किन लोगों को निशाना बनाया गया?
समुदाय, पेशा, सार्वजनिक भूमिका और हमले का रणनीतिक संदेश
समुदाय, पेशा, सार्वजनिक भूमिका और हमले का रणनीतिक संदेश
किन लोगों को निशाना बनाया गया?—पीड़ितों का सामाजिक और रणनीतिक वर्गीकरण
जम्मू-कश्मीर में टारगेट किलिंग का इतिहास बताता है कि आतंकियों ने केवल किसी एक धर्म अथवा समुदाय के लोगों की हत्या नहीं की। अलग-अलग समय पर कश्मीरी पंडितों, सिखों, स्थानीय मुसलमानों, पुलिसकर्मियों, राजनीतिक कार्यकर्ताओं, पंचायत प्रतिनिधियों, सरकारी कर्मचारियों, शिक्षकों, पत्रकारों, गैर-स्थानीय श्रमिकों, व्यापारियों, पर्यटकों और तीर्थयात्रियों को निशाना बनाया गया।
इन श्रेणियों को एक-दूसरे के विरुद्ध खड़ा करके देखना भी उचित नहीं होगा। अनेक मामलों में व्यक्ति की धार्मिक पहचान, पेशा, सरकारी सेवा और स्थानीय प्रभाव—एक साथ उसके चयन का कारण बने। आतंकियों का उद्देश्य केवल उस व्यक्ति की हत्या करना नहीं, बल्कि उससे जुड़े पूरे समुदाय, विभाग या आर्थिक क्षेत्र में भय उत्पन्न करना था।
1. कश्मीरी पंडित और घाटी में रह गए हिंदू
आतंकवाद के शुरुआती दौर में कश्मीरी पंडितों को मुख्यतः उनकी धार्मिक पहचान, सार्वजनिक प्रभाव और भारत समर्थक समझे जाने के कारण निशाना बनाया गया। वकील, न्यायाधीश, सरकारी अधिकारी, शिक्षाविद्, बुद्धिजीवी और प्रसारक शुरुआती हत्याओं के शिकार बने।
इनमें टीका लाल टपलू, सेवानिवृत्त न्यायाधीश नीलकंठ गंजू, दूरदर्शन केंद्र के निदेशक लस्सा कौल और कवि सर्वानंद कौल प्रेमी जैसे नाम प्रमुख हैं। इसके बाद संग्रामपोरा, वंधामा और नादिमार्ग में पंडित परिवारों की सामूहिक हत्याओं ने यह संदेश दिया कि पलायन के बाद घाटी में बचे लोग भी सुरक्षित नहीं हैं।
गृह मंत्रालय की 2004-05 की वार्षिक रिपोर्ट ने स्वीकार किया था कि आतंकवाद के शुरुआती वर्षों में नागरिकों पर हुए लक्षित हमलों के कारण अधिकांश कश्मीरी पंडितों के साथ बड़ी संख्या में सिखों, दूसरे हिंदुओं और कुछ मुस्लिम परिवारों को भी घाटी छोड़नी पड़ी। उस समय सरकार के रिकॉर्ड में 56,487 प्रवासी परिवार दर्ज थे। गृह मंत्रालय की वार्षिक रिपोर्ट 2004-05
2020 के बाद इस वर्ग के भीतर तीन उप-श्रेणियां विशेष रूप से निशाने पर दिखाई दीं:
घाटी में कभी पलायन न करने वाले पंडित परिवार
प्रधानमंत्री पुनर्वास पैकेज के अंतर्गत नियुक्त कर्मचारी
खेती, दुकान या स्थानीय व्यवसाय से जुड़े अल्पसंख्यक नागरिक
प्रमुख उदाहरणों में 5 अक्टूबर 2021 को श्रीनगर में फार्मासिस्ट माखन लाल बिंदरू, 12 मई 2022 को बडगाम के चाडूरा तहसील कार्यालय में कर्मचारी राहुल भट, 16 अगस्त 2022 को शोपियां के बाग में सुनील कुमार भट, 15 अक्टूबर 2022 को घर के बाहर पूरन कृष्ण भट और 26 फरवरी 2023 को पुलवामा में संजय शर्मा की हत्याएं शामिल हैं।
