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दस्तावेज़ · तथ्य · विश्लेषण
OCN Research Dossier–011 · अध्याय 17

रियासी बस हमला, 2024

तीर्थयात्रियों की बस पर गोलीबारी, स्थानीय सहयोग की जांच और धार्मिक पर्यटन पर हमला

Omkar Chaudhary / OCN Research Deskसंरचना संशोधित · 2 अगस्त 2026

तीर्थयात्रियों की बस पर गोलीबारी, स्थानीय सहयोग की जांच और धार्मिक पर्यटन पर हमला

9 जून 2024 की शाम जम्मू-कश्मीर के रियासी जिले में तीर्थयात्रियों से भरी एक बस पर आतंकवादियों ने अंधाधुंध गोलियां चला दीं। चालक के सिर में गोली लगने से बस अनियंत्रित होकर गहरी खाई में जा गिरी। हमले में चालक सहित नौ लोगों की मौत हुई और 41 यात्री घायल हुए। मृतकों में दो वर्ष का बच्चा और 14 वर्ष का किशोर भी शामिल थे।

यह घटना केवल गोलीबारी या सड़क दुर्घटना नहीं थी। राष्ट्रीय जांच एजेंसी—NIA के आरोपपत्र के अनुसार, आतंकवादियों की गोली लगने के कारण चालक बस पर नियंत्रण खो बैठा और वाहन खाई में जा गिरा। इसलिए बस के गिरने से हुई मौतें भी आतंकी हमले का प्रत्यक्ष परिणाम थीं। NIA के आधिकारिक आरोपपत्र संबंधी वक्तव्य में हमले का उद्देश्य जम्मू-कश्मीर आने वाले तीर्थयात्रियों और आम जनता में आतंक फैलाना बताया गया।

घटना के प्रमुख तथ्य

प्रारंभिक समाचारों में घायलों की संख्या 33 या 42 बताई गई थी, लेकिन बाद में जांच एजेंसी और प्रशासनिक रिकॉर्ड में अंतिम संख्या 41 सामने आई।

शिवखोड़ी से कटरा लौट रही थी बस

बस में उत्तर प्रदेश, राजस्थान और दिल्ली के श्रद्धालु सवार थे। ये लोग भगवान शिव के प्रसिद्ध गुफा मंदिर शिवखोड़ी में दर्शन करने के बाद कटरा की तरफ लौट रहे थे। कटरा माता वैष्णो देवी यात्रा का प्रमुख आधार शिविर है।

जब बस कांडा के निकट झंडी मोड़ पहुंची, जंगल में छिपे आतंकवादियों ने उस पर गोलियां चला दीं। गोलीबारी के लिए ऐसा स्थान चुना गया था जहां सड़क संकरी, घुमावदार और एक ओर गहरी खाई थी। इस भौगोलिक स्थिति ने हमले को और घातक बना दिया।

NIA के अनुसार, चालक के सिर में गोली लगने के बाद बस अनियंत्रित हुई और गहरी खाई में लुढ़क गई। घटनास्थल की तस्वीरों में वाहन बुरी तरह क्षतिग्रस्त दिखाई दिया। NIA ने दिसंबर 2024 में दाखिल आरोपपत्र में कहा कि हमला तीन आतंकवादियों ने एक स्थानीय मददगार के सक्रिय लॉजिस्टिक सहयोग से किया था।

बस गिरने के बाद भी होती रही गोलीबारी

कई जीवित बचे यात्रियों ने बताया कि बस के खाई में गिरने के बाद भी हमलावरों ने गोलियां चलाना जारी रखा। यात्रियों ने सीटों के नीचे छिपकर और मृत होने का अभिनय करके अपनी जान बचाई।

प्रत्यक्षदर्शियों के अनुसार, घायल माता-पिता ने अपने छोटे बच्चों को सीटों के नीचे दबाकर गोलियों से बचाने का प्रयास किया। कुछ यात्रियों का दावा था कि गोलीबारी कई मिनट तक चलती रही। इन गवाहियों की हर अवधि स्वतंत्र रूप से प्रमाणित नहीं हुई, लेकिन चिकित्सकीय तथ्य बताते हैं कि हमला बस के सड़क से नीचे गिरने तक सीमित नहीं था।

