नादिमार्ग के मुस्लिम ग्रामीणों ने दोनों समुदायों के पुराने संबंधों को याद करते हुए घटना को अपने गांव की साझा त्रासदी बताया।

इसके बावजूद यह प्रश्न बना रहता है कि हमलावरों को—

पंडित घरों की सटीक पहचान,

परिवारों की संख्या,

गांव की गलियां,

सुरक्षा पिकेट की स्थिति,

आने-जाने के मार्ग

कैसे मालूम हुए।

स्थानीय जानकारी प्राप्त होने की संभावना की जांच आवश्यक है, लेकिन अपराध सिद्ध हुए बिना किसी पूरे गांव पर सहयोग का आरोप नहीं लगाया जा सकता। आतंकी रेकी स्वयं कर सकते थे, पुराने स्थानीय आतंकियों से जानकारी मिल सकती थी अथवा भय के कारण किसी व्यक्ति को सूचना देने पर विवश किया गया हो सकता है।

OCN Research में स्थानीय सहायता के केवल तीन स्तर मान्य होंगे—

जांचाधीन अथवा अपुष्ट आरोप।

3.13 क्या ये हमले वापसी रोकने की साजिश थे?

घटनाओं का समय और लक्ष्य इस विश्लेषण को मजबूत करते हैं।

संग्रामपोरा उस समय हुआ जब लोकतांत्रिक सरकार लौट चुकी थी और सामान्य स्थिति स्थापित करने का दावा किया जा रहा था।

वंधामा के समय पंडितों की संभावित वापसी पर चर्चा बढ़ रही थी।

नादिमार्ग से पहले नई राज्य सरकार “healing touch” और विस्थापित पंडितों की वापसी की बात कर रही थी।

तीनों हमलों में वे परिवार निशाना बने जिन्होंने आतंकवाद के बावजूद घाटी नहीं छोड़ी था।

इस आधार पर यह एक मजबूत विश्लेषणात्मक निष्कर्ष है कि आतंकियों का उद्देश्य केवल तत्काल हत्या नहीं, बल्कि वापसी की सरकारी नीति और सामुदायिक विश्वास को विफल करना भी था।

हालांकि प्रत्येक मामले में इस उद्देश्य का कोई एक लिखित आतंकी आदेश उपलब्ध नहीं है। इसलिए इसे “घटनाओं से निकलता रणनीतिक निष्कर्ष” कहा जाएगा, अंतिम न्यायिक तथ्य नहीं।

3.14 2003 के बाद नई लक्षित हत्याएं

नादिमार्ग के बाद लंबे समय तक पंडितों के किसी पूरे गांव पर वैसा सामूहिक हमला नहीं हुआ। लेकिन इसका अर्थ खतरे का अंत नहीं था।

बाद के प्रमुख मामले रहे—

31 दिसंबर 2020: श्रीनगर में कारोबारी सतपाल निश्चल।

5 अक्टूबर 2021: श्रीनगर में दवा कारोबारी माखन लाल बिंदरू।

12 मई 2022: बडगाम में सरकारी कर्मचारी राहुल भट।

16 अगस्त 2022: शोपियां में सुनील कुमार भट।

15 अक्टूबर 2022: शोपियां में पूरन कृष्ण भट।

इन हत्याओं से सामूहिक नरसंहार के स्थान पर फिर व्यक्तिगत टारगेट किलिंग की रणनीति दिखाई दी। नई नीति में ग्रामीण पंडित परिवारों के साथ PM Package के अंतर्गत लौटे कर्मचारियों को भी निशाना बनाया गया।

3.15 न्यायिक विफलता का व्यापक अर्थ

तीनों नरसंहारों की जांच का परिणाम गंभीर प्रश्न खड़े करता है—

संग्रामपोरा—मामला untraced।

वंधामा—कोई दोषसिद्धि नहीं।

नादिमार्ग—गवाहों के विस्थापन के कारण मुकदमा वर्षों रुका; मुख्य आरोपी अंतिम निर्णय से पहले मारा गया।

अपराध के बाद गवाहों का पलायन ही अभियोजन की विफलता का कारण बन गया। अर्थात जिस आतंक ने लोगों को गांव छोड़ने पर मजबूर किया, उसी विस्थापन ने बाद में अदालत में आतंकियों के विरुद्ध साक्ष्य देना कठिन बना दिया।

3.16 समग्र मूल्यांकन

संग्रामपोरा, वंधामा और नादिमार्ग तीन अलग गांवों की घटनाएं थीं, लेकिन उनमें एक समान रणनीतिक क्रम दिखाई देता है—

अल्पसंख्यक परिवारों की पहचान।

उनके सामाजिक विश्वास का लाभ।

वर्दी अथवा परिचित भाषा से भ्रम।

परिवारों को सामूहिक रूप से एकत्र करना।

महिलाओं और बच्चों सहित हत्या।

सुरक्षा व्यवस्था को विफल अथवा निष्क्रिय करना।

घटना के बाद बचे परिवारों का पलायन।

कमजोर जांच और विलंबित न्याय।

पंडितों की वापसी की योजना पर स्थायी प्रभाव।

इन हमलों ने आतंकवाद के उस सिद्धांत को व्यवहार में उतारा जिसमें मृतकों की संख्या से अधिक महत्वपूर्ण जीवित लोगों में उत्पन्न भय होता है।

3.17 निष्कर्ष

1990 के पलायन के बाद घाटी में रह गए कश्मीरी पंडित परिवार स्थानीय सहअस्तित्व और अपनी जन्मभूमि के प्रति असाधारण विश्वास का प्रतिनिधित्व करते थे। संग्रामपोरा, वंधामा और नादिमार्ग में उन्हीं परिवारों को निशाना बनाया गया जिन्होंने सबसे कठिन वर्षों में भी घाटी नहीं छोड़ी थी।

इन तीन घटनाओं में कम-से-कम 54 कश्मीरी पंडित मारे गए। हत्याओं ने प्रमाणित किया कि आतंकवाद का उद्देश्य केवल प्रभावशाली व्यक्तियों को समाप्त करना नहीं था। सामूहिक हमलों के माध्यम से घाटी में बची अल्पसंख्यक उपस्थिति, पंडितों की वापसी और हिंदू-मुस्लिम सहअस्तित्व—तीनों पर प्रहार किया गया।

इस त्रासदी का दूसरा पक्ष न्याय की विफलता है। अपराधी मारे गए, फरार रहे अथवा पहचाने ही नहीं गए; गवाह विस्थापित हो गए और मुकदमे दशकों तक रुके रहे। नादिमार्ग मामले का पुनः खुलना उम्मीद पैदा करता है, लेकिन संग्रामपोरा और वंधामा के पीड़ित परिवार अब भी अंतिम न्यायिक उत्तर की प्रतीक्षा कर रहे हैं।