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दस्तावेज़ · तथ्य · विश्लेषण
OCN Research Dossier–011 · अध्याय 20

जुलाई 2026: पुलिसकर्मी और प्रवासी मजदूर निशाने पर

अनंतनाग और कुलगाम की हत्याएं, संभावित मॉड्यूल और हाइब्रिड आतंक की नई चुनौती

Omkar Chaudhary / OCN Research Deskसंरचना संशोधित · 2 अगस्त 2026

अनंतनाग और कुलगाम की हत्याएं, संभावित मॉड्यूल और हाइब्रिड आतंक की नई चुनौती

जुलाई 2026 के आखिरी दस दिनों में दक्षिण कश्मीर में हुई दो अलग-अलग आतंकवादी घटनाओं ने घाटी की सुरक्षा-व्यवस्था के सामने एक बार फिर “हिट एंड रन” या पिस्तौल आधारित टारगेट किलिंग की चुनौती खड़ी कर दी। पहली घटना 22 जुलाई को अनंतनाग में हुई, जहां अमरनाथ यात्रा की सुरक्षा में तैनात जम्मू-कश्मीर पुलिस के हेड कांस्टेबल आशिक हुसैन कुरैशी की हत्या कर दी गई। नौ दिन बाद, 31 जुलाई को कुलगाम के केलम इलाके में ईंट-भट्ठे पर काम करने वाले छत्तीसगढ़ के दो प्रवासी मजदूरों—दीपक रात्रे और भूपेंद्र भैना—को गोली मार दी गई।

इन दोनों घटनाओं में कुल तीन लोगों की मौत हुई। उपलब्ध सूचनाओं के अनुसार कोई अन्य व्यक्ति घायल नहीं हुआ। शुरुआती जांच में सुरक्षा एजेंसियां दोनों हमलों के पीछे एक ही लश्कर-ए-तैयबा मॉड्यूल या उससे जुड़े स्लीपर सेल की संभावना देख रही हैं, लेकिन 2 अगस्त 2026 तक यह संबंध किसी अदालत, आरोपपत्र अथवा विस्तृत आधिकारिक पुलिस वक्तव्य से निर्णायक रूप से स्थापित नहीं हुआ है।

घटनाओं का संक्षिप्त विवरण

1. अनंतनाग में हेड कांस्टेबल की हत्या

हमला कब और कहां हुआ?

22 जुलाई 2026 को लगभग दोपहर 12:30 बजे अनंतनाग शहर के व्यस्त लाल चौक बाजार में एक आतंकवादी ने पुलिसकर्मी पर नजदीक से गोली चलाई। हमले के समय बाजार में आम नागरिकों की आवाजाही थी। हमलावर भीड़ का लाभ उठाकर निकल गया।

घायल पुलिसकर्मी को तत्काल अस्पताल पहुंचाया गया, लेकिन डॉक्टरों ने उन्हें मृत घोषित कर दिया। उनकी पहचान हेड कांस्टेबल आशिक हुसैन कुरैशी के रूप में हुई। वे इंडिया रिजर्व पुलिस की तीसरी बटालियन से जुड़े थे और उस समय अमरनाथ यात्रा संबंधी सुरक्षा ड्यूटी पर तैनात थे। डेली एक्सेलसियर की घटनास्थल रिपोर्ट

कुरैशी की उम्र को लेकर प्रारंभिक समाचारों में अंतर है। कुछ रिपोर्टों में उन्हें 35 वर्ष और कुछ में 45 वर्ष का बताया गया है। इसलिए आधिकारिक सेवा-अभिलेख सामने आने तक उम्र को निर्णायक रूप से लिखना उचित नहीं होगा।

भीड़ भरे बाजार को क्यों चुना गया?

