omkarchaudhary.comJOURNALIST · AUTHOR · RESEARCHEROCN Research Desk
दस्तावेज़ · तथ्य · विश्लेषण
OCN Research Dossier–011 · अध्याय 04

आतंकी संगठन और बदलते छद्म नाम

JKLF, हिजबुल मुजाहिदीन, लश्कर, जैश, TRF, PAFF और अन्य फ्रंट

Omkar Chaudhary / OCN Research Deskप्रथम संस्करण · 1 अगस्त 2026

JKLF, हिजबुल मुजाहिदीन, लश्कर, जैश, TRF, PAFF और अन्य फ्रंट

प्रस्तावना: नाम बदलते रहे, हिंसा की रणनीति कायम रही

जम्मू-कश्मीर में टारगेट किलिंग को समझने के लिए केवल घटनाओं और मृतकों की सूची पर्याप्त नहीं है। यह जानना भी जरूरी है कि अलग-अलग दौर में किन संगठनों ने हिंसा को आगे बढ़ाया, उनके राजनीतिक या वैचारिक लक्ष्य क्या थे, उन्हें हथियार, प्रशिक्षण और धन कहां से मिला तथा उन्होंने स्थानीय स्तर पर अपना नेटवर्क कैसे खड़ा किया।

1988-89 में शुरू हुआ सशस्त्र आतंक एक ही संगठन या एक जैसी विचारधारा का परिणाम नहीं था। जम्मू-कश्मीर लिबरेशन फ्रंट यानी JKLF ने संपूर्ण जम्मू-कश्मीर को भारत और पाकिस्तान—दोनों से अलग करके स्वतंत्र देश बनाने का लक्ष्य सामने रखा। इसके विपरीत हिजबुल मुजाहिदीन ने जम्मू-कश्मीर के पाकिस्तान में विलय और इस्लामी व्यवस्था की वकालत की। बाद में पाकिस्तान स्थित लश्कर-ए-तैयबा और जैश-ए-मोहम्मद जैसे संगठनों ने विदेशी आतंकवादियों, फिदायीन हमलों और बड़े विस्फोटों वाला ज्यादा संगठित मॉडल विकसित किया।

2019 के बाद एक और बदलाव दिखाई दिया। पुराने और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर प्रतिबंधित संगठनों के स्थान पर द रेजिस्टेंस फ्रंट—TRF, पीपुल्स एंटी-फासिस्ट फ्रंट—PAFF, कश्मीर टाइगर्स, जम्मू-कश्मीर फ्रीडम फाइटर्स और गजनवी फोर्स जैसे नए नाम सामने आए। भारतीय गृह मंत्रालय और राष्ट्रीय जांच एजेंसी के अनुसार इनमें से अधिकांश पुराने संगठनों के ही फ्रंट, प्रॉक्सी या छद्म संगठन हैं।

  • इस विकासक्रम को मोटे तौर पर चार चरणों में समझा जा सकता है

1. JKLF: स्वतंत्र कश्मीर के नारे से सशस्त्र हिंसा तक

संगठन की उत्पत्ति और उद्देश्य

JKLF के इतिहास में विभिन्न स्रोत अलग-अलग स्थापना वर्ष बताते हैं। इसका कारण यह है कि इसके पूर्ववर्ती संगठन, विदेश स्थित नेतृत्व और कश्मीर घाटी में सक्रिय यासीन मलिक गुट अलग-अलग समय पर अस्तित्व में आए।

वर्ष 2024 के UAPA ट्रिब्यूनल के आदेश में शामिल सरकारी पृष्ठभूमि-पत्र के अनुसार जम्मू-कश्मीर नेशनल लिबरेशन फ्रंट—JKNLF—का गठन 1964 में पाकिस्तान में हुआ और 1971 में इसका नाम JKLF रखा गया। इसी दस्तावेज के मुताबिक यासीन मलिक गुट फरवरी 1988 में घाटी में सक्रिय हुआ। उसका उद्देश्य भारत, पाकिस्तान प्रशासित कश्मीर, गिलगित-बाल्टिस्तान, हुंजा और अक्साई चिन को मिलाकर एक स्वतंत्र जम्मू-कश्मीर बनाना था। यह लक्ष्य पाकिस्तान में विलय की मांग से भिन्न था। UAPA ट्रिब्यूनल का JKLF-Y संबंधी आदेश