रिपोर्टों के अनुसार:

पांच मृतकों के शरीर पर गोली लगने के निशान मिले।

घायलों में कम-से-कम दस लोगों को गोली लगी थी।

गंभीर रूप से घायल यात्रियों की कई जीवनरक्षक सर्जरी की गईं।

बस के गिरने से बड़ी संख्या में यात्रियों को फ्रैक्चर, सिर और रीढ़ की चोटें आईं।

जीवित बचे लोगों के अनुभवों और चिकित्सकीय विवरणों को इस प्रत्यक्षदर्शी रिपोर्ट में दर्ज किया गया है।

कौन-कौन मारे गए?

मृतकों में दो स्थानीय बसकर्मी और सात तीर्थयात्री शामिल थे।

नामों की वर्तनी में विभिन्न सरकारी और मीडिया सूचियों में अंतर दिखाई देता है। राजस्थान के पीड़ित परिवार का उपनाम कहीं “सैनी”, कहीं “साहनी/सवहनी” लिखा गया। दो वर्षीय बच्चे का नाम भी टिटू, किट्टू और लव्यांश के रूप में प्रकाशित हुआ। पीड़ितों की प्रशासन आधारित सूची टाइम्स ऑफ इंडिया की रिपोर्ट में उपलब्ध है।

एक अन्य महत्वपूर्ण विसंगति यह है कि NIA के वक्तव्य में “आठ तीर्थयात्रियों और बस चालक” की मौत लिखी गई, जबकि जिला प्रशासन पर आधारित नामावली में चालक, परिचालक और सात तीर्थयात्री शामिल हैं। कुल संख्या दोनों रिकॉर्ड में नौ ही है।

तीन पीढ़ियों को खोने वाला राजस्थान का परिवार

राजस्थान के जयपुर क्षेत्र से आया एक परिवार हमले में लगभग समाप्त हो गया। राजेंद्र प्रसाद, उनकी पत्नी ममता, परिवार की युवती पूजा और उसका दो वर्षीय बेटा लव्यांश मारे गए। पूजा का पति पवन गंभीर रूप से घायल हुआ।

इस परिवार में एक ही हमले ने तीन पीढ़ियों की जान ले ली। दो वर्ष का बच्चा रियासी हमले का सबसे कम उम्र का मृतक था।

उत्तर प्रदेश के परिवारों को भी ऐसी ही त्रासदी झेलनी पड़ी। राजत वर्मा ने अपने 14 वर्षीय बेटे अनुराग को खो दिया, जबकि एक अन्य परिवार की बेटी रूबी मारी गई। चालक विजय कुमार अपने परिवार के मुख्य कमाने वाले सदस्य थे। पीड़ित परिवारों की परिस्थितियों का विस्तृत विवरण द प्रिंट की ग्राउंड रिपोर्ट में मिलता है।

क्या इसे टारगेट किलिंग माना जाए?

तकनीकी दृष्टि से रियासी हमला किसी एक पहचाने हुए व्यक्ति की चुनिंदा हत्या नहीं, बल्कि एक विशेष धार्मिक पहचान वाले नागरिक समूह को निशाना बनाकर किया गया सामूहिक आतंकी हमला था। फिर भी यह टारगेटेड टेरर यानी लक्षित आतंक की परिभाषा में आता है क्योंकि:

बस का चयन उसमें सवार तीर्थयात्रियों की पहचान के आधार पर किया गया।

निशाना कोई सैन्य प्रतिष्ठान या सुरक्षा काफिला नहीं था।

लक्ष्य निहत्थे नागरिक और छोटे बच्चे थे।

हमला शिवखोड़ी से कटरा जाने वाले धार्मिक यात्रा मार्ग पर किया गया।

आतंकवादियों का उद्देश्य केवल यात्रियों की हत्या नहीं, बल्कि व्यापक तीर्थयात्रा व्यवस्था में भय पैदा करना भी था।

अतः इसे व्यक्तिगत टारगेट किलिंग की जगह “तीर्थयात्रियों को लक्ष्य बनाकर किया गया सामूहिक आतंकी हमला” कहना अधिक तथ्यपरक होगा।

हमले के लिए झंडी मोड़ ही क्यों चुना गया?