व्यस्त बाजार में हमला करना आतंकवादियों की नई-पुरानी “लो-विजिबिलिटी” रणनीति का हिस्सा माना जाता है। ऐसी जगह पर—

हथियारबंद हमलावर को पहले से पहचानना कठिन होता है।

गोली चलाने के बाद वह आम लोगों की भीड़ में छिप सकता है।

सुरक्षा बल जवाबी गोलीबारी में नागरिकों की सुरक्षा को प्राथमिकता देते हैं।

छोटी पिस्तौल अथवा बैग में छिपाए हथियार को घटनास्थल तक पहुंचाना आसान होता है।

हमले का मनोवैज्ञानिक प्रभाव प्रत्यक्षदर्शियों और पूरे शहर पर पड़ता है।

जांच एजेंसियों ने आसपास लगे सीसीटीवी कैमरों की फुटेज की पड़ताल की। एक रिपोर्ट में काले कपड़े और काली टोपी पहने संदिग्ध के बैग में हथियार छिपाकर निकलने की बात कही गई, लेकिन पुलिस ने उस व्यक्ति की पहचान अथवा प्रत्यक्ष संलिप्तता की औपचारिक पुष्टि नहीं की। आईबी टाइम्स की जांच-आधारित रिपोर्ट

इतने बड़े पैमाने पर छापे क्यों पड़े?

हत्या के कुछ घंटों के भीतर श्रीनगर, बारामूला, बडगाम, गांदरबल और दक्षिण कश्मीर के कई इलाकों में छापेमारी तथा सत्यापन अभियान शुरू किए गए। शुरुआती रिपोर्ट में करीब दो हजार और अगले दिन की रिपोर्ट में ढाई हजार से अधिक संदिग्ध ओवरग्राउंड वर्करों तथा आतंक समर्थकों को पूछताछ के लिए हिरासत में लिए जाने की बात कही गई।

अकेले श्रीनगर में करीब 700, बडगाम में 200 से अधिक, बारामूला में 178 और गांदरबल में 100 से अधिक व्यक्तियों से पूछताछ की सूचना दी गई। पुलिस के अनुसार अभियान का उद्देश्य आतंकवादियों को मिलने वाली—

पनाह,

परिवहन,

संदेश पहुंचाने की सुविधा,

वित्तीय सहायता,

मोबाइल फोन और सिम कार्ड,

हथियार रखने के ठिकाने,

घटनास्थल की रेकी

जैसी सहायता का नेटवर्क तलाशना था। पुलिस कार्रवाई पर विस्तृत रिपोर्ट

यह समझना जरूरी है कि पूछताछ के लिए हिरासत में लिया जाना अपराध सिद्ध होने के बराबर नहीं है। प्रत्येक व्यक्ति की भूमिका साक्ष्य के आधार पर अलग-अलग निर्धारित की जानी चाहिए।

आशिक हुसैन कुरैशी का पारिवारिक पक्ष

कुरैशी बडगाम जिले के लोलिपोरा इलाके के निवासी बताए गए। उनके पिता गुलाम मोहिउद्दीन कुरैशी भी जम्मू-कश्मीर पुलिस में हेड कांस्टेबल थे और 1990 के दशक में ड्यूटी के दौरान रामबन में भूस्खलन की चपेट में आकर मारे गए थे। पिता की मृत्यु के बाद आशिक हुसैन ने अनुकंपा नियुक्ति के अंतर्गत पुलिस सेवा ज्वाइन की थी।

वे अपने पीछे पत्नी, दो बेटे, एक बेटी और वृद्ध मां सहित परिवार छोड़ गए। उनके अंतिम संस्कार में बड़ी संख्या में स्थानीय लोग शामिल हुए। यह तथ्य महत्वपूर्ण है क्योंकि आतंकवादियों द्वारा स्थानीय पुलिसकर्मियों को निशाना बनाना केवल सुरक्षा प्रतिष्ठान पर हमला नहीं, बल्कि कश्मीरी समाज के भीतर भय पैदा करने की कोशिश भी है।