JKLF ने शुरुआती दौर में अपनी विचारधारा को कश्मीरी राष्ट्रवाद और धर्मनिरपेक्ष स्वतंत्रता आंदोलन के रूप में प्रस्तुत किया। इसके बावजूद उसका सशस्त्र अभियान राजनीतिक विरोधियों, सरकारी अधिकारियों, अल्पसंख्यकों तथा सुरक्षा प्रतिष्ठान से जुड़े लोगों की हत्याओं और अपहरणों से जुड़ा रहा।

शुरुआती टारगेट किलिंग में भूमिका

1989-90 में कश्मीरी पंडितों, न्यायिक अधिकारियों, राजनीतिक कार्यकर्ताओं, सूचना देने के संदेह में स्थानीय नागरिकों और सरकारी कर्मचारियों की चुनिंदा हत्याओं ने व्यापक भय का वातावरण बनाया। प्रत्येक हत्या में किसी एक संगठन की भूमिका न्यायिक रूप से प्रमाणित नहीं हुई, लेकिन उस समय की पुलिस जांच, आरोपपत्रों और सरकारी रिकॉर्ड में JKLF के सदस्यों का नाम अनेक मामलों में आया।

  • JKLF से जुड़े दो प्रमुख मामलों का उल्लेख 2024 के ट्रिब्यूनल आदेश में भी किया गया है

8 दिसंबर 1989 को केंद्रीय गृहमंत्री मुफ्ती मोहम्मद सईद की बेटी रुबैया सईद का अपहरण और आतंकवादियों की रिहाई के बदले उनकी मुक्ति।

25 जनवरी 1990 को श्रीनगर के रावलपोरा में भारतीय वायुसेना के कर्मचारियों पर हमला।

1994 का संघर्ष-विराम और संगठन का विभाजन

यासीन मलिक ने 1994 में सशस्त्र संघर्ष से दूरी बनाते हुए अहिंसक राजनीतिक आंदोलन का रास्ता अपनाने की घोषणा की। इससे संगठन में विभाजन हुआ। पाकिस्तान स्थित अमानुल्लाह खान के नेतृत्व वाला धड़ा सशस्त्र संघर्ष जारी रखने के पक्ष में रहा, जबकि मलिक गुट ने सार्वजनिक रूप से राजनीतिक अभियान पर जोर दिया।

इसके बाद JKLF की प्रत्यक्ष सैन्य शक्ति तेजी से घटी, लेकिन भारत सरकार ने संगठन पर अलगाववादी गतिविधियों, आतंक वित्तपोषण और हिंसक आंदोलनों को समर्थन देने के आरोप लगाए। यासीन मलिक को 2022 में विशेष NIA अदालत ने आतंक वित्तपोषण और UAPA से संबंधित मामले में आजीवन कारावास की सजा सुनाई। उसने उस मामले में अपने विरुद्ध लगाए गए आरोपों को चुनौती न देने का निर्णय लिया था।

कानूनी स्थिति की महत्वपूर्ण बारीकी

JKLF-यासीन मलिक गुट को मार्च 2019 में UAPA के अंतर्गत “गैरकानूनी संघ” घोषित किया गया। मार्च 2024 में प्रतिबंध को पांच वर्ष के लिए बढ़ाया गया और सितंबर 2024 में UAPA ट्रिब्यूनल ने इसे पुष्ट कर दिया।

यहां कानूनी अंतर ध्यान देने योग्य है। JKLF-Y को UAPA की धारा 3 के अंतर्गत “गैरकानूनी संघ” घोषित किया गया है। इसके विपरीत लश्कर, जैश और हिजबुल मुजाहिदीन UAPA की धारा 35 के अंतर्गत सूचीबद्ध “आतंकवादी संगठन” हैं। दोनों शब्द कानूनी रूप से एक-दूसरे के पूर्ण पर्याय नहीं हैं।