NIA का आरोप है कि गिरफ्तार आरोपी हकम खान ने आतंकवादियों को हमले का स्थान चुनने में मदद की। झंडी मोड़ और आसपास का क्षेत्र कई सामरिक लाभ देता था:

घुमावदार सड़क: वाहन को तेजी से निकालना कठिन था।

गहरी खाई: चालक को गोली लगने या वाहन के अनियंत्रित होने पर भारी जनहानि निश्चित थी।

घना जंगल: हमलावर गोलीबारी के बाद छिप सकते थे।

कम आबादी: तत्काल नागरिक या पुलिस प्रतिरोध की संभावना कम थी।

तीर्थयात्रा मार्ग की जानकारी: आतंकवादियों को पता था कि इस रास्ते से श्रद्धालुओं की बसें गुजरती हैं।

राजौरी-रियासी वन क्षेत्र: दुर्गम पहाड़ी भूगोल हमलावरों को राजौरी की दिशा में निकलने या जंगल में लंबे समय तक छिपे रहने की सुविधा देता है।

यह स्थान चयन किसी आकस्मिक गोलीबारी के बजाय पूर्व नियोजित घात की ओर संकेत करता है।

स्थानीय सहयोग: हकम खान की गिरफ्तारी

हमले के दस दिन बाद, 19 जून 2024 को जम्मू-कश्मीर पुलिस ने 45 वर्षीय हकम खान उर्फ हाकिम दीन को गिरफ्तार किया। वह राजौरी जिले के बंधराही क्षेत्र का निवासी बताया गया।

रियासी की तत्कालीन वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक मोहिता शर्मा के अनुसार, आरोपी ने आतंकवादियों को कई बार अपने यहां ठहराया, उन्हें भोजन और आश्रय दिया तथा मार्गदर्शक के रूप में घटनास्थल तक पहुंचने में सहायता की। गिरफ्तारी का विवरण इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट में दर्ज है।

बाद में NIA ने आरोप लगाया कि हकम खान ने:

तीन आतंकवादियों को भोजन दिया;

उनके ठहरने की व्यवस्था की;

क्षेत्र की रेकी में सहायता की;

हमला करने योग्य स्थान की पहचान कराई;

आतंकवादियों को घटनास्थल तक पहुंचने में मदद दी;

साजिश और हमले के लॉजिस्टिक नेटवर्क में सक्रिय भूमिका निभाई।

14 दिसंबर 2024 को NIA ने जम्मू की विशेष अदालत में हकम खान के खिलाफ भारतीय दंड संहिता और गैरकानूनी गतिविधियां रोकथाम अधिनियम—UAPA की विभिन्न धाराओं के अंतर्गत आरोपपत्र दाखिल किया।

यह ध्यान रखना जरूरी है कि आरोपपत्र दाखिल होना दोषसिद्धि नहीं है। किसी आरोपी को कानूनन दोषी तभी माना जाता है जब न्यायालय आरोपों को साक्ष्यों के आधार पर सिद्ध पाए।

पाकिस्तान स्थित लश्कर हैंडलरों की कथित भूमिका

NIA की पूछताछ से दो पाकिस्तान स्थित लश्कर-ए-तैयबा कमांडरों के नाम सामने आने की खबरें प्रकाशित हुईं:

सैफुल्लाह उर्फ सज्जाद जट्ट

अबू कताल उर्फ कताल सिंधी

जांच से जुड़े अधिकारियों के अनुसार, ये दोनों हमलावरों के हैंडलर हो सकते थे। यह भी बताया गया कि हमले में कम-से-कम तीन आतंकवादियों की प्रत्यक्ष भूमिका थी। हालांकि जुलाई 2024 के इन प्रारंभिक निष्कर्षों के समय एजेंसी ने स्पष्ट किया था कि पाकिस्तान स्थित हैंडलरों की भूमिका का सत्यापन अभी जारी है। PTI पर आधारित जांच रिपोर्ट में इस अंतर को दर्ज किया गया है।

इसलिए तीन स्तर अलग रखना आवश्यक है:

स्थापित तथ्य: तीर्थयात्रियों की बस पर गोलीबारी हुई और नौ लोग मारे गए।

NIA का आरोप: हकम खान ने तीन आतंकवादियों को आश्रय, भोजन, रेकी और मार्गदर्शन दिया।

जांच का निष्कर्ष/संदेह: पाकिस्तान स्थित लश्कर कमांडरों ने हमले को निर्देशित किया हो सकता है।

TRF का दावा और बाद में पीछे हटना

हमले के बाद सोशल मीडिया पर द रेजिस्टेंस फ्रंट—TRF के नाम से जिम्मेदारी लेने वाला एक संदेश प्रसारित हुआ। कुछ समय बाद संगठन ने कथित रूप से इससे इनकार कर दिया या पोस्ट वापस ले ली।

TRF को भारतीय सुरक्षा एजेंसियां लश्कर-ए-तैयबा का छद्म संगठन मानती हैं। ऐसे छद्म नामों का प्रयोग आम तौर पर तीन उद्देश्यों के लिए किया जाता है:

पाकिस्तान स्थित मूल संगठन से प्रत्यक्ष संबंध छिपाना;

आतंकवाद को स्थानीय असंतोष का रूप देना;

जिम्मेदारी स्वीकारने और नकारने की गुंजाइश बनाए रखना।

लेकिन केवल सोशल मीडिया पोस्ट के आधार पर किसी हमले की जिम्मेदारी अंतिम रूप से निर्धारित नहीं की जा सकती। उसकी पुष्टि हथियारों, संचार, डिजिटल साक्ष्य, गिरफ्तार आरोपियों, वित्तीय लेन-देन और लॉजिस्टिक संपर्कों से होती है।

हमलावरों को स्थानीय सहयोग की आवश्यकता क्यों थी?

रियासी जैसे पहाड़ी क्षेत्र में बाहर से आए आतंकवादियों के लिए लंबे समय तक बिना सहायता रहना कठिन होता है। उन्हें सामान्यतः निम्नलिखित सहायता चाहिए होती है:

सुरक्षित ठिकाना;

भोजन और पानी;

मोबाइल फोन या संदेश पहुंचाने की व्यवस्था;

सुरक्षा बलों की गतिविधियों की सूचना;

जंगल के मार्गों की जानकारी;

लक्ष्य और उसके आने-जाने के समय की सूचना;

हथियार छिपाने की जगह;

हमले के बाद सुरक्षित निकलने का मार्ग।

रियासी मामले में गिरफ्तारी और NIA के आरोप यह दिखाते हैं कि एक स्थानीय सहयोगी की भूमिका केवल भोजन देने तक सीमित नहीं थी। स्थान चयन और रेकी में सहायता का आरोप उसे साजिश की परिचालन कड़ी बनाता है।

यही OGW—ओवर ग्राउंड वर्कर नेटवर्क का वास्तविक खतरा है। आतंकवादी दिखाई देता है, लेकिन उसका सहयोगी सामान्य नागरिक की तरह समाज में रहकर हमले की तैयारी आसान बनाता है।

हमला किस संदेश के लिए किया गया?

रियासी हमला कई स्तरों पर मनोवैज्ञानिक युद्ध था।

धार्मिक यात्रा में भय

शिवखोड़ी और माता वैष्णो देवी जम्मू संभाग के प्रमुख तीर्थस्थल हैं। श्रद्धालुओं की बस पर हमला करके आतंकवादी देशभर के संभावित यात्रियों में भय उत्पन्न करना चाहते थे।

सांप्रदायिक प्रतिक्रिया भड़काना

हिंदू तीर्थयात्रियों और बच्चों की हत्या से व्यापक आक्रोश पैदा होना स्वाभाविक था। आतंकी संगठनों की रणनीति अक्सर ऐसी प्रतिक्रिया उत्पन्न करना होती है जिससे स्थानीय सामाजिक संबंध बिगड़ें और उन्हें नए प्रचार का अवसर मिले।

जम्मू को नया आतंकी मोर्चा बनाना

कश्मीर घाटी में सुरक्षा दबाव बढ़ने के बाद आतंकी गतिविधियों का एक हिस्सा राजौरी, पुंछ, रियासी, कठुआ, डोडा और उधमपुर के पहाड़ी क्षेत्रों की ओर खिसकता दिखाई दिया। घने जंगल और कठिन भूगोल आतंकवादियों को छिपने की सुविधा देते हैं।