2. कुलगाम में छत्तीसगढ़ के मजदूरों की हत्या

घटना का क्रम

31 जुलाई 2026 की देर शाम आतंकवादी कुलगाम जिले के केलम इलाके में स्थित एक ईंट-भट्ठे पर पहुंचे। वहां काम करने वाले दो प्रवासी मजदूरों को गोली मार दी गई।

मृतकों की पहचान इस प्रकार हुई—

दीपक रात्रे, उम्र 24 वर्ष, निवासी बुंदेली गांव, सक्ती जिला, छत्तीसगढ़।

भूपेंद्र भैना, उम्र 28 वर्ष, निवासी छुइया गांव, सारंगढ़-बिलाईगढ़ जिला, छत्तीसगढ़।

दीपक की घटनास्थल पर मौत हो गई। भूपेंद्र को गंभीर अवस्था में अस्पताल पहुंचाया गया, लेकिन उपचार के दौरान उन्होंने भी दम तोड़ दिया। इसी कारण हमले के तुरंत बाद आई खबरों में “एक मृत, एक घायल” लिखा गया, जबकि बाद की पुष्ट स्थिति में दोनों की मृत्यु दर्ज हुई। पीड़ितों और उनके परिवारों पर पीटीआई–ट्रिब्यून रिपोर्ट

हमलावर ने पहले बातचीत की थी?

प्रारंभिक जांच का हवाला देने वाली एक रिपोर्ट के अनुसार बंदूकधारी ने गोली चलाने से पहले मजदूरों से लगभग दस मिनट तक बातचीत की और उनकी व्यक्तिगत पहचान के बारे में पूछा। परिवार के सदस्यों ने यह आरोप भी लगाया कि हमलावर ने जाति, समुदाय और धार्मिक पहचान से जुड़े प्रश्न किए थे।

यह विवरण हमले के लक्षित स्वरूप को समझने में महत्वपूर्ण हो सकता है, लेकिन इसे अभी परिवार और जांच सूत्रों का कथन माना जाना चाहिए। पुलिस की अंतिम जांच अथवा आरोपपत्र से इसकी स्वतंत्र पुष्टि शेष है। हमले से पहले पूछताछ संबंधी रिपोर्ट

आजीविका की तलाश में गए थे कश्मीर

दीपक रात्रे अपने परिवार के एकमात्र प्रमुख कमाने वाले सदस्य थे। उनके परिवार में वृद्ध मां, पत्नी, चार महीने का बेटा और शारीरिक रूप से दिव्यांग छोटा भाई है। उनके पिता की पहले ही मृत्यु हो चुकी थी। दीपक करीब सात-आठ महीने पहले पत्नी के साथ मजदूरी करने जम्मू-कश्मीर गए थे।

भूपेंद्र भैना लगभग तीन महीने पहले अपनी पत्नी के साथ ईंट-भट्ठे पर काम करने गए थे। उनका चार वर्षीय बेटा छत्तीसगढ़ में दादी और नाबालिग बुआ के पास रह रहा था। उनके माता-पिता और भाई भी रोजगार के लिए हिमाचल प्रदेश में मजदूरी कर रहे थे।

इन पारिवारिक परिस्थितियों से उस सामाजिक-आर्थिक पक्ष का पता चलता है जिसे टारगेट किलिंग की संख्याओं में अक्सर भुला दिया जाता है। आतंकवादी हमले ने दो लोगों की जान ही नहीं ली, बल्कि निर्धन परिवारों की आर्थिक रीढ़ भी तोड़ दी।

राहत और मुआवजा

जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला ने दोनों मृतकों के परिवारों के लिए दस-दस लाख रुपये की सहायता घोषित की। यह राशि कुलगाम जिला प्रशासन द्वारा पहले घोषित छह-छह लाख रुपये की तत्काल सहायता के अतिरिक्त बताई गई। मुआवजे की घोषणा

छत्तीसगढ़ सरकार ने भी परिवारों को सहायता देने और शवों को उनके गृह जिलों तक पहुंचाने के लिए जम्मू-कश्मीर प्रशासन के साथ समन्वय किया।

3. क्या दोनों हमले एक ही मॉड्यूल ने किए?