2. हिजबुल मुजाहिदीन: स्थानीय कैडर और पाकिस्तान समर्थक विचारधारा

गठन और वैचारिक अंतर

हिजबुल मुजाहिदीन का गठन 1989 में हुआ। इसके प्रारंभिक संस्थापक के रूप में मोहम्मद अहसान डार का नाम लिया जाता है, जबकि बाद में मोहम्मद यूसुफ शाह उर्फ सैयद सलाहुद्दीन इसका प्रमुख बना। संगठन ने कश्मीर की स्वतंत्रता के बजाय उसका पाकिस्तान में विलय अपना आधिकारिक उद्देश्य बनाया।

यही बिंदु JKLF और हिजबुल के बीच सबसे बड़ा वैचारिक अंतर था। JKLF का घोषित लक्ष्य स्वतंत्र और संयुक्त जम्मू-कश्मीर था; हिजबुल मुजाहिदीन पाकिस्तान समर्थक और इस्लामी राजनीतिक विचारधारा वाला संगठन था।

हिजबुल को जम्मू-कश्मीर के जमात-ए-इस्लामी से जुड़े सामाजिक और धार्मिक नेटवर्क का लाभ मिला। ग्रामीण क्षेत्रों में उसकी पैठ JKLF की तुलना में ज्यादा व्यापक हुई। 1990 के दशक के मध्य तक JKLF की सैन्य शक्ति घटने के साथ हिजबुल घाटी का सबसे प्रभावशाली स्थानीय आतंकवादी संगठन बन गया।

अमेरिकी विदेश विभाग के अनुसार हिजबुल मुजाहिदीन 1989 में बना, जम्मू-कश्मीर में सक्रिय सबसे पुराने संगठनों में है और कश्मीर का पाकिस्तान में विलय चाहता है। अमेरिका ने अगस्त 2017 में इसे विदेशी आतंकवादी संगठन घोषित किया। अमेरिकी विदेश विभाग की FTO सूची

टारगेट किलिंग का मॉडल

  • हिजबुल मुजाहिदीन ने केवल सुरक्षा बलों को निशाना नहीं बनाया। उस पर अलग-अलग वर्षों में निम्न श्रेणियों के लोगों की लक्षित हत्याओं के आरोप लगे
  • मुख्यधारा के राजनीतिक कार्यकर्ता और पंचायत प्रतिनिधि
  • पुलिसकर्मी तथा विशेष पुलिस अधिकारी
  • आतंकवाद छोड़कर आत्मसमर्पण करने वाले पूर्व उग्रवादी
  • सुरक्षाबलों के लिए मुखबिरी करने के संदेह में नागरिक
  • अल्पसंख्यक समुदायों के सदस्य

संगठन की विचारधारा या आदेशों का विरोध करने वाले स्थानीय लोग।

इसका उद्देश्य प्रत्येक मामले में केवल एक व्यक्ति की हत्या करना नहीं था। चुनिंदा हत्या के माध्यम से पूरे गांव, राजनीतिक दल, सरकारी विभाग या समुदाय को संदेश दिया जाता था कि राज्य के साथ सहयोग करने की कीमत जान देकर चुकानी पड़ सकती है।

स्थानीय चेहरा, सीमा पार नेतृत्व

हिजबुल की विशेषता यह थी कि उसके अनेक लड़ाके स्थानीय कश्मीरी थे। इससे संगठन को सामाजिक संपर्क, सुरक्षित ठिकाने और क्षेत्र की जानकारी प्राप्त हुई। वहीं उसका शीर्ष नेतृत्व और कमांड ढांचा पाकिस्तान प्रशासित कश्मीर में स्थापित होने के आरोप लगातार लगते रहे।