सामान्य स्थिति के सरकारी दावे पर चोट

हमला उस दिन हुआ जब दिल्ली में नरेंद्र मोदी तीसरी बार प्रधानमंत्री पद की शपथ लेने वाले थे। समय के कारण घटना का राजनीतिक और राष्ट्रीय प्रभाव कई गुना बढ़ा। हालांकि सार्वजनिक जांच रिकॉर्ड में अभी ऐसा निर्णायक प्रमाण नहीं है कि शपथ ग्रहण समारोह को देखकर ही हमले का समय निर्धारित किया गया था।

2017 के अमरनाथ बस हमले से समानता

रियासी हमला जुलाई 2017 में अमरनाथ यात्रियों की बस पर हुए हमले की याद दिलाता है, जिसमें आठ तीर्थयात्री मारे गए थे। दोनों घटनाओं में:

धार्मिक यात्रियों की बस को निशाना बनाया गया;

उद्देश्य सामूहिक भय पैदा करना था;

बस में महिलाएं और बच्चे मौजूद थे;

हमले का प्रभाव जम्मू-कश्मीर से बाहर पूरे देश में पड़ा।

रियासी की विशिष्टता यह थी कि गोलीबारी के कारण बस खाई में गिर गई, जिससे आतंकवादियों की गोलियों और वाहन दुर्घटना का संयुक्त घातक प्रभाव पड़ा।

सुरक्षा व्यवस्था पर उठे प्रश्न

इस हमले के बाद कुछ गंभीर सवाल सामने आए:

  • क्या शिवखोड़ी-कटरा यात्रा मार्ग की नियमित सुरक्षा समीक्षा हो रही थी?
  • क्या स्थानीय पुलिस के पास क्षेत्र में संदिग्ध आतंकवादियों की मौजूदगी की सूचना थी?
  • संवेदनशील मार्ग पर यात्री बस को सुरक्षा या मार्ग-समन्वय क्यों नहीं मिला?
  • क्या बसों की आवाजाही और यात्रियों की संख्या का रिकॉर्ड वास्तविक समय में रखा जा रहा था?
  • राजौरी से रियासी तक फैले जंगलों में सक्रिय OGW नेटवर्क की पहचान क्यों नहीं हो पाई?
  • हमला स्थल के चयन में स्थानीय मदद के आरोप के बावजूद प्रत्यक्ष हमलावर कैसे बच निकले?
  • क्या तीर्थयात्रा मार्गों पर तकनीकी निगरानी, ड्रोन और सड़क सुरक्षा चौकियों की संख्या पर्याप्त थी?

प्रत्येक धार्मिक वाहन को सैन्य काफिला बनाना व्यावहारिक नहीं है, लेकिन खतरे के आकलन, मार्ग की सफाई, संदिग्ध गतिविधियों की निगरानी और स्थानीय खुफिया तंत्र को बेहतर बनाना प्रशासन की जिम्मेदारी है।

बचाव अभियान और मुआवजा

हमले के बाद सेना, जम्मू-कश्मीर पुलिस और CRPF ने संयुक्त तलाशी अभियान शुरू किया। जंगलों में ड्रोन, खोजी कुत्तों और हेलीकॉप्टर की सहायता ली गई। ग्राम रक्षा समूहों को भी सतर्क किया गया। संदिग्ध आतंकवादी का स्केच जारी कर सूचना देने वाले को 20 लाख रुपये के पुरस्कार की घोषणा की गई।

उपराज्यपाल प्रशासन ने:

प्रत्येक मृतक के निकट संबंधी को 10 लाख रुपये;

प्रत्येक घायल को 50 हजार रुपये

की अनुग्रह राशि घोषित की। इसका आधिकारिक विवरण जम्मू-कश्मीर उपराज्यपाल कार्यालय के वक्तव्य में दिया गया।

अभी तक क्या स्थापित हुआ और क्या अनसुलझा है?