दोनों हमलों के बीच नौ दिन का अंतर और करीब-करीब समान “हिट एंड रन” पद्धति होने के कारण सुरक्षा एजेंसियां एक साझा मॉड्यूल की संभावना की जांच कर रही हैं।

मीडिया रिपोर्टों में सुरक्षा सूत्रों के हवाले से दावा किया गया कि लश्कर-ए-तैयबा कमांडर लतीफ भट और उसका सहयोगी वारिस शाह इन घटनाओं के पीछे हो सकते हैं। कथित तौर पर वारिस शाह पर रेकी और स्थानीय लॉजिस्टिक सहायता देने का संदेह है। यह भी आशंका जताई गई कि लतीफ भट ने निष्क्रिय पड़े स्लीपर सेल को दोबारा सक्रिय किया। एनडीटीवी की सुरक्षा सूत्रों पर आधारित रिपोर्ट

रिपोर्टों के अनुसार जुलाई के आरंभ में सुरक्षा बलों ने लतीफ भट और लश्कर कमांडर जाकिर गनई का पीछा किया था। कई दिनों तक चले अभियान में जाकिर गनई मारा गया, जबकि लतीफ कथित रूप से निकल गया। इसके बाद उसके द्वारा पुराने संपर्कों को सक्रिय करने की आशंका जताई गई।

फिर भी तीन स्तर स्पष्ट रखे जाने चाहिए—

स्थापित तथ्य: तीन लोगों की दो अलग आतंकवादी हमलों में हत्या हुई।

जांच एजेंसियों का संदेह: दोनों घटनाओं के पीछे लतीफ भट–वारिस शाह मॉड्यूल हो सकता है।

अभी अप्रमाणित: आरोपियों की सटीक भूमिका, सीमा पार से मिले निर्देश और दोनों हमलों की साझा साजिश।

जब तक गिरफ्तारी, फॉरेंसिक मिलान, हथियार बरामदगी, डिजिटल संवाद, प्रत्यक्षदर्शी पहचान अथवा आरोपपत्र सामने नहीं आता, संदिग्धों को कानूनी रूप से दोषी घोषित नहीं किया जा सकता।

4. स्थानीय सहायता के बिना हमला कितना संभव?

अनंतनाग का लाल चौक और कुलगाम का ईंट-भट्ठा—दोनों ऐसे स्थान हैं जिनकी भौगोलिक तथा मानवीय परिस्थितियां अलग हैं। फिर भी दोनों जगह निशाने की सही पहचान, समय का चुनाव और सुरक्षित भागने का मार्ग किसी स्तर की पूर्व रेकी की ओर संकेत करते हैं।

स्थानीय सहायता की संभावित भूमिकाएं निम्न हो सकती हैं—

  • पुलिस की तैनाती और ड्यूटी का समय बताना
  • प्रवासी मजदूरों के रहने एवं काम करने की जगह की पहचान
  • हमले से पहले आसपास की गतिविधियों की रेकी
  • हथियार को घटनास्थल के निकट पहुंचाना
  • हमलावर को वाहन, कपड़े या अस्थायी आश्रय उपलब्ध कराना
  • मोबाइल फोन अथवा इंटरनेट माध्यम से निर्देश पहुंचाना
  • घटना के बाद उसे सुरक्षित इलाके तक निकालना

लेकिन किसी इलाके में हमला होना अपने आप यह प्रमाणित नहीं करता कि वहां रहने वाले लोग आतंकवादियों के सहयोगी थे। स्थानीय सहायता का आरोप व्यक्ति-विशेष के साक्ष्य पर आधारित होना चाहिए, पूरे गांव अथवा समुदाय पर नहीं।

5. स्लीपर सेल और हाइब्रिड आतंकवादी की रणनीति

इन घटनाओं में भारी हथियारों, बड़े आतंकवादी दस्ते या लंबे एनकाउंटर के बजाय अकेले या सीमित संख्या में हमलावर की संभावना जताई गई है। यह हाइब्रिड आतंकवादी अथवा स्लीपर सेल वाली रणनीति से मेल खाती है।