सैयद सलाहुद्दीन का आधार पाकिस्तान में रहा है। अमेरिका ने जून 2017 में उसे विशेष रूप से नामित वैश्विक आतंकवादी घोषित किया। भारतीय गृह मंत्रालय की वर्तमान सूची में “हिजबुल मुजाहिदीन/हिजबुल मुजाहिदीन पीर पंजाल रेजिमेंट” को आतंकवादी संगठन के रूप में दर्ज किया गया है। गृह मंत्रालय की प्रतिबंधित आतंकवादी संगठनों की सूची

बुरहान वानी और डिजिटल प्रचार

2010 के दशक में बुरहान वानी ने हिजबुल की भर्ती और प्रचार रणनीति बदल दी। उसने सोशल मीडिया पर हथियारों के साथ स्थानीय युवाओं की तस्वीरें और वीडियो प्रसारित किए। इससे आतंकवादी संगठन को रहस्यमय भूमिगत ढांचे के बजाय युवाओं के बीच एक दृश्य पहचान मिली।

जुलाई 2016 में वानी की मुठभेड़ में मौत के बाद व्यापक हिंसा हुई। सुरक्षा कार्रवाइयों में हिजबुल के अनेक कमांडर मारे गए और संगठन का सक्रिय स्थानीय ढांचा कमजोर पड़ा। इसके बाद लश्कर और जैश से जुड़े नए फ्रंट संगठनों की भूमिका अधिक दिखाई देने लगी।

3. लश्कर-ए-तैयबा: विदेशी आतंकवादी से TRF तक

पाकिस्तान स्थित संगठन

लश्कर-ए-तैयबा की स्थापना 1980 के दशक के उत्तरार्ध में हाफिज मोहम्मद सईद, जफर इकबाल और उनके सहयोगियों ने की। इसका संबंध मरकज-दावा-वल-इरशाद से रहा और बाद में जमात-उद-दावा को लश्कर का संगठनात्मक मुखौटा बताया गया।

संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद लश्कर को पाकिस्तान स्थित आतंकवादी संगठन बताती है और हाफिज सईद को उसका प्रमुख मानती है। लश्कर को मई 2005 में संयुक्त राष्ट्र की अल-कायदा प्रतिबंध सूची में शामिल किया गया था। संयुक्त राष्ट्र का लश्कर संबंधी विवरण

लश्कर की विचारधारा JKLF के राष्ट्रवादी मॉडल से बिल्कुल अलग है। वह कश्मीर को एक व्यापक जिहादी परियोजना का हिस्सा मानता है। उसके प्रशिक्षण, वित्तपोषण, धार्मिक प्रचार और विदेशी लड़ाकों के इस्तेमाल ने जम्मू-कश्मीर के आतंकवाद को अधिक सैन्यकृत किया।

संचालन का तरीका

  • लश्कर ने जम्मू-कश्मीर में कई प्रकार के अभियान चलाए
  • नियंत्रण रेखा से प्रशिक्षित आतंकवादियों की घुसपैठ
  • गांवों और सैन्य शिविरों पर सामूहिक हमले
  • फिदायीन दस्तों का इस्तेमाल
  • स्थानीय ओवरग्राउंड वर्करों से हथियार, भोजन और ठिकाने प्राप्त करना
  • राजनीतिक कार्यकर्ताओं, अल्पसंख्यकों और गैर-स्थानीय लोगों को निशाना बनाना

सुरक्षाबलों की तैनाती एवं व्यक्तियों की दिनचर्या की रेकी।

सभी पुराने नरसंहारों और टारगेट किलिंग में लश्कर की भूमिका समान स्तर पर सिद्ध नहीं हुई है। कुछ मामलों में पुलिस ने लश्कर के आतंकवादियों को जिम्मेदार बताया, कुछ में संगठन ने दावा किया, जबकि कुछ मुकदमों में आरोपी बरी भी हुए। इसलिए प्रत्येक मामले का प्रमाण अलग देखा जाना चाहिए।