यहां लक्ष्य केवल संबंधित व्यक्ति नहीं था। ऐसी हत्या से पुनर्वास योजना के अंतर्गत घाटी लौटे अथवा वहीं नौकरी कर रहे हजारों कर्मचारियों में असुरक्षा फैलती है। राहुल भट की हत्या के बाद कर्मचारियों के प्रदर्शन और स्थानांतरण की मांग ने इस मनोवैज्ञानिक प्रभाव को प्रत्यक्ष रूप से दिखाया।
2. सिख समुदाय
घाटी में रहने वाला सिख समुदाय संख्या में छोटा है, लेकिन शिक्षा, कृषि, व्यापार और स्थानीय सामाजिक जीवन में उसकी महत्वपूर्ण उपस्थिति रही है। आतंकियों ने सिखों को भी सांप्रदायिक भय उत्पन्न करने और कश्मीर की बहुधार्मिक संरचना को कमजोर करने के लिए निशाना बनाया।
सबसे गंभीर उदाहरण 20 मार्च 2000 का छत्तीसिंहपोरा नरसंहार है, जिसमें 35 सिखों की हत्या की गई थी। इसकी जांच और विभिन्न दावों को लेकर विवाद रहे हैं, लेकिन पीड़ितों की सामुदायिक पहचान के आधार पर चयन निर्विवाद है।
7 अक्टूबर 2021 को श्रीनगर के ईदगाह स्थित सरकारी विद्यालय में प्रधानाचार्या सुपिंदर कौर और शिक्षक दीपक चंद की हत्या की गई। उपलब्ध विवरणों के अनुसार दोनों को विद्यालय के कर्मचारियों में से अलग करके मारा गया था। अक्टूबर 2021 की घटनाओं में चार हिंदू अथवा सिख अल्पसंख्यक नागरिकों सहित सात लोगों की हत्या हुई थी। ह्यूमन राइट्स वॉच की घटना-सूची
3. स्थानीय कश्मीरी मुसलमान
यह तथ्य अत्यंत महत्वपूर्ण है कि आतंकवाद में मारे गए नागरिकों का एक बड़ा हिस्सा स्थानीय मुसलमानों का रहा है। इसलिए टारगेट किलिंग को केवल “हिंदू बनाम मुस्लिम” परिघटना के रूप में प्रस्तुत करना तथ्यात्मक रूप से अधूरा होगा।
- स्थानीय मुसलमानों को निम्न आरोपों अथवा भूमिकाओं के आधार पर निशाना बनाया गया
पुलिस या सुरक्षा एजेंसियों से सहयोग करने का आरोप
मुखबिरी का संदेह
मुख्यधारा की राजनीति में भागीदारी
पंचायत या स्थानीय निकाय चुनाव लड़ना
आतंकियों के निर्देशों का विरोध
आत्मसमर्पण के बाद सामान्य जीवन अपनाना
सरकारी सेवा, पुलिस या सेना में होना
आतंकी हिंसा की सार्वजनिक आलोचना करना
अक्टूबर 2021 की घटनाएं इसका स्पष्ट उदाहरण हैं। 2 अक्टूबर को माजिद अहमद गोजरी और मोहम्मद शफी डार की हत्या की गई। 5 अक्टूबर को माखन लाल बिंदरू और बिहार निवासी वीरेंद्र पासवान के साथ बांदीपोरा में मुस्लिम टैक्सी चालक मोहम्मद शफी लोन को भी मार दिया गया। उस वर्ष अक्टूबर के प्रारंभ तक पुलिस के हवाले से प्रकाशित आंकड़ों में 28 नागरिकों की हत्या बताई गई थी—इनमें 20 मुसलमान, पांच कश्मीरी पंडित, एक सिख और दो गैर-स्थानीय श्रमिक बताए गए थे। VOA की अक्टूबर 2021 रिपोर्ट
इससे पता चलता है कि धार्मिक अल्पसंख्यकों पर हमलों का विशिष्ट सांप्रदायिक और विस्थापनकारी उद्देश्य था, लेकिन आतंकियों के निशाने पर स्थानीय मुस्लिम समाज के वे लोग भी रहे जो उनके नियंत्रण, विचारधारा या भय की व्यवस्था को चुनौती देते थे।
4. पुलिसकर्मी, सेना के जवान और उनके परिवार