स्थापित तथ्य

बस पर आतंकवादियों ने गोलीबारी की।

चालक को गोली लगी और बस खाई में गिर गई।

नौ लोगों की मृत्यु और 41 के घायल होने की अंतिम संख्या दर्ज हुई।

कम-से-कम तीन आतंकवादियों के शामिल होने की जांच एजेंसी की थ्योरी है।

हकम खान को गिरफ्तार कर उसके विरुद्ध आरोपपत्र दाखिल किया गया।

NIA ने उस पर आश्रय, भोजन, रेकी, स्थान चयन और मार्गदर्शन के आरोप लगाए।

एजेंसी के आरोप, जिन पर न्यायिक निर्णय बाकी है

हकम खान आतंकी साजिश का सक्रिय सदस्य था।

तीनों हमलावरों को उसने अनेक अवसरों पर आश्रय दिया।

लश्कर-ए-तैयबा का नेटवर्क हमले के पीछे था।

पाकिस्तान स्थित कमांडरों ने हमलावरों को निर्देशित किया।

अनसुलझे प्रश्न

  • तीनों प्रत्यक्ष हमलावरों की निश्चित पहचान क्या थी?
  • वे भारत में कब और किस मार्ग से घुसे?
  • हमले में इस्तेमाल हथियार कहां से आए?
  • क्या स्थानीय नेटवर्क में हकम खान के अतिरिक्त अन्य लोग भी शामिल थे?
  • हमलावरों ने बस के समय और यात्रियों की प्रकृति की जानकारी कैसे प्राप्त की?
  • प्रत्यक्ष हमलावर मारे गए, गिरफ्तार हुए या किसी अन्य मॉड्यूल में सक्रिय रहे?
  • हमले के न्यायिक मुकदमे की अंतिम स्थिति और दोषसिद्धि कब होगी?

सार्वजनिक रूप से उपलब्ध सबसे ठोस आधिकारिक न्यायिक अपडेट दिसंबर 2024 का NIA आरोपपत्र है। प्रत्यक्ष गोली चलाने वाले आतंकवादियों की गिरफ्तारी या उनके विरुद्ध अंतिम दोषसिद्धि की प्रमाणित सूचना सामने नहीं आई है।

निष्कर्ष: आतंक का लक्ष्य बस नहीं, यात्रा और विश्वास था

रियासी बस हमला जम्मू-कश्मीर में आतंकवाद की बदलती रणनीति का महत्वपूर्ण उदाहरण है। हमलावरों ने किसी सुरक्षा प्रतिष्ठान के बजाय ऐसी बस चुनी जिसमें गरीब और मध्यमवर्गीय परिवार, महिलाएं तथा बच्चे धार्मिक यात्रा कर रहे थे।

जंगल में छिपे आतंकवादियों की गोलियों ने चालक को बस पर नियंत्रण खोने के लिए मजबूर किया और वाहन खाई में जा गिरा। इसलिए इस त्रासदी को साधारण सड़क दुर्घटना के रूप में देखना तथ्यात्मक रूप से गलत होगा।

जांच का दूसरा बड़ा निष्कर्ष स्थानीय लॉजिस्टिक सहयोग की कथित भूमिका है। यदि NIA के आरोप न्यायालय में सिद्ध होते हैं, तो रियासी मामला दिखाएगा कि तीन हथियारबंद आतंकवादियों के पीछे भोजन, आश्रय, रेकी, रास्ते की पहचान और सीमा पार निर्देशन वाला व्यापक नेटवर्क काम कर रहा था।

इस हमले का तात्कालिक परिणाम नौ निर्दोष लोगों की मृत्यु था, लेकिन उसका व्यापक लक्ष्य धार्मिक यात्रा को असुरक्षित दिखाना, जम्मू क्षेत्र में भय फैलाना, सांप्रदायिक तनाव उत्पन्न करना और सरकार के सामान्य स्थिति के दावे को चुनौती देना था। रियासी की स्थायी सीख यही है कि आतंकवाद से संघर्ष केवल बंदूकधारी को मारने तक सीमित नहीं हो सकता। सीमा पार हैंडलर, स्थानीय OGW, वन मार्ग, वित्तीय सहायता और खुफिया विफलता—इन सभी कड़ियों को एक साथ तोड़ना आवश्यक है।