4. TRF: लश्कर का नया नाम और स्थानीय प्रतिरोध की ब्रांडिंग

द रेजिस्टेंस फ्रंट—TRF—2019 में अनुच्छेद 370 के अधिकतर प्रावधान हटाए जाने के बाद सामने आया। नाम, प्रतीक और प्रचार सामग्री ऐसी रखी गई जिससे वह किसी अंतरराष्ट्रीय जिहादी संगठन के बजाय स्थानीय राजनीतिक “प्रतिरोध” जैसा दिखाई दे।

  • लेकिन भारत सरकार के अनुसार TRF स्वतंत्र संगठन नहीं, बल्कि लश्कर-ए-तैयबा का प्रॉक्सी है। मार्च 2023 में राज्यसभा में गृह मंत्रालय ने बताया कि TRF
  • सुरक्षाकर्मियों और जम्मू-कश्मीर के निर्दोष नागरिकों की हत्या की योजना बनाने
  • हथियारों के परिवहन और समन्वय
  • आतंकवादियों की भर्ती
  • सीमा पार घुसपैठ

हथियार और मादक पदार्थों की तस्करी में शामिल रहा है।

TRF को जनवरी 2023 में औपचारिक रूप से UAPA की आतंकवादी संगठन सूची में लश्कर के साथ जोड़ दिया गया। गृह मंत्रालय की सूची में इसे “Lashkar-e-Taiba/Pasban-e-Ahle Hadis/The Resistance Front और इसके सभी स्वरूपों तथा फ्रंट संगठनों” के रूप में दर्ज किया गया है।

TRF की उपयोगिता क्यों पड़ी?

  • नए नाम के कई रणनीतिक लाभ थे

पाकिस्तानी संबंध छिपाना: लश्कर का नाम अंतरराष्ट्रीय आतंकवाद और पाकिस्तान स्थित नेतृत्व से जुड़ चुका था। TRF की अंग्रेजी ब्रांडिंग उसे स्थानीय आंदोलन की शक्ल देती थी।

FATF और अंतरराष्ट्रीय दबाव से बचाव: प्रतिबंधित संगठन का पुराना नाम इस्तेमाल करने पर वित्तीय तथा राजनयिक दबाव तत्काल बढ़ सकता था।

घटना की जिम्मेदारी में भ्रम: हमला करने वाला मॉड्यूल लश्कर से प्रशिक्षित या निर्देशित हो सकता था, लेकिन दावा TRF के नाम से जारी किया जाता था।

स्थानीय भर्ती: “रेजिस्टेंस” जैसी शब्दावली से राजनीतिक असंतोष और आतंकवादी हिंसा के बीच की सीमा धुंधली करने का प्रयास हुआ।

छोटे मॉड्यूल: स्थायी रूप से जंगल में रहने वाले आतंकवादियों के बजाय सामान्य जीवन जीते दिखाई देने वाले “हाइब्रिड आतंकियों” से एक-दो हत्याएं कराकर उन्हें फिर स्थानीय आबादी में मिला देना आसान था।

इसलिए TRF को केवल नाम बदलना नहीं, बल्कि आतंकवाद की संचार और संचालन रणनीति में बदलाव भी माना जाना चाहिए।

5. जैश-ए-मोहम्मद: फिदायीन ढांचे से नए फ्रंट तक

मसूद अजहर और संगठन का गठन

दिसंबर 1999 में इंडियन एयरलाइंस की उड़ान IC-814 के अपहरण के बाद यात्रियों की रिहाई के बदले भारत ने मसूद अजहर सहित तीन आतंकवादियों को छोड़ा। पाकिस्तान लौटने के बाद अजहर ने 2000 में जैश-ए-मोहम्मद का गठन किया।

संयुक्त राष्ट्र के अनुसार जैश पाकिस्तान स्थित संगठन है। उसे 17 अक्टूबर 2001 को अल-कायदा और तालिबान से संबंध के आधार पर प्रतिबंध सूची में रखा गया। संयुक्त राष्ट्र के विवरण में 1 अक्टूबर 2001 के जम्मू-कश्मीर विधानसभा हमले तथा 13 दिसंबर 2001 के संसद हमले में जैश और लश्कर की भूमिका का उल्लेख है। संयुक्त राष्ट्र का जैश संबंधी विवरण