सुरक्षा बलों पर घात लगाकर किए गए हमले सामान्यतः युद्धक या आतंकी हमलों की अलग श्रेणी में आते हैं। लेकिन छुट्टी पर गए, निहत्थे, घर में मौजूद अथवा व्यक्तिगत दिनचर्या में लगे पुलिस और सैन्यकर्मियों की हत्या टारगेट किलिंग मानी जाती है।
- ऐसे मामलों में आतंकियों ने
- पुलिसकर्मी को घर से बाहर बुलाया या अगवा किया
- मस्जिद, बाजार अथवा खेल के मैदान में हमला किया
- छुट्टी पर आए सैनिक को रास्ते से उठाया
- परिवार के सामने हत्या की
पुलिसकर्मी के साथ पत्नी, बच्चे या भाई को भी घायल किया।
सेना के लेफ्टिनेंट उमर फैयाज को मई 2017 में एक पारिवारिक समारोह से अगवा कर मार दिया गया। जून 2018 में सेना के जवान औरंगजेब को पुलवामा से अगवा करके हत्या कर दी गई। मई 2022 में पुलिसकर्मी सैफुल्लाह कादरी को श्रीनगर में उनके घर के पास गोली मारी गई; उनकी बेटी भी घायल हुई। अक्टूबर 2023 में पुलिस निरीक्षक मसरूर अहमद वानी को श्रीनगर में क्रिकेट खेलते समय गोली मारी गई और बाद में उनकी मृत्यु हो गई।
इन हत्याओं की मनोवैज्ञानिक मंशा स्पष्ट थी—स्थानीय युवाओं को पुलिस और सुरक्षा बलों में जाने से रोकना तथा वर्तमान कर्मचारियों को यह बताना कि वर्दी उतारने के बाद भी वे और उनके परिवार सुरक्षित नहीं हैं।
5. राजनीतिक कार्यकर्ता और निर्वाचित प्रतिनिधि
लोकसभा-विधानसभा स्तर के बड़े नेताओं की अपेक्षा आतंकियों ने अक्सर बूथ कार्यकर्ताओं, ब्लॉक पदाधिकारियों, सरपंचों, पंचों और नगरपालिका प्रतिनिधियों को चुना। इसका कारण उनकी सीमित सुरक्षा और स्थानीय समाज पर सीधा प्रभाव था।
गृह मंत्रालय की 2004-05 की रिपोर्ट के अनुसार 2004 में 62 राजनीतिक कार्यकर्ता मारे गए थे, जबकि 2003 में यह संख्या 52 थी। रिपोर्ट में जमीनी राजनीतिक कार्यकर्ताओं, ग्राम रक्षा समिति के सदस्यों, विशेष पुलिस अधिकारियों और आत्मसमर्पण कर चुके आतंकियों पर बढ़ते हमलों का उल्लेख किया गया था।
- प्रमुख उदाहरण हैं
8 जुलाई 2020—बांदीपोरा में भाजपा नेता वसीम बारी, उनके पिता और भाई की हत्या।
2 जून 2021—त्राल में भाजपा पार्षद राकेश पंडिता की हत्या।
18 मई 2024—शोपियां में पूर्व सरपंच और भाजपा कार्यकर्ता ऐजाज अहमद शेख की हत्या।
राजनीतिक कार्यकर्ता की हत्या का प्रभाव मतदान तक सीमित नहीं रहता। इससे प्रत्याशी मिलने, चुनाव प्रचार करने, बूथ एजेंट बनने और पंचायत व्यवस्था में भाग लेने वाले स्थानीय लोगों में भय फैलता है।
6. सरकारी कर्मचारी, शिक्षक और बैंककर्मी
सरकारी सेवा से जुड़े नागरिक आतंकियों के लिए दोहरी प्रतीकात्मकता रखते हैं—वे प्रशासन की स्थानीय उपस्थिति भी हैं और सामान्य जीवन के संचालन का माध्यम भी।
इसी श्रेणी में राहुल भट, प्रधानाचार्या सुपिंदर कौर और शिक्षक दीपक चंद आते हैं। 31 मई 2022 को जम्मू के सांबा जिले की शिक्षिका रजनी बाला को कुलगाम के विद्यालय के बाहर गोली मारी गई। रॉयटर्स ने उस समय इसे हिंदुओं और मुसलमानों को निशाना बनाने वाली हत्याओं की शृंखला का हिस्सा बताया था। रॉयटर्स, 1 जून 2022