ऐसा व्यक्ति सामान्य नागरिक की तरह रह सकता है, नियमित रूप से हथियार लेकर नहीं चलता और किसी विशेष हमले के लिए उसे पिस्तौल उपलब्ध कराई जाती है। वारदात के बाद वह हथियार वापस कर सामान्य जीवन में लौटने की कोशिश करता है। इससे—

उसका सुरक्षा रिकॉर्ड साफ दिखाई देता है;

नियमित आतंकवादी सूची में नाम नहीं आता;

पिस्तौल छिपाना आसान होता है;

छोटे समय में हमला करके निकल सकता है;

स्थानीय भीड़ में घुलना अपेक्षाकृत आसान होता है।

कुलगाम और अनंतनाग की घटनाओं में पिस्तौल, नजदीक से फायरिंग, रेकी और तुरंत फरार होने की पद्धति इसी खतरे को रेखांकित करती है।

6. पुलिसकर्मी और प्रवासी मजदूर ही निशाना क्यों?

दोनों वर्गों को निशाना बनाने के पीछे अलग, लेकिन परस्पर जुड़ा आतंकवादी उद्देश्य दिखाई देता है।

स्थानीय पुलिसकर्मी

जम्मू-कश्मीर पुलिस आतंकवाद विरोधी अभियानों में स्थानीय भाषा, भूगोल, परिवारों और पुराने नेटवर्क की जानकारी रखती है। इसलिए आतंकवादी संगठनों के लिए स्थानीय पुलिसकर्मी सबसे प्रभावी सुरक्षा बाधाओं में से एक होते हैं। किसी पुलिसकर्मी की सार्वजनिक स्थान पर हत्या करके संगठन—

पुलिस बल का मनोबल तोड़ने,

स्थानीय युवाओं को पुलिस सेवा से डराने,

मुखबिर नेटवर्क को धमकाने,

अमरनाथ यात्रा जैसी गतिविधियों में असुरक्षा पैदा करने

की कोशिश करते हैं।

प्रवासी मजदूर

गैर-स्थानीय मजदूर आसान और अपेक्षाकृत असुरक्षित निशाना होते हैं। वे छोटे समूहों में भट्ठों, बागों और निर्माण स्थलों पर रहते हैं तथा उनके पास निजी सुरक्षा नहीं होती। उनकी हत्या से आतंकवादी—

बाहरी कामगारों में पलायन का भय पैदा करते हैं;

स्थानीय अर्थव्यवस्था को नुकसान पहुंचाते हैं;

जम्मू-कश्मीर के सामान्य होते सामाजिक जीवन को चुनौती देते हैं;

हमले को सांप्रदायिक अथवा क्षेत्रीय रंग देने की कोशिश करते हैं;

कम संसाधनों से राष्ट्रीय स्तर पर बड़ी सुर्खियां हासिल करते हैं।

कुलगाम हमले के बाद दक्षिण कश्मीर के अनेक ईंट-भट्ठों पर कामकाज प्रभावित होने और प्रवासी मजदूरों के भयभीत होकर कमरों में रहने की सूचना आई। इसका अर्थ है कि आतंकवादी दो लोगों की हत्या से हजारों श्रमिकों में भय फैलाने में सफल होना चाहते थे।

7. सीमा पार संबंध का प्रश्न

लश्कर-ए-तैयबा पाकिस्तान स्थित प्रतिबंधित आतंकवादी संगठन है। इसलिए यदि जांच में लतीफ भट या उससे जुड़े लश्कर मॉड्यूल की भूमिका पुष्ट होती है, तो सीमा पार निर्देश, धन या हथियार की संभावना महत्वपूर्ण हो जाएगी।