मसूद अजहर को 1 मई 2019 को संयुक्त राष्ट्र ने वैश्विक आतंकवादी सूची में शामिल किया। संयुक्त राष्ट्र के अनुसार उसने जैश की स्थापना की, उसे आर्थिक सहायता दी और अल-कायदा से जुड़े कार्यों की योजना, भर्ती तथा समर्थन में भूमिका निभाई। मसूद अजहर पर संयुक्त राष्ट्र का विवरण

हमले की प्रकृति

  • जैश की पहचान मुख्य रूप से निम्न रणनीतियों से बनी
  • आत्मघाती और फिदायीन हमले
  • विस्फोटकों से भरे वाहनों का इस्तेमाल
  • सैन्य शिविरों और सुरक्षा प्रतिष्ठानों पर हमला
  • स्थानीय युवाओं की भर्ती के साथ प्रशिक्षित पाकिस्तानी आतंकवादियों का प्रयोग

वीडियो, धार्मिक भाषण और डिजिटल प्रचार के माध्यम से कट्टरता।

14 फरवरी 2019 के पुलवामा आत्मघाती हमले की जिम्मेदारी जैश ने ली थी। इसमें CRPF के 40 जवान मारे गए। यह सामान्य अर्थ में टारगेट किलिंग नहीं, बल्कि सामूहिक आतंकवादी हमला था, लेकिन इससे जैश की प्रशिक्षण, विस्फोटक, स्थानीय सहयोग और सीमा पार संचालन क्षमता स्पष्ट हुई।

6. PAFF: जैश का घोषित प्रॉक्सी

  • युवाओं को कट्टर बनाकर भर्ती करना
  • बंदूक, गोला-बारूद और विस्फोटक चलाने का प्रशिक्षण
  • सुरक्षाबलों, राजनीतिक नेताओं और बाहर से जम्मू-कश्मीर में काम करने आए नागरिकों को धमकियां

सोशल मीडिया तथा भौतिक नेटवर्क के माध्यम से आतंकवादी हमलों की साजिश।

PAFF को जनवरी 2023 में UAPA की आतंकवादी संगठन सूची में जैश के साथ सम्मिलित कर दिया गया। आधिकारिक सूची में “जैश-ए-मोहम्मद/तहरीक-ए-फुरकान/PAFF और उसके सभी स्वरूपों एवं फ्रंट संगठनों” का उल्लेख है।

PAFF की प्रचार सामग्री अक्सर सैन्य शब्दावली, बॉडी-कैमरा वीडियो और संपादित हमले के दृश्य प्रसारित करती है। इसका उद्देश्य वास्तविक सैन्य क्षमता से अधिक शक्तिशाली छवि बनाना, भर्ती को प्रेरित करना और भय पैदा करना भी होता है।

7. कश्मीर टाइगर्स और दूसरे छद्म संगठन

“कश्मीर टाइगर्स” नाम 2021 के आसपास प्रमुखता से सामने आया। सुरक्षा एजेंसियों और अनेक पुलिस बयानों में इसे जैश से जुड़ा संगठन बताया गया है। हालांकि PAFF की तरह कश्मीर टाइगर्स का नाम गृह मंत्रालय की अनुसूची में जैश के साथ अलग से दर्ज नहीं है। इसलिए उसका जैश से संबंध बताते समय इसे जांच एजेंसियों का आकलन या आरोप कहा जाना चाहिए, न्यायिक रूप से प्रत्येक मामले में सिद्ध तथ्य नहीं।

NIA ने अपनी जांच में TRF, कश्मीर टाइगर्स, PAFF, यूनाइटेड लिबरेशन फ्रंट जम्मू-कश्मीर, जम्मू-कश्मीर फ्रीडम फाइटर्स और मुजाहिदीन गजवत-उल-हिंद जैसे संगठनों को प्रतिबंधित संगठनों से जुड़े नए फ्रंट बताया है। अप्रैल 2024 की कार्रवाई में NIA ने कहा कि इन संगठनों के नेटवर्क में “हाइब्रिड आतंकवादी”, ओवरग्राउंड वर्कर, समर्थक और डिजिटल प्रचारक शामिल हैं। NIA की अप्रैल 2024 की कार्रवाई