2 जून 2022 को राजस्थान निवासी बैंक प्रबंधक विजय कुमार की कुलगाम में बैंक शाखा के भीतर हत्या की गई। इस तरह विद्यालय, तहसील कार्यालय और बैंक—तीनों कार्यस्थलों पर हमले हुए। उद्देश्य प्रशासनिक व्यवस्था को बाधित करने के साथ यह दिखाना था कि सामान्य दिखने वाला सार्वजनिक कार्यस्थल भी सुरक्षित नहीं है।
7. गैर-स्थानीय मजदूर, रेहड़ी-पटरी वाले और छोटे कामगार
बिहार, उत्तर प्रदेश, पंजाब, राजस्थान तथा दूसरे राज्यों से आने वाले श्रमिक कश्मीर की खेती, ईंट-भट्ठों, निर्माण, बढ़ईगीरी, फेरी और छोटे व्यवसायों में काम करते हैं। वे प्रायः किराये के कमरों या अस्थायी शिविरों में रहते हैं और उनके पास व्यक्तिगत सुरक्षा नहीं होती।
5 अक्टूबर 2021 को बिहार के स्ट्रीट-फूड विक्रेता वीरेंद्र पासवान की श्रीनगर में हत्या की गई। इसके बाद बिहार निवासी अरविंद कुमार शाह, उत्तर प्रदेश के बढ़ई सगीर अहमद और कुलगाम में रहने वाले बिहार के श्रमिकों को निशाना बनाया गया। 2 जून 2022 को बिहार निवासी ईंट-भट्ठा मजदूर दिलखुश कुमार की बडगाम में हत्या हुई और पंजाब निवासी एक अन्य श्रमिक घायल हुआ।
गृह मंत्रालय ने मार्च 2023 में संसद को बताया था कि जैश-ए-मोहम्मद के छद्म संगठन PAFF ने जम्मू-कश्मीर में काम करने वाले दूसरे राज्यों के नागरिकों को धमकियां दीं। इसी उत्तर में TRF पर सुरक्षा बलों और निर्दोष नागरिकों की हत्याओं की योजना बनाने का आरोप दर्ज है। राज्यसभा में गृह मंत्रालय का उत्तर
- गैर-स्थानीय श्रमिकों की हत्या के पीछे तीन उद्देश्य दिखाई देते हैं
- बाहरी श्रमिकों को घाटी छोड़ने पर मजबूर करना
- निर्माण और आर्थिक गतिविधियों को बाधित करना
“बाहरी लोगों की आमद” संबंधी आतंकी प्रचार को हिंसक रूप देना।
यहां “बाहरी” या “आउटसाइडर” शब्द आतंकियों के प्रचार की भाषा है; संवैधानिक और मानवीय दृष्टि से वे भारत के नागरिक और असैनिक कामगार हैं।
8. विकास परियोजनाओं से जुड़े कर्मचारी
20 अक्टूबर 2024 को गांदरबल के गगनगीर क्षेत्र में सुरंग परियोजना से जुड़े कर्मचारियों के शिविर पर हमला किया गया। इसमें एक स्थानीय डॉक्टर और छह कर्मचारी मारे गए तथा कई लोग घायल हुए। मृतकों में स्थानीय और गैर-स्थानीय दोनों थे। परियोजना सामरिक रूप से महत्वपूर्ण सर्व-मौसम संपर्क मार्ग से जुड़ी थी। रॉयटर्स की गगनगीर रिपोर्ट
यह हमला परंपरागत व्यक्तिगत टारगेट किलिंग और चयनित कार्यबल पर सामूहिक हमले के बीच की श्रेणी में आता है। यहां व्यक्ति के नाम से अधिक उसका कार्यस्थल और परियोजना से संबंध चयन का आधार था।
9. पत्रकार, कलाकार और सार्वजनिक आवाजें
पत्रकारों और सार्वजनिक व्यक्तित्वों को निशाना बनाने का उद्देश्य सूचना और अभिव्यक्ति के क्षेत्र में भय पैदा करना रहा है। दूरदर्शन श्रीनगर के निदेशक लस्सा कौल की 13 फरवरी 1990 को हत्या की गई। 14 जून 2018 को श्रीनगर में वरिष्ठ पत्रकार शुजात बुखारी और उनके दो सुरक्षाकर्मियों को गोली मार दी गई।