इसके बावजूद केवल संगठनात्मक संबद्धता से किसी विशेष हमले में सीमा पार से वास्तविक समय में आदेश मिलने का निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता। इसे प्रमाणित करने के लिए एजेंसियों को डिजिटल चैट, इंटरनेट कॉल, पकड़े गए संदेश, धन के लेन-देन, हथियार की बैलिस्टिक जांच और गिरफ्तार सहयोगियों के बयानों जैसे साक्ष्य की आवश्यकता होगी।

अनंतनाग हमले की जिम्मेदारी को लेकर भी मीडिया में परस्पर भिन्न दावे सामने आए। कुछ रिपोर्टों में लश्कर के छद्म संगठन टीआरएफ और अन्य में “यूनाइटेड लिबरेशन काउंसिल” के नाम का उल्लेख किया गया। सोशल मीडिया पर किया गया दावा अपने आप जिम्मेदारी का कानूनी प्रमाण नहीं होता। ऐसे दावे प्रचार, भ्रम अथवा जांच को गलत दिशा देने के लिए भी किए जा सकते हैं।

8. जांच के सामने प्रमुख प्रश्न

दोनों हत्याकांडों की पूरी साजिश स्पष्ट करने के लिए जांच एजेंसियों को निम्न प्रश्नों के उत्तर तलाशने होंगे—

  • क्या दोनों घटनाओं में एक ही हथियार अथवा समान प्रकार के कारतूस इस्तेमाल हुए?
  • क्या घटनास्थलों की पहले से रेकी की गई थी?
  • हमलावरों को पीड़ितों की दिनचर्या किसने बताई?
  • अनंतनाग का हमलावर स्थानीय था या सीमा पार से आया विदेशी आतंकवादी?
  • कुलगाम में मजदूरों से कथित तौर पर कौन-से पहचान संबंधी प्रश्न पूछे गए?
  • क्या लतीफ भट और वारिस शाह की भूमिका डिजिटल या भौतिक साक्ष्य से प्रमाणित है?
  • हमलावरों को हथियार, आश्रय और परिवहन किसने दिया?
  • क्या दोनों हमलों के पीछे एक साझा हैंडलर था?
  • ईंट-भट्ठों और अन्य असंगठित कार्यस्थलों पर प्रवासी श्रमिकों का कोई सुरक्षा ऑडिट हुआ था?
  • व्यापक पूछताछ में हिरासत में लिए गए लोगों में से कितनों के विरुद्ध वास्तविक साक्ष्य मिला?

निष्कर्ष

जुलाई 2026 की ये घटनाएं दर्शाती हैं कि जम्मू-कश्मीर में आतंकवाद का खतरा केवल बड़े हमलों या सीमा पर होने वाली घुसपैठ तक सीमित नहीं है। एक अकेला पिस्तौलधारी, सीमित स्थानीय सहायता और कुछ मिनट की रेकी भी सुरक्षा तंत्र के लिए गंभीर चुनौती उत्पन्न कर सकती है।

अनंतनाग में आशिक हुसैन कुरैशी की हत्या का उद्देश्य स्थानीय पुलिस और अमरनाथ यात्रा सुरक्षा पर मनोवैज्ञानिक प्रहार करना था। कुलगाम में दीपक रात्रे और भूपेंद्र भैना की हत्या ने प्रवासी श्रमिकों को संदेश दिया कि आजीविका के सामान्य स्थान भी आतंकवादियों के निशाने पर हो सकते हैं।

प्रारंभिक जांच में दोनों घटनाओं के पीछे साझा लश्कर मॉड्यूल की आशंका महत्वपूर्ण है, लेकिन इसे अभी अंतिम निष्कर्ष नहीं माना जाना चाहिए। जांच की विश्वसनीयता इसी में होगी कि जिम्मेदारी सोशल मीडिया दावों या सामूहिक हिरासत के बजाय हथियार, फॉरेंसिक, डिजिटल संवाद, वित्तीय लेन-देन और व्यक्तिगत आपराधिक भूमिका जैसे ठोस प्रमाणों से निर्धारित की जाए।