प्रमुख छद्म संगठनों की स्थिति

8. टारगेट किलिंग की संगठनात्मक श्रृंखला

  • एक टारगेट किलिंग के पीछे हमेशा बड़ा सशस्त्र दस्ता नहीं होता। कई मामलों में छोटी, अलग-अलग स्तरों वाली श्रृंखला काम करती है

पाकिस्तान या पाकिस्तान प्रशासित कश्मीर में बैठा हैंडलर लक्ष्य या लक्ष्य की श्रेणी निर्धारित करता है।

स्थानीय संपर्क लक्ष्य की पहचान, नौकरी, आवागमन और सुरक्षा व्यवस्था की सूचना जुटाता है।

ओवरग्राउंड वर्कर हथियार, वाहन, मोबाइल फोन या ठिकाना उपलब्ध कराता है।

स्थानीय या घुसपैठ कर आया आतंकवादी हमला करता है।

हथियार किसी दूसरे व्यक्ति को सौंप दिया जाता है अथवा सुरक्षित स्थान पर छिपा दिया जाता है।

किसी नए फ्रंट संगठन के नाम से सोशल मीडिया पर जिम्मेदारी या धमकी जारी की जाती है।

हर मामले में यह पूरी श्रृंखला मौजूद हो, यह जरूरी नहीं। कभी स्थानीय मॉड्यूल को लक्ष्य चुनने की स्वतंत्रता दी जा सकती है। कभी हमले की जिम्मेदारी लेने वाला संगठन वास्तविक हमलावर नहीं होता। इसी कारण केवल टेलीग्राम पोस्ट या सोशल मीडिया दावे को निर्णायक प्रमाण नहीं माना जा सकता।

9. स्थानीय सहयोग का प्रश्न

  • सीमा पार स्थित नेतृत्व के बावजूद कोई संगठन स्थानीय सहयोग के बिना लंबे समय तक टारगेट किलिंग नहीं चला सकता। स्थानीय सहायता कई स्तरों पर मिल सकती है
  • आतंकवादी विचारधारा से सहमत सक्रिय सदस्य
  • धमकी या दबाव में सहायता करने वाले ग्रामीण
  • धन या निजी लाभ के लिए काम करने वाले तस्कर
  • रिश्तेदारी के कारण ठिकाना उपलब्ध कराने वाले लोग
  • लक्ष्य की जानकारी देने वाले कर्मचारी या परिचित
  • हथियार और मादक पदार्थों के संयुक्त तस्करी नेटवर्क

सोशल मीडिया पर प्रचार और धमकी प्रसारित करने वाले समर्थक।

सभी स्थानीय सहयोगियों को एक ही श्रेणी में रखना उचित नहीं है। किसी व्यक्ति की वैचारिक भागीदारी, आर्थिक सहायता, दबाव में दी गई मदद और अनजाने संपर्क की कानूनी प्रकृति अलग-अलग होती है। किसी क्षेत्र या समुदाय को सामूहिक रूप से जिम्मेदार ठहराना तथ्यों तथा आतंकवाद-विरोधी नीति—दोनों के लिए नुकसानदेह होगा।

10. पाकिस्तान की भूमिका: आरोप, उपलब्ध प्रमाण और आधिकारिक इनकार

लश्कर और जैश को संयुक्त राष्ट्र स्वयं पाकिस्तान स्थित संगठन बताता है। हाफिज सईद, मसूद अजहर और सैयद सलाहुद्दीन का पाकिस्तान या पाकिस्तान प्रशासित क्षेत्र में रहना भी अंतरराष्ट्रीय तथा भारतीय दस्तावेजों में दर्ज है। NIA ने अनेक मामलों में पाकिस्तान स्थित हैंडलरों, डिजिटल संपर्क, हथियारों की आपूर्ति और स्थानीय ओवरग्राउंड नेटवर्क का आरोप लगाया है।