25 मई 2022 को बडगाम में टीवी कलाकार और सोशल मीडिया पर सक्रिय अमरीन भट की घर के बाहर हत्या कर दी गई; उनका नाबालिग भतीजा घायल हुआ। ऐसे हमलों के जरिए आतंकवादी यह तय करने का प्रयास करते हैं कि सार्वजनिक मंच पर कौन बोल सकता है, कौन सांस्कृतिक गतिविधि कर सकता है और कौन-सी आवाज “स्वीकार्य” होगी।
10. पर्यटक, तीर्थयात्री और धार्मिक पहचान के आधार पर चुने गए नागरिक
पर्यटकों और तीर्थयात्रियों पर होने वाला प्रत्येक हमला टारगेट किलिंग नहीं कहलाता। बस पर अंधाधुंध गोलीबारी, ग्रेनेड हमला या विस्फोट को सामान्यतः सामूहिक आतंकी हमला माना जाएगा। लेकिन यदि पर्यटकों को पहचान पूछकर, धर्म के आधार पर अलग करके अथवा किसी विशिष्ट धार्मिक यात्रा के कारण निशाना बनाया जाए, तो वह “चयनित सामूहिक हत्या” की श्रेणी में आता है।
22 अप्रैल 2025 को पहलगाम के बैसरन में हुए हमले में 26 लोगों की हत्या कर दी गई। भारत सरकार के अनुसार हमलावरों ने पीड़ितों की धार्मिक पहचान जांचने के बाद गोली मारी। रक्षा मंत्रालय ने यह भी कहा कि TRF ने हमले की जिम्मेदारी ली थी और घटना का पैटर्न लश्कर-ए-तैयबा के पुराने हमलों से मेल खाता था। रक्षा मंत्रालय, 26 जून 2025
इस घटना को सामान्य एकल टारगेट किलिंग की संख्या में जोड़ने के बजाय अलग “धार्मिक पहचान के आधार पर किया गया लक्षित नरसंहार” दर्ज करना अधिक शोधसंगत होगा।
निष्कर्ष: लक्ष्य व्यक्ति नहीं, उसके पीछे खड़ा समाज था
- जम्मू-कश्मीर में पीड़ितों का चयन मुख्यतः सात रणनीतिक उद्देश्यों से जुड़ा दिखाई देता है
- अल्पसंख्यकों में पलायन का भय पैदा करना
- स्थानीय मुसलमानों को सरकार और सुरक्षा एजेंसियों से सहयोग करने से रोकना
- राजनीतिक तथा पंचायत प्रक्रिया को कमजोर करना
- सरकारी कर्मचारियों और पुनर्वास-पैकेज कर्मियों को घाटी छोड़ने पर मजबूर करना
- गैर-स्थानीय श्रमिकों और निवेश को हतोत्साहित करना
- पर्यटन तथा विकास परियोजनाओं को बाधित करना
सांप्रदायिक तनाव और राष्ट्रीय स्तर पर अधिकतम प्रचार उत्पन्न करना।
इसलिए टारगेट किलिंग को केवल मृतकों की संख्या से नहीं समझा जा सकता। माखन लाल बिंदरू की हत्या एक दुकानदार की हत्या होने के साथ घाटी में रुके पंडितों के लिए संदेश थी; मोहम्मद शफी लोन की हत्या स्थानीय मुसलमानों के लिए चेतावनी थी; सुपिंदर कौर और दीपक चंद की हत्या शिक्षा व्यवस्था और अल्पसंख्यक समुदाय दोनों पर हमला थी; राहुल भट की हत्या पुनर्वास नीति पर प्रहार थी; और गगनगीर के श्रमिकों की हत्या विकास तथा संपर्क परियोजनाओं को बाधित करने का प्रयास थी।
यही टारगेट किलिंग की मूल रणनीति है—कम गोलियां चलाकर समाज के एक बहुत बड़े हिस्से में भय, अविश्वास और असुरक्षा पैदा करना।