भारत का आधिकारिक निष्कर्ष है कि पाकिस्तान स्थित नेतृत्व इन संगठनों को प्रशिक्षण, हथियार, धन, संचार और घुसपैठ में सहायता देता है। नए नामों का इस्तेमाल इसी रिश्ते को छिपाने तथा प्रत्यक्ष जिम्मेदारी से बचने के लिए किया जाता है।

दूसरी ओर पाकिस्तान आतंकवादी ढांचे को समर्थन देने के भारतीय आरोपों को खारिज करता है। उसका घोषित पक्ष है कि वह कश्मीरियों को केवल राजनीतिक, नैतिक और कूटनीतिक समर्थन देता है। पाकिस्तान के विदेश मंत्रालय ने जनवरी 2026 में भी अपने यहां आतंकी शिविर होने के भारतीय आरोपों को “निराधार” बताया था। पाकिस्तान विदेश मंत्रालय का आधिकारिक पक्ष

एक निष्पक्ष शोध में दोनों आधिकारिक पक्ष दर्ज होने चाहिए। लेकिन केवल सरकारी इनकार से संयुक्त राष्ट्र की सूची, संगठन के नेतृत्व का स्थान, पकड़े गए आतंकवादियों की पहचान, डिजिटल संचार, हथियारों की बरामदगी और अदालतों में प्रस्तुत साक्ष्य अप्रासंगिक नहीं हो जाते। प्रत्येक घटना में उपलब्ध प्रमाणों का स्वतंत्र मूल्यांकन आवश्यक है।

11. जिम्मेदारी तय करते समय प्रमाण की चार श्रेणियां

  • वेबसाइट के शोध डेटाबेस में प्रत्येक घटना के साथ प्रमाण का स्तर दर्ज किया जाना चाहिए

कई मामलों में संगठन प्रचार के लिए ऐसी घटना की जिम्मेदारी भी ले सकता है जिसे उसके सदस्यों ने अंजाम न दिया हो। इसके विपरीत, कभी कोई संगठन जिम्मेदारी स्वीकार नहीं करता लेकिन तकनीकी साक्ष्य, हथियार, संचार या गिरफ्तार आरोपियों के आधार पर उसका संबंध सामने आता है। इसलिए “दावा” और “सिद्ध अपराध” के बीच स्पष्ट अंतर जरूरी है।

निष्कर्ष: आतंक का बदला हुआ संगठनात्मक चेहरा

जम्मू-कश्मीर में लक्षित आतंक का संगठनात्मक इतिहास स्थानीय उग्रवाद से शुरू होकर सीमा पार संचालित और डिजिटल रूप से नियंत्रित छद्म संगठनों तक पहुंचा है।

JKLF ने स्वतंत्र कश्मीर के नाम पर सशस्त्र अभियान आरंभ किया। हिजबुल मुजाहिदीन ने उसे पाकिस्तान समर्थक और अधिक इस्लामी दिशा दी। लश्कर तथा जैश ने विदेशी आतंकवादियों, फिदायीन हमलों, प्रशिक्षण शिविरों और सीमा पार नेटवर्क को मजबूत किया। जब ये नाम अंतरराष्ट्रीय प्रतिबंधों और निगरानी में आ गए तो TRF, PAFF तथा कश्मीर टाइगर्स जैसे नए नाम सामने आए।

इन छद्म संगठनों का उद्देश्य केवल प्रतिबंध से बचना नहीं था। उन्होंने आतंकवाद को स्थानीय राजनीतिक प्रतिरोध जैसा प्रस्तुत करने, वास्तविक नियंत्रण संरचना छिपाने, कम अवधि के लिए स्थानीय युवाओं का इस्तेमाल करने और सोशल मीडिया के माध्यम से भय फैलाने की नई प्रणाली विकसित की।